गोरखपुर : इस बार खबर नहीं, बल्कि गरीब की रोटी हजम कर गये हैं “पत्रकार साहब” ! पत्रकारीय हितों की रक्षा का दम भरने वाले आजकल कई पत्रकार संगठन हमारे बीच घुमंतू जीवों की मानिंद विचरण करते हुए तो दिखाई पड़ जाते हैं… लेकिंन जब इनके सामने पत्रकारिता और पत्रकार के दमन की कोई घटना आती है, तो दुर्भाग्यवश इन संगठनों की औकात मात्र ज्ञापन तक सीमित होकर रह जाती है । “गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन” गोरखपुर जनपद का सबसे पुराना,पहला,धारदार और निष्कलंक संगठन माना जाता है । यहाँ न अड्डेबाजी है, न तामझाम, न मठाधीशी, और न दलालों को शरण देने की कोई परंपरा ! यदि एकाध पत्रकार संगठनों को छोड़ दें तो बाकियों का हाल सिर्फ सदस्यता के नाम पर रुपये ऐंठना रह गया है.. और शायद इसीलिए ऐसे ऐसे झंडुबाम टाइप संगठन आज खुल चुके हैं जिनकी अहमियत “दलाल स्ट्रीट” से जरा भी कमतर नही है ।
क्या है मामला….?
(वीडियो इनपुट, महिला दुकानदार) :- आदर्श पत्रकार हैं… लड़कियों को लेकर आये थे.. खाना खिलाये और मेरा तीन सौ रुपया छह 7 महीने से अभी तक नही दिए..आते हैं तो चोरों की तरह मुँह छिपाकर भाग जाते हैं..अब किसी को उधार नही देंगे !
उक्त बयान, गर्त में गिर चुकी रीढ़विहीन और निर्लज्ज पत्रकारिता के पन्नों में एक और करामात के रूप में दर्ज हो चुकी हैं । यह बातें गरीबी में जी रही एक महिला दुकानदार ने कहीं है… जिसका सपना बस इतना है कि उसकी दुकान से रोज़ की दाल-रोटी निकल आए । लेकिन वहाँ पहुँच गए हमारे “कैमरावीर साहब” ! इनकी कैमरे से ज़्यादा इनकी झूठ,फर्जीवाड़ा,भूख,लफ्फाजी और धौंस मशहूर है । साहब, महिला की दुकान पर पहुँचे तो तीन सौ रुपये का नाश्ता पेट में ऐसे समाया जैसे मानो कोई “ब्रेकिंग न्यूज़” गटक गए हों । और जब दुकानदार ने पैसे मांगे तो पत्रकारिता का झंडा लहरा दिया कि “मैं पत्रकार हूँ !” महिला तो मान चुकी थी कि उसकी मेहनत के तीन सौ रुपये डूब चुके हैं…इसलिए चुप रही, लेकिन मोबाइल कैमरा चुप कहाँ रहता है ? एक दिन जब कुछ लोग महिला दुकानदार के पास पहुँचे तो उधारी का नाम सुनते ही महिला ने आपबीती बयां कर दी ! आपबीती का वीडियो बना, और किसी सज्जन ने महिला की आपबीती को हम तक पहुँचा दिया ।अब वीडियो वायरल होने से पहले ही “वीडियो बन जाने की खबर” इतनी तेजी से वायरल हो गयी, कि पत्रकार साहब उतनी ही स्पीड से वापस भागे… जितनी स्पीड से महिला का नाश्ता हजम कर गए थे ! अब पत्रकार साहब को समझ आ गया था कि उनके “मुँह का निवाला” अब उनकी “इज्ज़त का दिवाला” निकालकर ही मानेगा । पता चला है कि पत्रकार साहब भागे-भागे फिर उसी महिला के पास पहुँचे, और शराफ़त का नकाब ओढ़कर चुपचाप पैसे थमा दिए । वैसे एक यक्ष प्रश्न अभी तक समझ मे नही आया कि ये पेटकार साहब किन लड़कियों को ले लेकर कहाँ कहाँ घूम रहे हैं और नाश्ता करा रहे हैं ? वैसे आपको ये याद दिला दूँ कि ये पत्रकार साहब, उसी पत्रकारीय गैंग का हिस्सा हैं जिस गैंग पर अभी कुछ दिन पहले ही प्रोफेशनल महिलाओं का इस्तेमाल कर एक पत्रकार को हनी ट्रैप में फंसाने साजिश रची गयी थी और इसकी शिकायत डीआईजी गोरखपुर रेंज के कार्यालय में दाखिल हुई थी..जिसकी जाँच अभी प्रचलित है ।
