“सूत्र से मूत्र तक : तेजस्वी की राजनीति का नया संस्करण !”

जब सत्ता के गलियारों में कोई ‘सूत्र’ से खबरें लीक करता है तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की छाती फूल जाती है — “देखिए, हमारे पास ‘सूत्र’ हैं ! ”मगर अब ख़बर है कि तेजस्वी बाबू ने तो सूत्र को ही मूत्र कर दिया है । अब बेचारे पत्रकार पूछ रहे हैं कि “अब किसके भरोसे खबरें ‘लीक’ करेंगे ?” दरअसल नेताओं का मीडिया से प्यार ऐसा ही होता है । जब तक चैनल पर खुद की तस्वीर चमकती है, तब तक पत्रकार देवता होते हैं और जैसे ही कोई सवाल असहज लगे तो बस,पत्रकार दलाल हो जाते हैं.. एंकर भौंकने वाला कुत्ता हो जाता है, और सूत्र मूत्र में बदल जाता है !
हो सकता है अगली बार पाखाना भी कह दें ।

केमिस्ट्री विषय बताती है, कि दो हिस्से हाइड्रोजन के और एक हिस्सा ऑक्सीजन मिलकर पानी बनाते हैं । वही पानी जब शरीर में जाता है और शरीर अपने लाभ पा लेने के बाद उसे बाहर निकालता है, तो वो मूत्र बन जाता है। है तो वो भी पानी ही, लेकिन बदबूदार । तेजस्वी यादव स्कूल जाते तो जान जाते कि मूत्र में 95 फीसदी पानी ही होता है । बाकी फीसदी में यूरिया, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, सल्फेट…

क्या क्या सुनना पड़ रहा है आजकल ! मीडिया सीधे सूत्र से होती हुई मूत्र तक आ पहुँची है । तेजस्वी मीडिया के सूत्र को मूत्र की संज्ञा तो दे बैठे लेकिन तेजस्वी यह नही बताना चाहते कि पत्तलकारों को लिट्टी, मीट और ब्लू लेबल की लत जो उनके पिता लालू ने लगाई थी, वही मूत्र रूपी पत्तलकार सत्ता बदलने पर आज दूसरे की गोद में चले गए हैं । यदि कभी आप फिर से सत्ता में आये तेजस्वी जी तो यही मूत्रपान आप खुद फिर से करना शुरू कर देंगे… और यही मूत्र लोग आपके चारों ओर नालों के समान बजबजाते हुए फिर से दिखाई देने लगेंगे ।

इसलिए फिलहाल आप इन्हें टॉमी, आपिया, लिब्रांडू, दलाल, पेटकार, बिकाऊ, पत्तलकार, पत्तलचाट, खम्भा, कुक्कुर कुछ भी कह लीजिए, लेकिन मूत्र मत कहिए ।

अरे असल नेता तो मोरारजी देसाई थे जो सीधे सीधे मूत्र का पान कर लेते थे और उसमें मौजूद यूरिया, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, सल्फेट सभी अनमोल तत्वों का रीयूज कर लेते थे । अभी आप राजनीति के कच्चे अंडे हैं यादव जी..यदि न होते तो इस्तेमाल का ज्ञान और ट्यूशन सरकार से लेते । यकीन न हो तो देख लीजिए कि वहां सब कैसे शुद्ध हो जा रहा है । इसलिए कहता हूँ कि राजनीति में जो मूत्र से परहेज करता है, वह पीछे रह जाता है ।

अतः अब सूत्र को मूत्र नही बल्कि मूत्र को फिर से सूत्र बनाइए । इनसे झगड़ा रगड़ा करना है तो फिर राजनीति छोड़कर आपको इन्ही के जैसा मूत्र बनना पड़ेगा । अन्यथा इन मूत्रों से झगड़ा मोल लेकर तो सदी के शहंशाह अमिताभ बच्चन भी 90 के दशक में डूब गए थे । उन्हें भी इन ‘मूत्रों’ से माफी मांगनी पड़ी थी ताकि सिनेमा में टिके और बने रहें ।

इसलिए मैं कहता हूँ कि मूत्रपान की आदत डालिये । उसे हिकारत भरी नजरों से मत देखिए..आखिर होता तो उसमें भी 95 फीसदी पानी ही है । बाकी यूरिया, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, सल्फेट सबकी अलग से मेडिसिन वैल्यू भी है । इसलिए पहले इस्तेमाल कीजिये और फिर विश्वास कीजिये ! यूज देम फ्रीक्वेंटली…. !

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

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