जिस खुलासे और सच पर मुकदमा लिखा गया…आज उसी “सच” पर शासन की मुहर !

गोरखपुर : खबर यह है कि गोरखपुर के जिला अस्पताल तथा महिला जिला चिकित्सालय में कार्यरत जिन लोगों को प्रमाणों के आधार पर भ्रष्टाचारी बताते हुए “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” ने अगस्त 2024 में बेनकाब किया था…वही लोग अब शासन के निर्देश पर हुई जाँच में दोबारा दोषी करार दे दिए गए हैं । सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार साबित हुआ… बल्कि सवाल यह है कि इस सच से कोतवाली थानेदार और एक अखबारी दलाल को इतनी तकलीफ क्यों हुई थी ? सच उजागर होते ही सितंबर 2024 में भ्रष्टाचारियों ने पहले ई-मेल के जरिए “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” को खबर हटाने की धमकी दी । और जब दबाव के बावजूद खबर नहीं हटी, तो कोतवाली थानाध्यक्ष से सांठ गांठ कर “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के “फाउंडर” के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया गया । आज,जब उसी खबर की सच्चाई पर शासन ने भी अपनी मुहर लगा दी है, तब वही थानेदार साहब क्या जवाब देंगे ? क्योंकि वो खुलासा उस वक्त भी “सच” था और आज तो वह “सरकारी रिकॉर्ड” में दर्ज सत्य भी बन चुका है ।

खबर के प्रसारण के तुरंत बाद ही गोरखपुर जिला चिकित्सालय के तत्कालीन कार्यवाहक प्रमुख अधीक्षक राजेन्द्र ठाकुर के खिलाफ जाँच बैठी, और उन्हें दोषी मानते हुए कुर्सी से हटा दिया गया और अभी भी जाँच शासन स्तर पर प्रचलित है ।

अब उसी जाँच श्रृंखला में जिला महिला अस्पताल के लैब टेक्नीशियन बृजेन्द्र बीर सिंह और जिला चिकित्सालय के लैब टेक्नीशियन शेष चौधरी को भी दोषी करार दिया गया है । यह उल्लेखनीय है कि बृजेन्द्र बीर सिंह को पहले भी गोरखपुर के तत्कालीन मंडलायुक्त एक आईएएस अधिकारी की जाँच में दोषी पाया जा चुका था । संभवतः इसी कारण मौजूदा जाँच अधिकारी ने उस रिपोर्ट पर खुलकर कुछ लिखने से परहेज़ किया है । और यह परहेज़ स्वाभाविक भी है, क्योंकि किसी आईएएस अधिकारी की जाँच रिपोर्ट पर प्रश्न उठाने की पदीय शक्ति इस मामले के जाँच अधिकारी के पास है ही नहीं । जाँच रिपोर्ट देखने के लिए नीचे लिखे REPORT पर क्लिक करें ।

Report

रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि जिला अस्पताल के फार्मासिस्ट अजय सिंह तथा सैनिटाइज़र खरीद में कमीशनखोरी करने और निजी प्रैक्टिस करने के मामले में एक चिकित्सक पर सबूतों के आधार पर जाँच अभी भी जारी है । फार्मासिस्ट अजय सिंह पर निजी लाभ के लिए विधि विरुद्ध तरीक़े से कार्य करने तथा इन कार्यों के जरिये घपलेबाज़ी के आरोप प्रमाणों सहित मौजूद हैं ।

इसी बीच पुलिस मुख्यालय और विभागीय मुखिया द्वारा जारी निर्देश साफ कहते हैं कि बिना साक्ष्य फर्जी चार्जशीट लगाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी ।

वहीं शीर्षस्थ न्यायालय का स्पष्ट आदेश है कि झूठे मुकदमे गढ़ने और उन्हें साबित करने की साजिश रचने वाले लोकसेवकों को धारा 197 सीआरपीसी का कोई संरक्षण नहीं मिलेगा । मतलब ऐसे पुलिसकर्मियों पर बगैर किसी विधिक बाधा के मुकदमा चलाया जा सकेगा ।

ऊपर पुलिस मुख्यालय तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला इसलिए दिया गया है क्योंकि इन तमाम निर्देशों और आदेशों के बावजूद कोतवाली थाने ने बिना किसी वास्तविक जाँच के न केवल इस मामले में मुकदमा दर्ज किया, बल्कि फर्जी चार्जशीट लगाने के लिए एक सुनियोजित हेराफेरी भी की गयी । अब यह हेराफेरी सिर्फ आरोप नहीं रही बल्कि इसके ठोस सबूत और इस मामले में की गई कथित डेढ़ लाख रुपये की डील के प्रमाण भी अब सामने आ चुके हैं । कौन कौन था इसमें शामिल, यह तो जाँच या न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। बहरहाल, पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह समझना ही होगा कि उनकी नाक के नीचे थानों और चौकियों पर तैनात कुछ लोग पूरे विभाग की मर्यादा को तार-तार करने के लिए किस-किस तरह के प्रपंच रचने में मशगूल हैं । इसीलिए इन तमाम प्रमाणों को सूबे के पुलिस मुखिया तक विधिवत पहुँचाया जा चुका है, ताकि वहाँ से होते हुए ये प्रमाण जिले के अधिकारियों तक पहुँचे और जिम्मेदारी तय हो सके ।

इस प्रकरण में दुराशय वश एकतरफा खबर छापने वाले हिंदुस्तान अखबार को विधिक नोटिस पहले ही भेजा जा चुका है..क्योंकि इस पूरे प्रकरण में इनके संस्थान में कार्यरत एक पत्रकार की संलिप्तता के आसार अब नजर आने लगे हैं । इसके बावजूद एक बार फिर भ्रष्टाचारियों के फेंके हुए टुकड़ों पर पलने वाले उस कथित पत्रकार से आग्रह है…कि अगर “जूठन” और “पत्तल चाटने” से फुरसत मिल गई हो, तो इस जाँच रिपोर्ट पर भी नज़र डाल लो… और अगर जरा सी भी “मर्यादा”, “आत्मसम्मान” और “जमीर” का अंश शेष रह गया हो, तो इसे प्रकाशित भी कर दो ।

मुद्दा : यह मामला प्रत्यक्ष रूप से मुझसे जुड़ा है क्योंकि यह खुलासा हमारे द्वारा ही किया गया था । इसलिए यह सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि उस नेक्सस के सच की गवाही है, जिसने इस खुलासे और सच को दबाने के लिए एक फर्जी मुकदमे और फर्जी तौर पर गढ़े गए चार्जशीट को हथियार बनाया था । आखिर क्या बात है जो थानों पर साक्ष्यों के बल पर खड़े मुकदमे तो नही लिखे जाते लेकिन फरेब मक्कारी और झूठ की बुनियाद पर खड़े मुकदमे निजी खुन्नस, धनलोलुपता और साजिश के तहत, बगैर किसी जाँच या औपचारिकता के ही दर्ज कर लिए जाते हैं । इस खुलासे की सच्चाई को शासन ने भले स्वीकार कर लिया हो लेकिन फर्जी मुकदमों के नेक्सस से जुड़े हर एक जिम्मेदारों को “कटघरे” में खड़ा किया जाना अब इस “लोकतांत्रिक व्यवस्था” को बहाल रखने के लिए बहुत आवश्यक हो चला है ।

By systemkasach

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