और हाँ, ये वही साहब हैं जो एक पत्रकार संगठन के “संस्थापक” भी कहे जाते हैं । वो संगठन जो पत्रकारीय हितों का चोला ओढ़े गरीबों का मेहनताना तक डकार जाता है ।

सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पत्रकार साहब कि लिखी गयी पंक्तियाँ बताती हैं कि पत्रकार साहब पीडीएफ के बाजार में व्हाट्सएप्प ग्रुप पर तैरने वाले मान्यता प्राप्त पत्रकार “जनाब मनव्वर रिजवी” के कैमरामैन हैं.. और मनव्वर रिजवी साहब, सब कुछ जानते हुए भी “पुत्रमोहि धृतराष्ट्र” की तरह अपनी आंखें बंद किये बैठे हैं । बैठे भी क्यों न ? आखिर कमाऊ पूत और दुधारू गाय की लात किसे पसंद नही आती ?
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पत्रकारिता की ताक़त तो दबी कुचली सिसकती आवाजों को उठाने में है, लेकिन यहाँ तो ताक़त नाश्ता खाने और पैसे दबाने में निकल रही है । ऐसे में आम जनता कह रही है कि “साहब” ! पत्रकारिता की आड़ में भूख मिटाने से अच्छा है कोई दूसरी दुकान खोल लीजिए । कम से कम पत्रकारिता की इज्जत तो बची रहेगी ! जब हमें यह पता चला कि गरीब महिला का भुगतान किया जा चुका है तो इस मामले की ख़बर प्रसारित करने की इच्छा को हमने तिलांजलि दे दी थी..लेकिन आज जब एक रिकॉर्डिंग मेरे पास आई… तो फिर महसूस हुआ कि फिजाओं में गज़ब की थेथरई काबिज हो चुकी है । पत्रकार साहब, जिस संगठन के संस्थापक बताए जाते हैं, उस संगठन के अध्यक्ष श्रीमान पांडेय जी से पत्रकार महोदय के कारनामो की चर्चा हमने की थी । लेकिन अध्यक्ष साहब भी इतने बड़े झुट्ठे और अफवाही निकले कि उन्होंने यह बात फैला दी कि “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के पत्रकार को उन्होंने खूब डांट डपटकर बिल्कुल राइट टाइम कर दिया है । अब इस बात की रिकॉर्डिंग आते ही अपना तो फर्ज यही बनता है कि “अध्यक्ष जी से हुई चर्चे और पत्रकार साहब के खर्चे” का पूरा विवरण पब्लिक डोमेन में डाल ही दिया जाए । अध्यक्ष जी की जानकारी भरी ज्ञानवर्धक बातें सुनकर निश्चित तौर पर आप भी अपना करम पीट लेंगे !
अब आज आप यह जान लीजिए अध्यक्ष महोदय, की किसी संस्थान का संस्थापक वह होता है जिसने संस्थान को जन्म दिया है । कार्यवाहक संस्थापक की बात करने वाले आप जैसे बुद्धिजीवी विशेष व्यक्ति से ज्ञान पाकर आज मैं तृप्त हो गया हूँ । इसलिए अपना बड़बोलापन बंद करते हुए अपने ज्ञान रूपी दही पर ढक्कन चढ़ा कर रखिये अन्यथा मक्खियां इतनी मंडराएँगी कि हैजा कालरा सब हो जायेगा !
