गोरखपुर : कहते हैं अक़्ल अगर कभी छुट्टी पर चली जाए तो इंसान अजीब–अजीब “करतब” दिखाने लगता है । दारूबाज “दरगाही पत्रकार” कल से फेसबुक पर “वेश्याओं” के दुपट्टे से लिपटे “मरदूद” की फोटो लगाकर “बाघ का करेजा” बजा रहा हैं । विरोधियों से बहस में हारे, काम में हारे, इज्जत में हारे…और जब हर तरफ़ मात खा गए तो ”अंत में सोच लिया,”चलो अब “घटियाई” ही आजमा लेते हैं ।”
और फिर शुरू हुआ उनका महान मशवरा सम्मेलन….“कॉल गर्ल” बुला लो..”वेश्याएं” बुला लो, ‘भाँड़” लोगों को बुला लो….झूठे आरोप लगा दो…किसी तरह इनको निपटा दो !” लेकिन किस्मत को भी मज़ाक करने में मज़ा आता है ! चाल चली, जाल बिछाया…और खुद ही उसमें मुँह के बल गिर पड़े । जो दूसरों को फँसाने निकले थे…सबसे पहले वही पकड़ लिए गए ।
अब असली मजे की बात सुनिए ! “शर्म ओ हया” तो ये जानते नहीं…और उसपर “बेरुखी” और “बेहयाई” का भंडार ऐसा…जो शायद ही कहीं देखने को मिले ! “बदनामी” मुफ्त में मिली है और “किरकिरी” बोनस में…लेकिन साहब की “बेशर्मी का लेवल” देखिए… कि “इज्जत” तार-तार, “चालें” नाकाम, “योजना” फेल…और “महायोजना” पिछवाड़े में चली गयी । लेकिन साहब “फेसबुक’ पर DP लगाकर “बैकग्राउंड’ में बजा रहे हैं..“बाघ का करेजा”…. अरे करेजा या कटोरा ? “करेजा बाघ” का और सहारा “वेश्याओं’ का ? बनेंगे “मर्द” और “मर्दानगी” दिखाई देगी “वेश्यालयों” में ! “गजब करेजा” है भाई ! “अल्लाह” करे कि ऐसा “नायाब करेजा” तुम्हारे पूरे घर “खानदान” को मिले ।
ये वही लोग हैं जो असल ज़िंदगी में चूहे की तरह भागते हैं,और सोशल मीडिया पर शेर का गुर्राना एक्टिंग में करते हैं। इतनी बार और इतना नीचे तक गिर चुके हैं कि अब जमीन भी कहती है…“भाई, थोड़ा रुक जाओ, मैं भी थक गई हूँ !” सच कहें तो इनका पूरा जीवन एक “महाकाव्यीय सर्कस’ है…जहाँ “बुद्धि’ दर्शक दीर्घा में बैठी ताली बजाती है…और “बेवकूफ़ी” स्टेज पर मुख्य कलाकार बनकर नाचती है ।

