“काजू” भुनी प्लेट में
“व्हिस्की” गिलास में
“उतरी” है “पत्रकारिता”
“गटर” की तलाश में !!
गोरखपुर : एकबार “पत्रकारिता के धुरंधर” कहे जाने वाले “महाशय” ने हमसे कहा कि “गोरखपुर की पत्रकारिता क्षेत्र में कोई भी तुमसे खुश नही है” ! हमने कहा कि “जनाब”….. यदि हर कोई आपसे खुश है… तो आप “इंसान” नही बल्कि “जोकर” हैं ! बस यही बात उन्हें चुभ गई और फिर दुबारा कभी उनसे बात नही हुई
बहरहाल, प्रेस क्लब चुनाव… का नाम सुनते ही लगता है जैसे पत्रकारिता की “पवित्र पाठशाला” में “लोकतंत्र का महाकुंभ” लग गया हो….लेकिन हकीकत में आज जो हुआ वो “महाकुंभ नही”, बल्कि (मुर्ग-कुंभ) साबित हुआ । वोट की खातिर 60 किलो मुर्गा और 700 अंडों की बलि दे दी गई । लोकतंत्र को बचाने के लिए मुर्गों और उसकी पीढ़ियों द्वारा दिये गए इस बलिदान को भारत का “संविधान” कभी भुला नही सकेगा ।
“पत्रकारिता” के “बलवंत राय” का पट्टा अपने गले मे बांधे… झुंड के रूप में पहुँचे “आयोजकों” का दावा है कि यह दावत “समर्पण और एकजुटता” की निशानी थी…लेकिन स्थितियां बताती हैं कि यह दावत मात्र “भूख की एकजुटता” के कहानी थी । देश के चौथे खंभों की “दावतशाला” का नज़ारा देखने लायक था..जहाँ “भूख से कुपोषित” हो चुके पत्रकारिता की अदालत में मुर्गे को “आरोपी” बना दिया गया…और 700 अंडे “गवाही” देते-देते टूट गए !
आज पत्रकारिता का मूल कर्तव्य “भूख” है शायद इसलिए पुलिस की “प्रेस कॉन्फ्रेंस” में “बिस्कुट” पर ऐसे टूट पड़ते हैं, जैसे खबर नहीं, बल्कि भोजन ही उनका “मूल अधिकार” हो ! जब पीसी में नाश्ते की प्लेट का “बॉस मारता नमकीन” नही बचता तो वोट खरीद “आयोजन” में तो पूरा चिकन था ! इसे कैसे छोड़ा जाता ?
दावत का आयोजन करने वाले बोले कि… खाइए पीजिए… मगर वोट मत भूलिए..! लेकिन ये सुनते ही हमारे “गुप्ता जी” एकदम से “ठिठक” गए ! क्योंकि बेचारे अभी तक “वोटर” बने ही नहीं । सोचने लगे अब कहीं पत्तल न उठाना पड़ जाए..? लेकिन गुप्ता जी के हौसलों को उड़ान तब मिली…जब उन्होंने जाना कि पत्रकारिता के इस कैम्प में केवल वही एक “रिफ्यूजी” नही हैं… बल्कि उनके जैसे कई “रिफ्यूजी” वहाँ पहले से मौजूद हैं ।”पत्रकारिता” की यह स्थिति देखकर कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि इस पृथ्वी पर …सिर्फ “कुत्ता” ही एक ऐसा प्राणी है… जो “मोहमाया” से पूरी तरह मुक्त है । “2 करोड़” की “गाड़ी” पर “2 मिनट” में “मूत” के चला जाता है ।
हालांकि कुछ ऐसे ईमानदार भी थे….जिन्होंने भूख की इस “पाठशाला” से दूरी बनाई और “सोशल मीडिया” पर तस्वीर भी नहीं डाली। पर उनकी संख्या उतनी ही थी…जितनी “न्यूज़रूम” में सच बोलने वालों की रहती है ! बहरहाल, चुनाव नतीजे जो भी आएँ, लेकिन दावत फ़ना हो चुकी है ! लोकतंत्र की इस बारहमासी फसल में मुर्गे की खाद और अंडों का योगदान “सर्वोपरि” रहेगा।
“कोहनी” पर टिके हुए लोग
“टुकड़ों” पर बिके हुए लोग
करते हैं पत्रकारिता की बातें
ये “गमले” में उगे हुए लोग


