प्रदेश आज उस भयावह सच्चाई से रूबरू है जहाँ “लिक्विड कोडीन कफ सिरप” ने मासूम बच्चों की जान लेकर एक पूरे तंत्र की क्रूरता और भ्रष्टाचार को बेनकाब कर दिया है । नशे के कारोबारियों ने बच्चों की लाशों पर अपनी सल्तनत खड़ी की, और सत्ता–प्रशासन से लेकर स्थानीय निगरानी तंत्र तक सब किसी न किसी रूप में इस अंधे कारोबार की छाया में फलते–फूलते रहे । अफसर छुट्टियों के पैकेज बटोरते रहे…सफेदपोश विदेशों में होटल खरीदते रहे… और एक मामूली सिपाही तक करोड़ों की अघोषित संपत्ति का मालिक बन बैठा ।
यह रैकेट एक जिले से दूसरे, फिर प्रदेश से बाहर कई राज्यों और यहाँ तक कि दुबई तक फैल गया और अफसर “कंबल” ओढ़कर “घी” पीते रहे । जब एक “बर्खास्त सिपाही” के पास इतनी अकूत दौलत मिली हैं, तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इस खेल में शामिल बड़े अफसरों और राजनीतिक संरक्षकों की तिजोरियों में क्या–क्या “दफन” होगा । मासूमों की लाश पर “नशे” का यह खुला “नंगा नाच” चलता रहा और भ्रष्टाचार का ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ किसी मेमने की तरह “मिमियाता” रहा ।
यह तथ्य अब किसी पर्दे में नहीं कि विश्व की अर्थव्यवस्था दो शक्तियों—”फार्मास्यूटिकल लॉबी” और “हथियार आपूर्तिकर्ताओं”—के इर्द–गिर्द घूमती है। व्यवस्था आज भी उसी “रसूख” और “हाईली कनेक्टेड” लोगों से संचालित होती है…जहाँ अपराध, सत्ता और प्रशासन का गठजोड़ एक आम आदमी की हर उम्मीद को “कुचल” देता है । लेकिन फिर भी आम इंसान एक “भरम” लेकर जीता है ! इस “भरम” को भी एक न एक दिन मरना ही है ! इसलिए गुजारिश है कि इसे धीरे धीरे “मारिये” हुजूर
एक वर्ष पूर्व इस कफ सिरप खेल का पर्दाफाश करने वाले बनारस के राज आनंद सिंह की “ड्रग माफियाओं” ने ज़हर देकर हत्या कर दी । वे जाँच की माँग करते–करते दम तोड़ते रहे और शहर के अफसर “अफीम” चाटकर सोते रहे । यदि उस समय कार्रवाई हो जाती, तो न जाने कितने मासूमों की जानें बच सकती थीं ।
गोरखपुर का उदाहरण भी सामने है…अगस्त 2022 में लगभग 2 करोड़ रुपये की “कोडीन सिरप” की खेप पकड़ी गई, पर व्यवस्था ने सिर्फ ड्राइवरों–खलासियों को मोहरा बनाकर पूरे मामले पर लीपापोती करने का खाका खींचना शुरू कर दिया । जब “सिस्टम का सच” के फाउंडर ने “स्टिंग ऑपरेशन” कर बड़े सबूत तत्कालीन मंडलायुक्त के सामने रखे…तो मंडलायुक्त साहब अचानक लंबी छुट्टी पर चले गए । “स्टिंग” के प्रसारित होते ही एक तत्कालीन आईपीएस अधिकारी ने इस मुद्दे को व्यक्तिगत मसला बनाते हुए उस पत्रकार पर मुकदमों की झड़ी लगा दी । दो साल के अंदर तड़ातड़ इतने मुकदमे ठोके गए..जितने 25 सालों के गोरखपुर प्रवास के दौरान उस पत्रकार और उसके “खानदान” ने भी नहीं देखे थे ! “कोडीन सिरप” और “ड्रग माफिया” का मसला उठाते ही पुलिस ने अपराधी साबित करने के लिए अपने तरकश में रखे “हिस्ट्रीशीटर और गैंगेस्टर” जैसे “अमोघ अस्त्र” पत्रकार पर दाग दिए …पुलिस जीप से ठोकर मारकर “अपहरण” और “हत्या” की कोशिशें हुई….जेल तक में “निगरानी” करवाई गई…घर की “बिजली” काट दी गयी और उस पत्रकार के खिलाफ एक अदद सबूत की खोज में भटकती हुई गोरखपुर की “करामाती पुलिस” बिहार राज्य तक का चक्कर लगा आई ।
ये बात अलग है कि इस सारे मामले की एक्वायरी अब “सुप्रीम कोर्ट” के हवाले है…लेकिन क्या ये सवाल नही है कि, आज भी “दरिंदों” को संरक्षण देने के लिए…. मुद्दा उठाने वालों के साथ दरिंदगी शुरू कर दी जाती है । आज भी प्रशासन को यह बार बार बताया जा रहा है कि अवैध गतिविधियों का अड्डा बने गोरखपुर के एक “कमज़र्फ” और “अय्याश” मुतवल्ली वाले मसले को देखिए…क्योंकि मसला कत्तई सामान्य नही है, बल्कि उस हकीकत का है…जिसके पीछे 2019 में पूरा गोरखपुर का प्रशासनिक अमला हाथ धोकर पीछे पड़ा था । लेकिन फिर होगा वही कि,किसी बड़ी घटना के बाद ही व्यवस्था की “तंद्रा” टूटेगी ! किसी के पास 10 ग्राम “गांजा” दिखाकर “गंजा” कर देने वाले कुछ भ्रष्ट वर्दीधारियों की “तंद्रा” तभी टूटती है… जब वो व्यवस्था की “शमशान” पर पड़ी कुछ लाशों को गिन लेते है । कानून भी वही है कि यदि मुँह से “जातिसूचक शब्द” निकल जाए तो “जेल” और यदि उन्ही “जातिसूचक शब्दों” से “प्रमाण पत्र” बन जाये तो “नौकरी” ! इस “कोडीन सिरप” मामले में अब “ईडी” भी अपनी जाँच शुरू कर चुकी है… मतलब मसला काफी बड़ा है लेकिन अभी तक इस मामले में सिर्फ छोटी मछलियों का ही शिकार हुआ है ।
इसलिए व्यवस्था से यही कहना पर्याप्त है कि—
“कोडीन सिरप” के इस भयावह कांड में किसी भी बड़े नाम को “क्लीन चिट” देने से पहले, एक बार अपने “ढाई साल” के बच्चे का “चेहरा” अवश्य देख लीजियेगा ।

