कलम से टकराई वर्दी — दरोगा ने दिखाया लोकतंत्र को लठतंत्र का रास्ता !”

जब चोट खुद को लगती है तभी दर्द का अहसास भी होता है । शायद ऐसी ही चोट प्रेस क्लब के निर्वाचित सदस्य को तब महसूस हुई है ,जब अपने क्षेत्र के थाने में उन्हें अपमानित होना पड़ा । जब किसी अदने से पत्रकार के साथ यही घटना घटित होती है तो यही लोकतंत्र का खम्भा उस पत्रकार को “हम आपके हैं कौन” वाली नजरों से देखता है । और जब बात खुद की आती है तो “तड़प- तड़प के इस दिल से आह निकलती रही” का ट्यून चालू हो जाता है । लोकतंत्र की आत्मा मानी जाने वाली प्रेस और कानून व्यवस्था के प्रतिनिधि मानी जाने वाली पुलिस… जब दोनों आमने-सामने हों, तो सवाल उठता है कि ग़लती किसकी है ? क़लम की धार में या वर्दी की अकड़ में ?

हाल ही में एक घटना ने सुर्खियाँ बटोरी, जब गोरखपुर प्रेस क्लब के निर्वाचित सदस्य तथा ANI के वीडियो पत्रकार विवेक कुमार को एक दरोगा द्वारा ना सिर्फ़ अपमानित किया गया बल्कि उनके पत्रकार होने के दंभ को भी पैरों तले रौंदने की कोशिश की गई । यह घटना कोई मामूली तकरार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के दो स्तंभों के बीच संबंधों में आई खटास की गंभीर निशानी है ।

प्राप्त सोर्सेज के हवाले से ख़बर है कि गोरखपुर के तारामंडल क्षेत्र स्थित सत्यम लॉन में आयोजित कांग्रेस पार्टी समीक्षा बैठक के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच विवाद और मारपीट की घटना हो गई । इस घटना में कार्यकर्ता सच्चिदानंद तिवारी को चोट लगने के बाद वह रामगढ़ताल थाने पर तहरीर देने पहुंचे थे । वहीं घटना की कवरेज के लिए ANI के वीडियो पत्रकार विवेक कुमार भी अपने सहयोगी अजीत कुमार यादव के साथ मौके पर पहुंचे । विवेक कुमार पुलिस परिसर मे सच्चिदानंद तिवारी का बाइट रिकॉर्ड कर रहे थे, तभी थाने से दरोगा राम सिंह बाहर आये और वीडियो बनाने के मामले में पत्रकारों पर भड़क गए । सवाल दागते हुए बोले कि “बिना पूछे कैंपस में कैसे घुस गए ?” अर्दब का आलम ऐसा कि दरोगा जी ने एक सिपाही को आदेश दिया कि जी डी निकालो और इन पर मुकदमा लिखो । दरोगा तो दरोगा मुंशी जी ने भी बहती गंगा में अपने हाथ धोते हुए पत्रकार को हड़काना शुरू कर दिया ।

दरोगा महोदय की हेकड़ी कोई व्यक्तिगत ग़ुस्सा नहीं था बल्कि यह उस सोच की उपज थी जो यह मान बैठी है कि सत्ता और वर्दी से बड़ा कुछ नहीं है । ना कानून, ना संविधान, और ना ही लोकतांत्रिक संस्थाएं । लेकिन यह भूल घातक है। जब एक पत्रकार को, जो न केवल जनमत का प्रतिनिधि है बल्कि जन-आवाज का वाहक भी है, इस प्रकार अपमानित किया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला है । यदि थाने में पत्रकारों के लिए वीडियोग्राफी वर्जित है तो इस संबंध में खुलेआम आदेश जारी कीजिये ताकि मनमानी किसी की न चले ।

क्या यह वही पुलिस है जो आम जनता की रक्षक मानी जाती है ? या अब यह व्यवस्था खुद ‘प्रोटेक्टर’ से ‘प्रिडेटर’ बनती जा रही है ?प्रेस क्लब का सदस्य होना कोई विशेषाधिकार तो नहीं है, लेकिन उसे जनता के सवाल उठाने, जवाब मांगने और व्यवस्था की जवाबदेही तय करने का अधिकार होता है । यदि ऐसे व्यक्ति को भी दरोगा की हेकड़ी का सामना करना पड़े, तो एक आम नागरिक की स्थिति की कल्पना सहज की जा सकती है ।

यह मामला एक व्यवस्था के भीतर पनपते अभिमान और गैर-जवाबदेही के रोग की ओर इशारा करता है। पुलिस को प्रशिक्षित और संवेदनशील होना चाहिए परंतु दुर्भाग्यवश ये वही व्यवस्था है जहाँ सत्ता की छांव में कुछ वर्दीधारी अपनी सीमाएं लांघ रहे हैं ।

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

Related Post