गोरखपुर : दैनिक जागरण ने एक बार फिर साबित कर दिया कि “जागरण” नाम सिर्फ काग़ज़ पर है लेकिन “ज़मीर” तो अब भी गहरी नींद में है । बिना जाँच, बिना “तस्दीक़” और बिना शर्म के ख़बरें नहीं बल्कि “अंदाज़े बयाँ” छापे जा रहे हैं । इस बार दैनिक जागरण के “गोरखपुर संस्करण” ने बिजली विभाग की “पोल शिफ्टिंग” की खबर में “सीएमओ गोरखपुर’ की फोटो और नाम ठूंसकर यह दिखा दिया कि “अख़बार’ में अब तथ्य नहीं बल्कि तुक्का चलता है ।

यह कोई पहली बार नहीं है । याद कीजिए कि छेड़खानी के एक प्रकरण में इसी अख़बार के एक पत्रकार ने नाबालिग़ लड़कियों की फोटो और नाम छापकर उनकी पहचान “सार्वजनिक” कर दी थी..कानून रोता रहा, “नैतिकता” दम तोड़ती रही और अख़बार अगले दिन फिर से मुस्कराता हुआ “स्टॉल” पर सजा दिखाई दिया

अगर इसे “पत्रकारिता” कहते हैं, तो फिर संगठित तौर पर की जाने वाली “डकैती” शब्द पर “पुनर्विचार” होना चाहिए…क्योंकि यह पाठकों के साथ ही नहीं बल्कि पाठकों के भरोसे के साथ की जा रही “संगठित लूट” है । अख़बारी पत्रकारिता की नसों में दलाली की इतनी “गाढ़ी चासनी” घुल चुकी है कि अब इन्सुलिन बनाने वाली “कंपनियों” ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं ।
इन अखबारी पेटकारों की तनख़्वाह भले पच्चीस हज़ार हो,लेकिन पेट तो “हराम” की कमाई से ही भरेगा । जूता “नाइकी” का, चड्डी “जॉकी’ की, और “ज़मीर” थाने के “मुंशी” के पास गिरवी रहती है । इनके पत्रकारिता की शुरुआत रोजाना पुलिस कार्यालय से होती है और शाम तक वहीं दुकान सजी रहती है…क्योंकि “खबर” भी वहीं मिलती है और “कस्टमर” भी । पेट की ख़ातिर ‘चमगादड़” बन चुके ये अख़बारी पत्रकार अब “पत्रकारिता” नहीं कर रहे बल्कि दलाली, चापलूसी, ट्रांसफर पोस्टिंग की फाइल-मैनेजमेंट का कोर्स चला रहे हैं । ये वही “पत्रकारिता” है जिसकी बदौलत आज तक हमें यह भी नहीं पता चल सका कि “केरल” देश का ऐसा पहला राज्य बन चुका है जहाँ तेल को दोबारा गर्म करना अपराध घोषित कर दिया गया है…और हम रोज़ चाँप रहे हैं “पकौड़ी’ समोसे और “लेगपीस” उसी तेल में…जिसमें कल की खबर तली गयी थी ।
अब यह पाठकों और अधिकारियों को तय करना है कि ये पत्रकार हैं या… “मासिक मेहनताने” पर चाटुकारिता का “राग मल्हार” गाने वाले “हैंडल्स” । “मोहमाया की पाश’ में जकड़ी पत्रकारिता आज तक इस “पाश” से आज़ाद नहीं हो पाई । इससे कई दर्जे बढ़िया तो “कुत्ता” है…..मोहमाया से इतना “विरक्त” कि “दो करोड़” की गाड़ी पर “दो मिनट” में “मूत” के चल देता है ।
जो लिखना था, लिख दिया मैंने…अब होगा यही कि…”जुगनू’ बैठकर “शराब” पियेंगे और सूरज को “गरियाना” शुरू करेंगे । अंत में कहूँगा यही कि….
कुहनी पर टिके हुए लोग..
टुकड़ों पर बिके हुए लोग..
करते हैं बरगद की बातें…
ये गमले में उगे हुए लोग !