निष्कर्ष :-
चोरी के साथ सीनाजोरी कत्तई नही करनी चाहिए..और अपनी चोरी उजागर हो जाने पर मौन धारण कर अपनी गलतियों का अफसोस करना चाहिए ।
कोई व्यक्ति स्वयं को शांत करने में लगा हो तो उसे उंगली नही करनी चाहिए… क्योंकि शांति धारण करने का प्रयास कर रहा व्यक्ति पड़ा हुआ तीर होता है.. जिसे कभी लपककर लेने की धृष्टता नही करनी चाहिए ।
सबसे महत्वपूर्ण, कि यदि आप मेरे विषय मे बगैर किसी प्रमाण के बेवजह अंटशंट बोलेंगे तो मैं भी आपको उछल उछल और कूद कूद कर आपके मुहल्ले गांवों तक जाकर दस बीस बार आपकी इज्जत उतार दूँगा …चाहे तो आप मेरा इतिहास पढ़ लें ! आप कितने भी बड़े “डोनाल्ड ट्रम्प” क्यों न हों … यदि आप उंगली करेंगे तो मैंने भी उँगलीबाजी की गणित का गहन अनुभव “आर्यभट्ट” से प्राप्त किया है… और इस अनुभव के शुरुआती दिनों से ही मुझे आप जैसे तमाम चिलान्डुओं से लड़ने भिड़ने का खूब अभ्यास रहा है !
सबकुछ देखने और सुनने के बाद आपको पता चल गया होगा अध्यक्ष जी, कि आप जिस संगठन का खुद को सर्वेसर्वा बता रहे हैं..उस संगठन के आप सर्वेसर्वा नहीं, बल्कि वो मनमोहन हैं…जिसका मुकद्दर ही उंगलियों के इशारे पर मीना बाई की तरह नाचना है !
यदि यह गलत है तो :-
विद्या कसम खाकर बोल दीजिए अध्यक्ष जी – कि संगठन और संगठन के संस्थापक का अर्थ आपको पता ही नही है .. और आपके संस्थापक के “पतित कारनामों” से आप अभी तक अंजान हैं !
विद्या कसम छोड़िए और माँ कसम खाकर बोल दीजिए अध्यक्ष जी – कि ये खुलासा गलत है और आपके निःस्वार्थ और सामाजिक परोपकार के कर्तव्यों को बदनाम करने की घोर साजिश है!!!
कोई कसम मत खाइए अध्यक्ष जी…लेकिन आपको अपने संस्थापक के अनंत सेवा, अविराम सानिध्य और अथाह समर्पण में डूबे एक एक पल की क़सम, है ! बोल दीजिए कि इस वीडियो ऑडियो को देखने, सुनने वालों की आँखों में रतौंधी और मोतियाबिंद हो गया है और साथ ही उनके कान भी संक्रमण ग्रस्त हो चुके हैं !
चलिए सारी कसम छोड़िए… और पत्रकारिता की आड़ में चल रहे इस धंधे की कसम खाकर बोल दीजिए अध्यक्ष जी – कि इस वीडियो में जिस आदर्श श्रीवास्तव का नाम महिला ले रही है.. वो आदर्श श्रीवास्तव आपके संगठन का उधारी संस्थापक नही बल्कि मशहूर तेलगु फ़िल्म एक्टर “आदर्श बालकृष्ण” है ..(जिस पर पत्रकारिता का धौंस दिखाकर तीन सौ रुपये का नाश्ता हजम कर जाने का आरोप लगा है ) !
आपको आपके अखंड, अविरल, अधपके और अधूरे ज्ञान की कसम (जो कि है ही नहीं ) अध्यक्ष जी :- अपने इस उधारी संथापक के सिर पर भस्मासुर की तरह अपना हाथ रखकर कसम खाते हुए कुछ न कुछ जरूर बोलिये ! क्योंकि आज पूरा का पूरा ‘पत्रकारिता कुटुंब’ आपके सम्मान में 90 डिग्री पर नज़रें झुकाए हुए आपकी ओर निहार रहा है !
वाकई अध्यक्ष जी, आप और आपके लाडले संस्थापक ने तो आज वास्तव में “पत्रकार संगठन” के जलवे का वास्तविक अर्थ साकार कर दिया है !

