संभल (यूपी) : संभल की CJM कोर्ट ने मुस्लिम युवक को गोली मारने के मामले में तत्कालीन CO अनुज चौधरी समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ़ FIR दर्ज करने का आदेश दिया है । अनुज चौधरी उस वक़्त संभल के CO थे और वर्तमान में फिरोजाबाद में ASP है । सोशल मीडिया के विभिन्न स्रोतों से प्राप्त पोस्ट से यह पता चला है कि संभल के SP विश्नोई साहब ने कोर्ट के इस आदेश को ही अवैध बता दिया है ।
भारतीय विधि व्यवस्था में यह सिद्धांत निर्विवाद है कि यदि किसी पक्ष को किसी न्यायिक आदेश से असहमति हो, तो उसका एकमात्र वैधानिक उपचार अपीलीय अथवा उच्च न्यायालय की शरण लेना है । ऐसी स्थिति में किसी कार्यपालिका अधिकारी, विशेषकर पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी द्वारा यह सार्वजनिक रूप से कहना कि “कोर्ट का आदेश अवैध है”, न केवल न्यायिक अनुशासन के विपरीत है, बल्कि प्रथम दृष्टया यह प्रश्न भी खड़ा करता है कि,क्या यह आचरण न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की परिधि में नहीं आता ? क्या किसी पुलिस अधिकारी को यह अधिकार प्राप्त है कि वह न्यायालय के आदेश की वैधता पर निर्णय दे ?
कानूनी स्थिति स्पष्ट है कि, दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अंतर्गत न्यायालय द्वारा पारित आदेशों की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार केवल उच्चतर न्यायालयों को ही है । किसी प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी द्वारा न्यायालय के आदेश को “अवैध” घोषित करना कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप की श्रेणी में आता है, जो संविधान के शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के प्रतिकूल है ।

इसी संदर्भ में यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि यदि न्यायालय का आदेश “अवैध” ठहराया जा रहा है, तो क्या गोरखपुर में वो सभी कार्यवाहियाँ “वैध” थीं जो यहाँ एस पी सिटी रहते हुए विश्नोई साहब द्वारा की गई थीं ?
गोरखपुर में ड्रग माफियाओं के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले और एस पी सिटी विश्नोई की कार्यशैली पर सीएम योगी को खुलेआम पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक करने वाले गोरखपुर के एक पत्रकार के विरुद्ध मात्र शक्ति प्रदर्शन के उद्देश्य से मौखिक आदेशों का निर्गमन किया जाना क्या वैध आदेश था ?
पत्रकार के घरेलू विवाद से संबंधित मुकदमों तथा अंतिम रिपोर्ट (Final Report) लग चुके मामलों को आधार बनाकर हिस्ट्रीशीट खोलना, क्या वैध आदेश था ? जबकि विधि और शासनादेश स्पष्ट रूप से कहता है कि हिस्ट्रीशीट के लिए सक्रिय आपराधिक प्रवृत्ति का ठोस आधार होना आवश्यक होता है ।
बगैर किसी ठोस आधार के उक्त पत्रकार का मुकदमे में चुपचाप नाम बढ़ाने के मौखिक आदेश का निर्गमन क्या वैध आदेश था ?
उक्त पत्रकार को मानसिक एवं सामाजिक रूप से प्रताड़ित करने के उद्देश्य से उसके आवास की विद्युत आपूर्ति को ही कटवा देना, जो कि प्रशासनिक दुरुपयोग की श्रेणी में आता है क्या वह आदेश वैध था ?
उक्त पत्रकार को पुलिस वाहन द्वारा ठोकर मारकर अपहरण करने का किया गया प्रयास, क्या वैध आदेश था जो कि गंभीर आपराधिक कृत्य की परिभाषा में आता है ?
जब उक्त पत्रकार इन दबावों के बावजूद भी आपके सामने नहीं झुका, तब उस पर गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर और मारक कानून का प्रयोग करना क्या वैध आदेश था, जिसे उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में “असाधारण परिस्थितियों में ही प्रयोज्य” बताया है ?
और यदि ये सभी कार्य वैध थे, तो आपके खिलाफ शासन स्तर से इन मामलों में जाँच का गठन क्यों किया गया ? क्या यह तथ्य असत्य है कि इन मामलों से संबंधित याचिकाएँ एवं जाँचें माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अब भी विचाराधीन हैं ?
निष्कर्ष :
संभल का विषय किसी एक अधिकारी या एक एफआईआर तक सीमित नहीं है । पुलिसकर्मियों द्वारा अपराध किया गया था या नहीं, प्रश्न यह भी नहीं है । आप आदेश के खिलाफ अपील में जाएं इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है । बल्कि प्रश्न उस संवैधानिक संतुलन का है, जिसमें न्यायपालिका आदेश देती है, और कार्यपालिका को उसका अनुपालन करना होता है…और असहमति की स्थिति में कानूनी उपचार अपनाया जाता है, न कि सार्वजनिक रूप से न्यायालय की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है । यदि पुलिस अधिकारी यह तय करने लगें कि कौन-सा न्यायिक आदेश वैध है और कौन-सा नहीं, तो यह स्थिति Rule of Law नहीं, बल्कि Rule by Discretion की ओर संकेत करती है । संविधान अभी भी सर्वोच्च है और जब तक संविधान सर्वोच्च है तब तक कोई भी वर्दी न्यायालय से ऊपर नहीं हो सकती ।
अगर यह नियम इतना चुभता है, तो फिर अदालतें बंद कर दीजिए,
कानून की किताबें जला दीजिए, और लिख दीजिए कि यहाँ न्याय नहीं, हनक चलती है । लेकिन याद रखिए, कि इतिहास गवाह है कि जो कोर्ट को अवैध कहने लगे, वह खुद एक दिन कटघरे में खड़ा मिलता है ।

