“सेटिंग फेल, गुटबंदी बे-असर ! जिला अस्पताल पर “जाँच का हथौड़ा भारी” !

लखनऊ : आप सभी को याद होगा कि फर्जी मेडिको लीगल बनाकर निर्दोषों को जेल भेजने, दोषियों को बचाने तथा तमाम तरह की अनियमितताओं के मामले में तत्कालीन एडी हेल्थ गोरखपुर मंडल द्वारा जिला अस्पताल के पूर्व एसआईसी राजेन्द्र ठाकुर को दोषी करार दिया जा चुका है । शासन के हस्तक्षेप के बाद इन्हें कुर्सी से हटाकर इनके मूल कार्य पर लगा दिया गया, परंतु इस मामले में हायर लेवल पर अभी भी जाँच जारी है ।

वर्तमान में यह जाँच निदेशक, पीएचसी कर रही हैं । बताया जा रहा है कि “ठाकुर साहब” ने गोटी तो यहाँ भी सेट कर ही ली थी, और “जाँच अधिकारी” ने फर्जी मेडिको लीगल के मूल के उपलब्ध न होने का बहाना बनाकर “ठाकुर साहब” को क्लीन चिट देते हुए रिपोर्ट “प्रमुख सचिव स्वास्थ्य” को भेज दी थी । “जाँच अधिकारी” द्वारा ठाकुर साहब को दी गयी क्लीन चिट तब सवालों के घेरे में आ गयी.. जब जाँच पत्रवालियों पर मूल कागजातों के उपलब्ध होने का पता दर्ज मिला और “प्रमुख सचिव स्वास्थ्य” ने जाँच में खामी मानते हुए फ़ाइल को फिर से वापस भेज दिया । “ठाकुर साहब” के अरमानों पर फिर से “वज्रपात” हो गया । “ठाकुर साहब” की धड़कने तो पहले से ही बढ़ी हुई थी, लेकिन अब बताया जा रहा है कि इस पत्र के बाद “जाँच अधिकारी” की भी धड़कने बढ़ चुकी हैं । मतलब “ठाकुर साहब” यह तय करके बैठे हैं कि, यदि वो “नपे तो अकेले नहीं नपेंगे” !

ऊपर दिए गए पत्र में ठाकुर साहब के भ्रष्टाचार में साथ देने का आरोप लगाते हुए “जाँच अधिकारी” के खिलाफ भी “अभियोजन संस्थित” किये जाने की अनुमति शासन से मांगी गई है । प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पत्र के बाद “जाँच अधिकारी” ने स्वाथ्य विभाग गोरखपुर के “मण्डल कार्यालय” से “ठाकुर साहब” द्वारा तैयार किये गए “फर्जी मेडिको लीगल” के कार्बन कॉपी की मांग कर डाली है ।

“जाँच अधिकारी” की नीयत पर सवाल..!

जब तत्कालीन एडी हेल्थ की रिपोर्ट में यह लिखा है कि प्रश्नगत मेडिको लीगल रिपोर्ट की कार्बन प्रति देखकर ही छायाप्रति का मिलान किया गया है, तो इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ?

जब शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए शपथ पत्र पर यह अंकित है कि “कार्बन प्रति” जिला अस्पताल तथा मूलप्रति न्यायालय के रिकॉर्ड में उपलब्ध है तो जाँच अधिकारी ने इस रिकॉर्ड को जाँचने की जहमत क्यों नही उठायी ?

जाँच अधिकारी होने के नाते न्यायालय जाकर मूल प्रति का अवलोकन क्यों नहीं किया गया तथा जिला अस्पताल से कार्बन प्रति को क्यों नही मंगवाया गया ?

जब मेडिको लीगल रजिस्टर के देखरेख की जिम्मेदारी एसआईसी की है तो मेडिको लीगल रजिस्टर के पन्ने फाड़कर उसमें कूटरचित पन्ने चस्पा कैसे हो गए..और इसकी जिम्मेदारी से एसआईसी को किस आधार पर बचाया जा सकता है ?

जाँच से जुड़े उपरोक्त महत्वपूर्ण सवालों तथा परिस्थितियों के अनुसार क्या “ठाकुर साहब” का साथ देने वाली “जाँच अधिकारी” दोषी नही हैं ?

क्या आकंठ भ्रष्टाचार के इस मामले और इस मामले में शामिल लोगों को”अदालत” तक नहीं घसीटा जाना चाहिए ?

तमाम सेटिंग्स,जुगाड़ और दौड़ धूप के बाद भी “ठाकुर साहब” को बद्दुआओं और घोटालों के इस समंदर से राहत मिल पाने के कोई आसार दिखाई नही दे रहे हैं । परिस्थितियाँ बता रही हैं कि “आकंठ भ्रष्टाचार” की यह रेलगाड़ी “अदालत” की पटरी पर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है !

By systemkasach

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