“राष्ट्रीय सुरक्षा” का मसला और चौकी तथा सिपाही स्तर की जाँच…सिस्टम का “नंगा सच” !

गोरखपुर : सुना है कि, गोरखपुर जनपद में “राजाओं-के-घाट” वाले साहब नाप दिए गए हैं । अब “नाप” दिए गए हैं कि कहीं “नाप देने” गए हैं…कह नही सकते । जब “राजाओं-के-घाट” का “अभयदानी तंत्र”….दरगाह पर बैठे गुंडे को “फरिश्ता” बताने के लिए…और “सफेद सच” को “स्याह झूठ” में तब्दील करने के लिए…जाँच को ही “फर्जीवाड़े तंत्र” में तब्दील करने की कोशिश करता है…तब अक्सर ऐसा ही होता है । इलाका गवाह है कि दरगाह पर बैठे एक-दो टके के गुंडे के लिए साहब ने “रसद, कुमक” और “संरक्षण” की ऐसी पाइपलाइन बिछा रखी थी…कि “सिंचाई विभाग” भी शर्मा जाए । ढिठई का आलम यह था कि “पीएमओ” से आई जाँच तक को भी फर्जी रिपोर्ट का “भीगा कंबल” ओढ़ाकर “ठंडा’ करने की कोशिशें की गई..और गुंडे के माथे पर बाकायदा “अभयदान का तिलक” चिपका दिया गया ।

इस प्रकरण से जुड़े सबूतों की गिनती तो इतनी ज्यादा हैं कि कानून की किताबें खुद “गवाही” देने “कटघरे” में आ जातीं । मगर साहब ने तो “दरगाह” पर बैठे उस “साँप” को “कानून की छाती” पर ही पालना ही मुनासिब समझा । एक “असलहा चोर” और “असलहा तस्कर” लेकिन फिर भी उसका “असलहा लाइसेंस” सुरक्षित !और पासपोर्ट को तो “भविष्य” की सुविधा के लिए खुला रखा गया है…ताकि कल कोई बड़ा “काण्ड” करके “सपोला” देश छोड़कर “फुर्र” हो सके ।

सपोले के खिलाफ देशविरोधी गतिविधियों के प्रमाण तो इतने हैं कि सीधा “टाडा-मकोका” की “इबारत” लिखी जा सकती है लेकिन राजाओं-के-घाट वाले साहब ने उस गुंडे को “अंतरराष्ट्रीय विश्वबंधु प्रमोशन अधिनियम” के अंतर्गत मानो विशेष छूट दे रखी थी । ये साहब जैसे लोगों की ही मेहरबानी है कि आज “दूध नाले में” “मूत्र प्याले में” “बलात्कारी एसी में” “पीड़ित थाने में” “अनपढ़ संसद में” और “दो टके के गुंडे दरगाह में” किराम-ए-औलिया बने बैठे हैं ?

यह बिल्कुल मत समझिए साहब कि फर्जी रिपोर्ट लगाने की बेचैनी सिर्फ आपको थी… बल्कि आपसे ज्यादा जल्दी तो जाँचकर्ताओं को थी । उन्हें भी ऐसी ही फर्जी रिपोर्टों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है…ताकि “रुखसार” के पीछे “पर्दादारी” कर रहे “पर्दानशीं” एक दिन “बेपर्दा” किए जा सकें । बहुत जल्द ही “दरगाह की छतरी” के नीचे पल रही “अवैध अर्थव्यवस्था” का ऐसा “महाविस्फोटक तंत्र” सामने आएगा कि कई चेहरों का रंग अचानक “स्याह” पड़ जाएगा । राजाओं के घाट का वह “बंदरगाह”…जो “अवैध क्रियाकलापों” का गढ़ बन चुका है….उसकी हर “फीडिंग पाइपलाइन” इतनी बेरहमी से काटी जाएगी कि…अवैध “आबो-हवा” का एक कतरा भी अब उस “रुखसार” से होकर गुजरने से इंकार कर देगा ।

हमारे व्यवस्था में जाँच से जुड़ी व्यवस्था की विडंबना को देखिए ।राष्ट्रीय सुरक्षा और घातक गैंग से जुड़े मसले की जाँच…”राजाओं के घाट” वाले एक ऐसे दरोगा को दे दी जाती है…जिसे प्रार्थना पत्र की भाषा ही समझ मे नही आई । अब उसने जाँच क्या की होगी और रिपोर्ट क्या लगाई होगी…यह “राज” नहीं…बल्कि “परिहास” है..आप भी सुनिए !

कुछ ऐसा ही हाल “शाहों-के-पुर” वाले “राय साहब” का भी था । सुप्रीम कोर्ट, राज्यपाल और सचिवालय से रेफर मसले की जाँच एक ऐसे सिपाही को सौंप दी गई जिसे “गुलरिहा” और “राजभवन” में फर्क समझाने के लिए “नक्शा” चाहिए था । जब हमने उसे याद दिलाने के लिए “गुलरिहा” थाने की घटना का जिक्र किया तो उसने “राजभवन” की चिट्ठी पर “गुलरिहा” वाली रिपोर्ट चस्पा कर दी । ये भी सुनिए !

अंग्रेजी में पत्र भेजने का मकसद मात्र यही था कि “फर्जी जाँच” वाली व्यवस्था से अधिकारी अवगत हों…और सोच यही थी, कि अंग्रेजी में लिखे गए पत्र जब समझ में नही आएंगे…तो “मातहत” इसे अपने अधिकारियों के सामने रखेंगे…और अधिकारी कम से कम गंभीर मसलों से अवगत हो सकेंगे । लेकिन हमारी व्यवस्था के “जाँबाज” तो “लैटिन” भाषा मे लिखे पत्र पर भी “फर्जी आख्या” लगाने में माहिर हैं । खैर…होना भी यही चाहिए था ताकि इस फर्जी जाँच व्यवस्था की असलियत “सुप्रीम कोर्ट” से लेकर “राजभवन” तक और “सचिवालय” से लेकर “पीएमओ” तक पहुँचे । इसलिए फर्जी रिपोर्ट लगाने वालों का “तहेदिल से आभार”… कि आपने “सच” को “दफनाने” की कोशिश में उसे और “ज़ोर” से “ज़िंदा” कर दिया ।

By systemkasach

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