डैमेज कण्ट्रोल की कोशिश :- कल शाम प्राइवेट प्रैक्टिस का वीडियो वायरल होते ही, सुबह अचानक अखबार में दिखाई देने लगे डॉ साहब !

गोरखपुर : सड़ांध मारती बदबूदार व्यवस्था ने जिला अस्पताल को “कटीला अस्पताल” और गोरखपुर को “घोटालों का पुर” बनाकर रख दिया है । ठीक इसी तरह “कमीशन से प्रकाशित” और “सच्चाई से निर्वासित” हो चुकी गोरखपुर की पत्रकारिता अब ठीक से रेंग भी नही पा रही है । अखबारों की “संपादकीय सजगता” का नया पैमाना तो अब ये बन चुका है कि जो पैसा दे, उसकी बदनामी भी ब्रेकिंग न्यूज़ के जरिए प्रतिष्ठा बन जाए और जहाँ माल न मिले उसकी प्रतिष्ठा भी बदनामी में तब्दील कर दी जाए ।

सभी जानते हैं कि “कलंक को चंदन बनाने में माहिर अखबारी भोंपू” गोरखपुर जिला अस्पताल के डॉक्टर सुमन से लेकर अन्य तमाम लोगों की बेईमानी और कमीशनबाजी को लेकर बैठी हर जाँच पर आज तक तो मुँहचोर की तरह चुप रहा । लेकिन कल रात जैसे ही डॉक्टर साहब के प्राइवेट प्रैक्टिस का वीडियो वायरल हुआ वैसे ही अखबारी पत्रकारिता अचानक से एक्टिव मोड में आ गयी । चर्चा है कि कल शाम डॉ सुमन के प्राइवेट प्रैक्टिस का वीडियो वायरल होते ही दूसरे दिन सुबह अखबार ने डायरिया के बहाने “डैमेज कंट्रोल” के तहत डॉ सुमन की फोटो छापकर उन्हें मसीहा साबित करने की नाकाम कोशिश कर डाली । अखबार शायद ये भूल गया कि प्राइवेट प्रैक्टिस का ये वीडियो डॉ साहब के भ्रष्टाचार की कब्र में आखिरी कील भी साबित हो सकता है, क्योंकि प्राइवेट प्रैक्टिस के मामले में हाईकोर्ट भी पूर्व में काफी सख्त आदेश जारी कर चुका है ।

डॉक्टर साहब के प्राइवेट प्रैक्टिस की सच्चाई कल जैसे ही सामने आई, वैसे ही अखबार के दफ्तर में “खबर” नहीं, बल्कि “दान रसीद” चेक की जाने लगी । खबर छापने वाले पत्रकार महोदय, जिनकी कलम को कभी तलवार कहा जाता था..आजकल न्यूज़ कॉलम में डॉक्टर साहब की मालिश करते हुए दिखाई देते हैं । ये वही अखबार है जहाँ सच छपने से पहले रेस्टरूम में धुला जाता है ।जैसे ही डॉक्टर साहब के घपले की बदबू फैली, वैसे ही अखबार ने इत्र छापना शुरू कर दिया —”मरीजों का मसीहा”, “स्वास्थ्य सेवाओं के समर्पित प्रहरी”, “हर दिल अज़ीज़ डॉक्टर साहब”…बस जल्दबाजी में (नोबेल प्राइज का नाम छूट गया) !

मतलब जैसे ही डॉ साहब के प्राइवेट प्रैक्टिस का वीडियो वायरल हुआ, वैसे ही अखबार ने डॉक्टर साहब की तस्वीर छापकर “चंदन-चंदन” कर दिया ….मानो कोई भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि भारत रत्न का नामांकन हुआ हो । असल में यह अखबार वही है जिसकी स्याही से सच्चाई नहीं, बल्कि सुविधा की खुशबू आती है । यहाँ रिपोर्टर नहीं होते, रिसेप्शनिस्ट होते हैं, जो खबरों की जगह विज्ञापन और “हित” दिखाते हैं और यदि आपने कमिशन समय पर पहुँचाया, तो समझिए आपकी गलती भी ‘सेवा’ बन जाएगी ।

डॉक्टर साहब भी समझदार हैं.. इलाज चाहे मरीज का करें या न करें, अखबार का पेट जरूर भरते हैं । तभी तो अखबार वाले उनके गुनाहों का स्वर्ण अक्षरों में गुणगान बनाकर छापते हैं । सवाल यह नहीं कि डॉक्टर साहब 23 साल से वहीं क्यों जमे हैं । सवाल यह है कि “जनता” को कितने साल लगेंगे पहचानने में कि व्यवस्था ने नहीं बल्कि इन चाटुकार अखबारों ने उन्हें बीमार बना दिया है ।

By systemkasach

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