“व्यवस्था बनाम तेंदुआ : एक शिकारी और सौ दर्शक” !

गोरखपुर : शहर के पादरी बाजार क्षेत्र से लगे एरिया में लगभग सात दिनों से तेंदुआ शहर में आराम से घूम रहा है, मानो वाइल्डलाइफ टूरिज़्म शुरू हो गया हो और इंसान उसके डिस्कवरी चैनल के हिस्से हों । तेंदुआ आया, देखा, CCTV में छपा, और चला गया । पीछे रह गया पूरा सरकारी तंत्र ….सांसें अटकी हुईं, और बयान जारी करते हुए ।

“व्यवस्था के बाघ-बली” लोगों से ज्यादा होशियार तो तेंदुआ निकला ! सात दिनों से तेंदुआ शहर की गलियों में शेरों की तरह घूम रहा है । कभी खेत में, कभी छत पर, कभी CCTV में तो कभी नेता जी के फेसबुक लाइव में… पर व्यवस्था ? व्यवस्था अब भी “अलर्ट मोड” में ही है । मानो इस एलर्ट मोड से ही तेंदुए का हृदय परिवर्तन हो जाएगा और वो खुद ब खुद जंगल की ओर कूच कर जाएगा !

कभी कभी लगता है कि पुलिस फ़ोर्स को काहिल बनाने में सबसे महती भूमिका सर्विलांस सिस्टम ने निभाई है । पहले की पुलिस एक से बढ़कर एक खोजी कारनामा कर दिखाती थी लेकिन जब से सर्विलांस सिस्टम पुलिस के हाथ लगा तबसे इन्वेस्टिगेशन का भौकाल सर्विलांस सिस्टम तक सीमित होकर रह गया। शायद यही वजह है कि तेंदुए ने समूचे सिस्टम के इक़बाल को चुनौती दे रखी है । अब तेंदुआ न तो मोबाइल चलाता है.. न इंटरनेट और न सोशल मीडिया ! और सबसे बड़ी बात यह कि उस पर न कोई धारा लगेगी और न कोई वारंट कटेगा । पुलिस फोर्स, विधायक, पार्षद सब आ गए हैं– बूट चमका, फोटो खिंचा, बयान दिया, और बोले – “हम तेंदुए को जल्द पकड़ लेंगे।” दूसरी तरफ तेंदुआ रोज शिकार के नए नए तरीकों पर प्लानिंग कर रहा है । डर के मारे क्षेत्र में रात के समय पुलिस गश्त रुक गयी है और तेंदुआ है कि रोज रात्रि गश्त पर निकल जा रहा है ।

IAS, PCS, BA, MA, PhD, डिप्लोमा, डिग्रीधारी अफसर लोग हाथ में जाल, पैरों में GPS जूते, जेब में टेंडर और दिल में डर लेकर घूम रहे हैं पर तेंदुआ साहब लोगों के पढ़ाई की धज्जियां उड़ाते हुए छतों पर और गलियों में फुर्ती से उछल कूद मचा रहा है । रात होते ही मानव सभ्यता के तमाम प्लान धराशायी हो जा रहे हैं और गांव कस्बे फिर से जंगल में तब्दील हो जा रहे हैं । साहब ने समीक्षा बैठक की है । साहब ने “गश्त भी बढ़ा दी है”। साहब बोले कि “ड्रोन भी लगाए हैं”। और पार्षद जी ने तो मांग रख दी है कि “तेंदुए को पालतू बना लिया जाए ! विधायक जी तो यहां तक कह गए कि–”हमारे समय में तो शेर भी डरता था…” बहरहाल तेंदुए ने सिखा दिया है कि जो कैमरे से डरे वो “नेता और घूसखोर” और जो न डरे वो तेंदुआ ! अब तो हालत ये है कि जनता कह रही है कि “भैया तेंदुआ ही अच्छा, कम से कम काम तो कर रहा है… सबको दौड़ा तो रहा है !”

यह बिल्कुल न समझिए कि तेंदुआ नहीं पकड़ा जा रहा है , बल्कि तेंदुए के नाम पर पूरी व्यवस्था का नंगापन पकड़ में आ गया है । अफसरों की ‘प्रेस विज्ञप्तियाँ’, नेताओं की ‘संवेदनशीलता’, और पार्षदों की ‘पहुंच’ सब फेल हो चुके हैं । बाकी जनता तो यही कह रही है कि “जो सात दिन में नहीं पकड़ा गया, वो तेंदुआ नहीं नेता है !”

अधिकारी और नेता कह रहे है कि “हमने तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं !” “हमने टीम गठित कर दी है ! “स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है ! और तेंदुआ कह रहा है कि ” जब मन करी, तब्बे जाईब ! जनता की हालत ये है कि “न सो पा रही है और न रो पा रही है” ! हर गली में एलान हो रहा है कि “कृपया सावधान रहें, रात में घर से न निकलें ! “और नेता जी अगले मोहल्ले में सेल्फी लेते पाए गए वो भी तेंदुए की आशंका वाले स्थान के बिल्कुल बगल में ! क्योंकि कैमरे में आना ज़रूरी है, जान बचाना नहीं ।

इस तेंदुए ने वो कर दिखाया, जो हजारों RTI और सैकड़ों आंदोलन नहीं कर सके । उसने दिखा दिया कि हमारी ‘व्यवस्था’ सिर्फ माइक पर गरजती है और कमजोरों पर ही उसका जोर चलता है, लेकिन ज़मीन पर फुस्स पटाखा है । नेताओं की समझदारी, पुलिस का खुफिया तंत्र, वन विभाग की दक्षता सबको एक जानवर ने ‘मूक प्रदर्शन’ में बदल कर रख दिया है । तेंदुआ तो फिर भी चला जाएगा साहब…पर व्यवस्था के “नाकामी की जो बू” फैली हुई है, वो शायद लंबे समय तक शहर की हवा में रहेगी । हो सकता है अगली बार तेंदुआ नहीं, जनता ही गुर्राने लगे । क्योंकि अब जनता भी पूछ रही है कि जब एक तेंदुआ तुम्हें नाकाम कर दे रहा है, तो आतंक से देश को कैसे बचाओगे ?” “जब तुम्हारे जाल में जानवर नहीं फँसता, तो फिर जनता क्यों फँसे ?”

व्यवस्था को मुँह चिढ़ाते तेंदुए की वीडियो देखें …

By systemkasach

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