“तू खींच मेरी फोटू पिया : फर्जी पत्रकारिता का नया फार्मूला”

गोरखपुर : पत्रकारिता की आड़ में फर्जीवाड़े का गणित आजकल सर चढ़कर बोल रहा है । तार-तार हो चुकी इज्जत का मार्केट तो इस कदर क्रैश हुआ है कि सही मायनों में पत्रकारिता करने वाले अब खुद को पत्रकार बताने में ही शर्म महसूस करने लगे हैं । यदि आपको भी पत्रकारिता की आड़ में लफ्फाजी करनी हो तो बस एक माइक आईडी प्रिंट करवा लीजिए—“न्यूज़ इंडिया”, “भारत चैनल”, या फिर “आज का सच” “सिस्टम का घच्च” “मुंडेर का कव्वा” या “दलाली जिंदाबाद” और बन जाईये पत्रकार !

इसके बाद थानों-चौकियों में ऐसे घुसिए… जैसे मानो एडिटर-इन-चीफ़ हों । बस ध्यान ये रहे कि..वहां अपने ज्ञान रूपी कचरे का प्रदर्शन भूल से भी न करें….मुँह बंद रखें और जरूरत के अनुसार हाँ में हाँ मिलाते रहें….जरूरत पड़े तो वहाँ अपने दो चार “जगलर टाइप कारनामो” की चर्चा अवश्य करें….कभी अकेले नही, बल्कि अपने “जगलरी झुंड” के साथ ही किसी अधिकारी के कक्ष में प्रवेश करें….व्हाट्सएप्प पर नियमित रूप से कुछ न कुछ “रायता” अवश्य फैलातें रहें…..माल और हैसियत देखकर ही किसी की पैरवी करें…..हमेशा एक “अखबारी धुरंधर” की शरण मे रहकर उसे प्रसाद चढ़ाते रहें, ताकि आपके इतिहास पर वो “पालथी” मारे बैठा रहे…..और हाँ “तू खींच मेरी फोटू, तू खींच मेरी फोटू पिया” का कांसेप्ट कभी न भूलें, और वर्दीधारियों तथा अधिकारियों के साथ सेल्फी अवश्य लेते रहें….क्योंकि यही वो “हाइब्रिड दाना” है जिसे सोशल मीडिया पर छितराकर आप शिकार फँसाने में सफल होते हैं ! और सबसे अहम बात यह कि ,विषय वस्तु समझ मे आये न आये…. लेकिन अधिकारियों के सामने कैमरा घुमा कर वो पुराना सवाल जरूर फेंक कर मारें कि “सर, क्या कहना चाहेंगे ?”

ऐसा ही एक वाक्या गोरखपुर से तब सामने आया जब “न्यूज़ इंडिया” की रजिस्टर्ड माइक आईडी एक कॉन्ट्रेक्टर के “पर्सनल न्यूज़ प्लेटफार्म” पर घूमने लगी । अमूमन ऐसे काम जनता और अधिकारी वर्ग दोनो को भ्रम में डालकर अपना उल्लू सीधा करने के लिए किया जाता है ।

क्या कहता है “न्यूज़ इंडिया” का आधिकारिक बयान ?

“ऐसा हमारी जानकारी में नही है और इसे अभी चेक कर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी “। इस “आधिकारिक बयान” के कुछ मिनट बाद चमत्कारिक तौर पर  फेसबुक लिंक को डिलीट मार दिया गया, लेकिन इस बयान से यह स्पष्ट हो गया कि “न्यूज़ इंडिया” की रजिस्टर्ड माइक आईडी का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जा रहा था ।

कुछ दिन पहले इसी तरह एक अन्य चैनल की माइक आईडी भी इसी कॉन्ट्रेक्टर के फेसबुक न्यूज़ प्लेटफार्म पर तैरती हुई दिखाई दी थी…उस वक्त एक ऐसी खबर का प्रसारण किया गया था..जिसमे दो पत्रकार साथियों में से एक यात्री बनकर कार में सवार हो गया था और दूसरा पत्रकार बनकर सवाल दागे जा रहा था ।

इन हालातों में सबसे बुरी स्थिति तो उस जनता की हो जाती है, जिसे कभी असली तो कभी नकली पत्रकारिता की ब्रेकिंग न्यूज़ के जरिये नचाया जाता रहा है । अब सवाल यह उठता है कि पत्रकारिता का कंडक्ट क्या इस तरह की लफ्फेबाजी की इजाजत देता है ? क्या इसे छल और प्रतिरूपण की श्रेणी में नही रखा जाना चाहिए ? क्या इसे फेक न्यूज़ की कैटिगरी में नही डाला जाना चाहिए ? और क्या ऐसी हरकतों को जागरूकता के तहत पब्लिश नही किया जाना चाहिए ?

या फिर यह मान लें कि कुछ हो या न हो..बस धंधा चलता रहना चाहिए !

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

Related Post