जब देश की संसद में महंगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे टेबल पर पसीना-पसीना हो रहे हों, तब अचानक एक जनप्रतिनिधि संसद में खड़ा होकर समोसे की भाप में लोकतंत्र की भट्टी को गरम करना शुरू कर देता है । गोरखपुर के सांसद और सिने कलाकार श्रीमान रवि किशन जी ने जिस ज्वलंत और झुलसते मुद्दे को संसद में उठाया है, वह न तो किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग थी, न किसी नीति के समीक्षा की ! बल्कि वह माँग थी कैंटीन होटलों और ढाबों में मिलने वाले समोसे के आकार, स्वाद और उनके अलग अलग दाम का !अब यह कोई छोटा मुद्दा थोड़ी है ! आखिर देश की जनता ने सांसदों को वोट देकर भेजा ही इसीलिए है, कि वे अपने और अपने सहयोगियों के नाश्ते की गुणवत्ता को सुनिश्चित करें । ये वही समोसा है जो सुबह-सुबह संसद भवन में जैसे जैसे गरमा गरम घुसता चला जाता है, वैसे वैसे आम जनता की उम्मीदें ठंडी पड़ती चली जाती हैं ।
यदि रवि किशन जी का कहना है कि “समोसे में वो स्वाद नहीं रहा, वो तीखापन नहीं रहा, जो पहले होता था ! तो अब यह तय करना मुश्किल हो गया है कि यह टिप्पणी समोसे पर थी या सिस्टम पर ?माननीय द्वारा की गई यह पहल वाकई ऐतिहासिक है । हो सकता है कि आने वाले समय में शायद संसद में ‘चाय बिस्कुट नीति’, ‘रसगुल्ले पर रिपोर्ट’ और ‘गुलाबजामुन आयोग’ भी गठित हों , ताकि इस राष्ट्र की भूखी जनता को यह भरोसा दिलाया जा सके कि संसद में भूख पर गंभीर चर्चा चल रही है ।
इस मुद्दे को लेकर आज सोशल मीडिया पर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है । हर चीज में नुस्ख निकालने की आदत पाले बैठे कमबख्तों को तो “समोसे पर चर्चा” फूटी आँख नहीं भा रही है । कह रहे हैं कि, जब देश की संसद में चुने हुए जनप्रतिनिधि अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं, तो आम जनता उम्मीद करती है कि उनके पेट, रोज़गार और अधिकारों की बात होगी । लेकिन जब गोरखपुर के सांसद श्री रवि किशन जी, संसद में खड़े होकर समोसे के आकार पर चिंता जताते हैं तो लोकतंत्र की आत्मा भी चटनी में डूबकर रो पड़ती है । जिस देश मे वोट देने वाला भूखा है, उस देश मे वोट लेने वाला समोसे के साइज पर नाराजगी जाहिर कर रहा है । (भला, माननीय के विषय मे ऐसा कहना चाहिए क्या ) ?
मेरा तो कहना है कि माननीय को ऐसा कहने वालों पर बिल्कुल भी ध्यान नही देना चाहिए, क्योंकि ये नामुराद लोग समोसे और आम आदमी के बीच के पुनर्जन्मकालिक रिश्तों से पूरी तरह अंजान हैं । मूर्ख हैं ये ! ये नही जानते कि आज समोसा आम आदमी से शनैः शनैः किस कदर दूर होता चला जा रहा है । कभी 3 का मिलने वाला समोसा इतराता हुआ 5 तक पहुँचा, और फिर 8 तथा 10 की सीमाओं को लाँघता हुआ अब 12 पर जाकर अपनी आँखें तरेर रहा है । बावजूद इसके नामुराद लोग कहते हैं कि समोसे पर चर्चा व्यर्थ है । अरे मैं तो कहता हूँ कि आम आदमी के साथ समोसे की इस बेवफाई पर “लानत है, लानत है, लानत है…..” !
आसार बता रहे हैं कि आनेवाले दिनों में संसद में भूख पर नहीं, बल्कि भुजिया पर बहस होगी ! अगर संसद में भूख का मुद्दा उठता तो गरीबों की उम्मीदें गरम होतीं, लेकिन यहाँ तो जनप्रतिनिधि समोसे की कुरकुराहट से परेशान हैं । “नीतियाँ गायब हैं और नमकीन हाज़िर है” …घोटाले छुपे हुए हैं लेकिन समोसे की जाँच जरूरी है…क्योंकि “लोकतंत्र अब लंचतंत्र” में तब्दील हो चुका है… और हो सकता है कि अगले सत्र में “कचौड़ी पर भी कमेटी” बना दी जाए !
“नेताजी समोसे पर बहस कर रहे थे इतने जज्बातों से”….”कि जनता ताली भी न ठोंक सकी अपने हाथों से’ !
“तो ठोको ताली…”

