अजीत अंजुम जैसे सस्ते यूट्यूबर के महंगे सवाल — और उन सवालों से डरा हुआ तंत्र !”

ई बिहार है बाबू…इहाँ माथा पे थूक के “कपार” में छेद कर देते हैं…!

बिहार में चुनाव होने वाले हैं और चुनाव से पूर्व मतदाता सूची में नाम जोड़ने और काटने की प्रक्रिया बड़ी तेज रफ्तार से चल रही है । खबर है कि मतदाता सूची में चल रहे रद्दो बदल की कहानी की कलई को देश के वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम द्वारा अपनी ख़बर के माध्यम से खोल दिया गया । खबर प्रसारित होने पर वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम के खिलाफ धारा 186-सरकारी कामकाज में बाधा डालना, धारा 353-सरकारी कर्मचारी पर हमला या डराने-धमकाने की कोशिश करना, धारा 505(2)-ऐसे बयान देना जिससे किसी वर्ग या धर्म के बीच शत्रुता या दंगे की आशंका हो, धारा 295(A)-धार्मिक भावनाएँ भड़काने के इरादे से काम करना, Representation of People Act, 1950 की धारा 31- निर्वाचन प्रक्रिया में बाधा डालना या ग़लत जानकारी फैलाना इत्यादि के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया है ।

बताया जा रहा है कि वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम को तहरीर में “सस्ता यू ट्यूबर” कहकर संबोधित किया गया है जबकि सभी जानते हैं कि अजीत अंजुम क्या हैं । कहते हैं कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा डर हक़ीक़त के सामने आ जाने का होता है। क्योंकि हक़ीक़त आईने की तरह होती है । लेकिन अफ़सोस ! आजकल सच्चे पत्रकार को डी मोरलाइज्ड करने के लिए ‘सस्ता यूट्यूबर’ बता देना सबसे सस्ता उपाय हो गया है । और इस उपाय का सबसे ज्यादा प्रयोग दलाल पत्रकारों के साथ भ्रष्ट लोकसेवको द्वारा किया जा रहा है ।

जब सरकारी कुर्सियों की मखमली गद्दियों के नीचे फैली धूल को झाड़ने वाला पत्रकार पहुंच जाए, तो तंत्र के माथे पर पसीना आना स्वाभाविक है । जिस सच्चाई को जनता कभी ढूंढ नहीं पाती, उसे पत्रकार ढूंढ ले तो उस पर FIR जड़ दी जाती है, ताकि अगली बार कोई दूसरा ये दुस्साहस न करे । “भाई साहब, वोटर लिस्ट में कितने नाम जोड़ रहे हो ?” ये सवाल और कैमरा देखकर बिहार का तंत्र कहता हैं कि, “सरकारी काम में बाधा डालना अपराध है ।”तो फिर फर्जी आँकड़े, अधूरी सूची, कागज़ी खानापूरी और भ्रष्टाचार का ये लूटतंत्र क्या सरकारी काम में मदद कर रहे हैं ? अगर सवाल पूछना और छिपा हुआ सच दिखाना यदि बाधा है, तो दलाल मीडिया की चुप्पी क्या लोकतंत्र की सेवा है ?

अब जिस पत्रकार की कलम बिकती नहीं, तो उसकी आवाज़ दबानी ही पड़ेगी न… कभी FIR से, कभी Troll से, कभी धमकी से ! कहावत है कि “डर उसी को लगता है जिसने गलत किया हो और कैमरे से डर तो उसी को लगता है जो चोर, उचक्का, उठाईगिरा, भ्रष्टाचारी, दलाल और छिनरा हो ।

अगर मतदाता सूची एकदम दूध जैसी सफेद थी,तो कैमरा देखकर बिहार तंत्र इतना घबराया क्यों ? मंचों पर लोकतंत्र के गुणगान करने वाले दरअसल उस लोकतंत्र से ही डरे हुए हैं, जो सवाल पूछता है । हमारा सलाम है उन पत्रकारों को जो गालियां खाकर, केस झेलकर, ‘सस्ता’ कहलाकर भी महंगे सच को सबसे सस्ती भाषा में जनता तक पहुंचा देते हैं ।

इस संबंध में बेगूसराय जिला प्रशासन द्वारा जारी चेतावनी भी देख लीजिए !

 

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

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