सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने उन सभी पीड़ितों को एक बड़ी राहत दी है जो किसी भी मामले में किसी भी जाँच अधिकारी की पक्षपातपूर्ण और विद्वेष की भावना से की गई जाँच का दंश अब तक झेल रहे थे । सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में साफ कह दिया है कि “जो लोग जाँच करते हैं, वे खुद भी जाँच से ऊपर नहीं हैं..इसलिए पक्षपातपूर्ण तरीक़े से की गई जाँच के मामलों में अब उनपर भी FIR होगी”।
देश की राजधानी के पूर्व पुलिस आयुक्त और वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश ने न केवल कानून के प्रति समानता का संदेश दिया है, बल्कि उन तमाम पीड़ितों के लिए राहत भी दी है जो सालों से पक्षपातपूर्ण और विद्वेषपूर्ण जाँच का दंश झेलते रहे हैं । इस आदेश से यह साफ हो गया कि अगर कोई जाँच अधिकारी झूठे दस्तावेज गढ़ते हुए, तथ्यों से छेड़छाड़ कर, तथा वास्तविक तथ्यों को नजरअंदाज कर किसी पक्ष विशेष को बचाने या फँसाने की कोशिश करेगा.. तो वह भी अब कानून की कठघरे में खड़ा होगा । यह फैसला उन आवाज़ों को बल देता है जो अब तक दबा दी जाती थीं । फैसले का सार यह है कि जाँच निष्पक्ष होनी चाहिए, न कि मनमानी का औजार !

सालों से जनता यह सुनती आई थी कि “कानून सबके लिए बराबर है”, लेकिन हकीकत में यह बराबरी आम आदमी तक सीमित दिखाई देती थी । अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि “जाँच करने वाले भी जाँच के दायरे में आएंगे,” तो सिस्टम के उन चहेते अफसरों की नींद उड़ना तय है, जो अब तक खुद को कानून से ऊपर समझते रहे हैं । यह फैसला उन तमाम पीड़ितों के लिए राहत लेकर आया है, जो वर्षों से ऐसे अधिकारियों की मनमानी का दंश झेल रहे थे । अदालत ने माना कि अगर जाँच अधिकारी ईमानदारी की बजाय निजी रंजिश या दबाव में काम करता है, तो वह न्याय व्यवस्था की नींव को ही खोखला करता है
जाँच की प्रचलित परिपाटी….
देश में अक्सर यह कहा जाता था कि – “जाँच अधिकारी चाहे जैसा चाहे रिपोर्ट लिख दे, पीड़ित के पास चुपचाप सहने के अलावा कोई चारा नहीं ।” लेकिन अब यह कहावत उलट सकती है । क्योंकि इस आदेश के बाद अब ‘सिस्टम के देवता’ भी कटघरे में खड़े किये जा सकेंगे । सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला यह पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि 197 CRPC हालिया (218 BNSS) का कवच उन लोकसेवकों को नही मिल सकेगा… जिनके विरुद्ध किसी भी तरह के अपराध या अनियमितता के प्रमाण मौजूद हों ।
संदेश बिल्कुल साफ है…
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि न्याय केवल आरोपी और पीड़ित के बीच ही नहीं, बल्कि जाँच करने वालों की नीयत पर भी निर्भर करता है । और जब जाँच ही संदिग्ध हो, तो न्याय की उम्मीद करना बेमानी है । यह फैसला केवल एक पूर्व अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज कराने भर का नहीं है बल्कि यह संदेश है कि, न्यायिक व्यवस्था में जनता का भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है । सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अब यह तय कर दिया है… कि अब उन पीड़ितों को भी इंसाफ मिल सकेगा, जिन्हें अब तक “जाँच की ओछी राजनीति” ने बहुत सताया है !
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सुप्रीम कोर्ट जाँच अधिकारी भी जाँच के दायरे में pdf

