2019 की राख से भी ज़हरीली कथा—दरगाह की आड़ में पलता पाप-प्रबंधन” !

गोरखपुर : गोरखपुर की “पाक-ए-नूर दरगाह” की “पाकीज़गी” की आड़ में फैलाए जा रहे अंधेरे साम्राज्य का नक़ाब अब तेजी से उतर रहा है । वर्षों से धार्मिक आस्था की आड़ में काले धंधों, अय्याशियों और अवैध साम्राज्य का महल खड़ा करने वाले “काज़ी इखलाक़” बने “इकरार अहमद” की कहानी अब नए मोड़ पर पहुँच चुकी है । पुलिस की पूछताछ से कई दिनों तक बचता फिरने वाला “इकरार का गुर्गा “नदीम काग़ज़ी” आखिरकार आज ढह गया । जो कल तक अपना “दामन” पाक बता रहा था, जो कल तक इकरार को पहचानने से इंकार कर रहा था, उसने आज मान लिया कि उस “हनीट्रैप गैंग” के तहरीर की कॉपी उसे अपने “आक़ा इखलाक़” बने “इकरार अहमद” से मिली थी । “गुर्गा तो गुर्गा” बल्कि खुद मुर्गा बने “इकरार” ने भी कुबूल कर लिया है कि वेश्याओं के हाथ से निकल कर दिल्ली से चली यह तहरीर चंद मिनटों बाद ही इस नामाकूल के हाथ इसलिए पहुँची..क्योंकि वेश्याओं से इसका पुराना ताल्लुक रहा है ।

सच तो यही है इकरार मियां कि —

सौ बार अँधेरा जीत सकता है, पर एक सूरज बाकी सारे हिसाब चुकता कर ही लेता है । “वेश्याओं” की आड़ लेकर पर्दे के पीछे से लोगों पर झूठे बलात्कार के मुकदमे ठोकने का जो गंदा, घिनौना और शर्मनाक खेल “काज़ी इखलाक़ इकरार” के इशारों पर शहर में आजतक चलता रहा है…उसका जादू अब दरकने की ओर है ।
और हाँ—इस बार भी हो सकता है कि, अपना मान सम्मान बेंचकर फिर से कोई “कुकुर” इकरार के फेंके हुए टुकड़ों पर लपकने दौड़ पड़े… लेकिन इस बार “इंतजामात’ ऐसे हैं कि… हर एक “खयानतजदा” हाथ खाली ही रहेंगे ।

इतिहास क्या कहता है ?

इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि इकरार अहमद ने दरगाह की आड़ में अतिक्रमण का साम्राज्य खड़ा कर अव्यवस्था पैदा करने के नापाक मंसूबों को 2019 में भी हवा देने की कोशिश की थी । 2019 में “काज़ी इखलाक़” बने इकरार ने दरगाह की “पाकीज़गी” को ढाल बनाकर अतिक्रमण का साम्राज्य खड़ा किया था। हालात इतने बिगड़े कि प्रशासन को “बुलडोज़र” का रुख दरगाह की तरफ मोड़ना पड़ा—और जैसे ही “बुलडोजर’ रूपी दानव का रूख दरगाह की ओर मुड़ा…वैसे ही इकरार के फेंके हुए टुकड़ों पर पलने वाले कुछ “कुकुरमुत्ते” टाइप पेटकारों ने “गंगा–जमुनी तहज़ीब” और “हिन्दू मुस्लिम आस्था” का “रांड रूदन” शुरू कर दिया । कहाँ हैं आज वे कुकुरमुत्ते ? जब इसी पाक दरगाह की आड़ में अवैध फंडिंग से लेकर “बेगम जान” जैसी “अय्याशी” की पटकथाएँ लिखी जा रही हैं ?

पत्रकारिता की आड़ में कुफ्र में तब्दील हो चुके चंद भांडों की संगीन सच्चाई तो यही है —कि यदि शर्म आती है… तो उसी मे डूब मरो और न आती हो… तो अपनी कलम… अपनी ही छाती में “घोंप” लो ! जाकर अपने बीवी बच्चों से कह दो कि जो निवाला तुम उन्हें खिलाते हो… वो निवाला हद दर्जे के “घटियापने” में सना और “वेश्यायों” के दुपट्टे में ढँका होता है ।

उस वक्त भले ही अदालत से इकरार के नापाक मंसूबों को राहत मिल गयी थी….लेकिन इस बार दरगाह की पाक मुकद्दस जगह खुद नापाक हाथों से निज़ात पाने के लिए छटपटा रही है । और शायद इसीलिए दरगाह की आड़ में छिपे “ऐशगाह” के पन्ने फिर नए सिरे से पलटे जा रहे हैं ! उस वक्त अदालत से भले “काज़ी इखलाक़” बने “इकरार” को राहत मिल गई थी…लेकिन इस बार दरगाह की “पाकीज़गी” खुद पुकार कर कह रही है—कि उसके आंगन में छिपे “ऐशगाह” की सड़ी हुई परतें अब नए सिरे से उखाड़ी जाएँ…क्योंकि इस बार तो खुद- “खुदा” भी “काज़ी इखलाक़” बने “इकरार” के साथ नही है ।

By systemkasach

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