गोरखपुर : जब पानी नाक से ऊपर बहने लगा तब जिला अस्पताल गोरखपुर के भ्रष्टाचार और मनमानी का कमीशन ग्रंथ हाईकोर्ट की नजर में भी आ गया। यहाँ भ्रष्टाचार और मनमानी उस स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ “कानून” नाम की चीज़ सिर्फ किताबों और कोर्टरूम तक ही सीमित रह गई है । हालात ये हैं कि अब हाईकोर्ट का आदेश भी यहां की मलाईदार कुर्सी पर बैठे माफिया-प्रशासकों के आगे बौना नजर आ रहा है ।
दरअसल, अस्पताल की मलाई बांटने का खेल कोई नया नहीं है । कमीशनबाजी का ये तंत्र ऐसा है कि हर “मलाईदार विभाग” पर बड़े भैया का एक “स्पेशल गुर्गा” बैठा है …और ये गुर्गे सिर्फ नाम के नहीं बल्कि एक पूरी मशीनरी की तरह काम करते हैं । दवा खरीद से लेकर इलाज तक, सबकुछ इनकी जेब की कमीशनबाजी के हिसाब से चलता है लेकिन जिला अस्पताल के इस नेक्सस को इस बार हाईकोर्ट ने “जोर का झटका धीरे से” दे दिया है ।
लखनऊ से उड़ती खबर आई है कि कई साल पहले कई सीनियर फार्मासिस्टों को दरकिनार कर एक खास कोहिनूर रूपी फार्मासिस्ट को जिला अस्पताल गोरखपुर के फार्मासिस्ट की कुर्सी पर काबिज करा दिया गया था । जब इस कुर्सी के असली हकदार ने अपना हक माँगना शुरू किया तो बदले में उसे तमाम दुश्वारियां झेलनी पड़ी और आपस मे एकजुट हुए भ्रष्टाचारियों ने उसे सस्पेंड तक करा दिया । जब यह हक की आवाज हाईकोर्ट तक पहुंची तब हाईकोर्ट ने अपने तेवर दिखाए और असली हकदार के पक्ष में अपना फैसला सुना दिया । शासन ने भी आदेश के अनुपालन का फरमान जिला अस्पताल के अधीक्षक को भेज दिया लेकिन अपने रिटायरमेंट के दिन गिन रहे एसआईसी साहब के सामने इस आदेश ने “आगे कुँआ और पीछे खाई” जैसी स्थिति पैदा कर दी है ।

आदेश के बावजूद अब तक एसआईसी साहब हाईकोर्ट के आदेश का पालन नही करा सके हैं । जानकर बताते हैं कि जिला अस्पताल के भ्रष्ट गठबंधन से भयभीत एसआईसी साहब ने एकतरफ चार्ज ग्रहण करने के लिए हकदार को पत्र जारी कर दिया है तो दूसरी तरफ हकदार चार्ज ग्रहण न कर सके इसलिए उसे तकनीकी कारणों में उलझा कर रख दिया गया है । अब सवाल यह है कि जब हाईकोर्ट ने साफ़ आदेश दे दिया कि जिम्मेदारी हकदार को सौंपो, तो ये आदेश फाइलों में “नींद की गोली” खाकर सो क्यों गया ? क्या आदेश अस्पताल की दीवारों से टकराकर वापस लौट आया ? या फिर कोर्ट का स्टाम्प भी यहाँ के कमीशनबाजी वाली मलाई के आगे पिघल गया ?

सब जानते हैं कि गोरखपुर जिला अस्पताल में “कुर्सी से ज्यादा ताकतवर है कमीशन का खेल”। और इसी खेल ने पूर्व एसआईसी के कुर्सी की बलि ले ली । स्पष्ट सूत्रों के मुताबिक यह भी पता चला है कि जिला अस्पताल के भ्रष्टाचार का खुलासा कर इसे शासन तक पहुँचाने वाले व्यक्ति के खिलाफ जिला अस्पताल के इस नेक्सस द्वारा कोतवाली थाने में दर्ज कराए गए मुकदमे, और उस मुकदमे में की गई साजिशों,लेन देन तथा गढ़े गए झूठ के पुलिंदों की पोल पट्टी भी अब खुल चुकी है । इसलिए इस बात की भी पूरी संभावना है कि.. इस मामले में भी कोई ऐसा ही.. एक बेहद झटकेदार आदेश जल्द सामने आ सकता है ।
अब सवाल तो यही है कि —
कमीशनबाजी के मोह में अगर हाईकोर्ट के आदेश की आवाज भी यदि यहाँ कानों पर असर नही डाल रही तो… आम मरीज की फरियाद का क्या होता होगा ?
क्या जिला अस्पताल अब “भ्रष्टाचारियों का अस्पताल” बन चुका है, जहां इलाज सिर्फ पैसों का और कुर्सी सिर्फ कमीशन की है ?
फिलहाल, अस्पताल की गली-गलियारों में यही चर्चा है कि “बड़े भैया और उनके गुर्गों” के चाहत की चक्रवात मे कहीं इस बार नए एसआईसी साहब न घोंट दिए जाएं ।

