गोरखपुर : एक प्रबुद्ध और वरिष्ठ पत्रकार तथा अधिवक्ता ने वचन लिया था मुझसे कि अपनी ही बिरादरी की गंदगी को सार्वजनिक नहीं करूँगा, लेकिन जब पत्रकारिता खुद “गटर का ढक्कन” बन जाए और साजिशों के तार कहीं और से कहीं और जुड़ने शुरू हो जाएं तो चुप रहना भी नपुंसकता कहलाता है । आज पत्रकारिता का हाल यह है कि सच नहीं, सेटिंग बोलती है और कलम नहीं बल्कि हिस्सेदारी चलती है । गोरखपुर के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान में हाल ही में शहर के “नंबर वन और टू” दैनिक अखबार के दो पत्रकारों की जमकर कुटाई हुई । वजह कोई खोजी पत्रकारिता नहीं थी, बल्कि कूटे गए अखबारी पत्रकारों द्वारा अस्पताल की अंदरूनी कमाई में हिस्सेदारी पक्की कराने का दबाव बनाया जा रहा था । कुछ महीने पहले इसी तरह के एक खेल का खुलासा “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के जरिए हुआ था । तब इस बड़े अखबार ने पल भर में अपने ही पत्रकार को अपरिचित तत्व घोषित करते हुए किनारा कर लिया था । खबर प्रसारण के बाद प्लान फेल हुआ, वर्चस्व टूटा…कमाई के स्वप्न पर वज्रपात हो गया औऱ हमारे दुश्मनों की सूची में दो चार नामों का इजाफा और हो गया । कुछ महीने प्रसारित खुलासे की खबर देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आज से लगभग 20 दिन पूर्व जब यही दबाव दोबारा बनाने की कोशिश पत्रकारों द्वारा की गई तो यह कुटाई प्रकरण फिर से चर्चा का विषय बन गया । मामला संगीन था, मगर न एफआईआर, न सुर्खियाँ,क्योंकि पुलिस भी जानती है कि डॉक्टरों, ट्रांसपोर्टरों और वकीलों के गठजोड़ से टकराना कैसा होता है । अंत में हमेशा की तरह मैनेजमेंट गुरु (राय साहब) उतरे औऱ कूटे गए पत्रकारों से ही माफी मंगवाकर मामले को “समझदारी” में दफन कर दिया ।
अब ज़रा जिला अस्पताल की घटना देखिए । दो दिन पहले एक अंडरग्रेजुएट पत्रकार ने जिला अस्पताल में खड़ी एम्बुलेंस का वीडियो बनाया और उसे “मरीज माफिया” बताकर वायरल कर दिया । वीडियो दिखाकर चिकित्सा अधीक्षक को घेरने की कोशिश की गई और जब सोशल मीडिया से बात नहीं बनी तो खबर को अपने यार के अखबार में भी ठूँस दिया गया ।

अमर उजाला लिखता है कि वायरल वीडियो की वो पुष्टि नहीं करता ! गजब हाल है ! जब पुष्टि नहीं करनी है घंट कमंडल महाराज…तो इतनी भयानक “त्रासदी” की ख़बर छापने की जरूरत ही क्या थी ? जिला अस्पताल के पल पल की हरकत पर “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” की नजर इसीलिए बनी रहती हैं क्योंकि तमाम प्रचलित जाँचे यहीं से अस्तित्व में आई हैं । जब एम्बुलेंस नंबर के आधार पर पड़ताल हुई तो तस्वीर पलट गई ।
क्या था मामला..?
पता चला कि एम्बुलेंस “डेडबॉडी” ले जा रही थी और एम्बुलेंस का मालिक जिला अस्पताल के पास दवा की दुकान से जुड़ा वही व्यक्ति है, जिससे वीडियो बनाने वाले पत्रकार का पुराना और गहरा आर्थिक रिश्ता रहा है । अब एम्बुलेंस डेडबॉडी ले जा रही थी या मरीज इसे छोड़िए पत्रकार साहब औऱ बस ये बताईये कि आप एम्बुलेंस संचालक से रुपये अब तक किस बात की लेते रहे हैं । अब जबकि साझेदारी में खटास आने लगी तो वीडियो बनाने वाले पत्रकार साहब हिमाकत पर आ गए और एकमुश्त 15 हजार रुपये की मांग संचालक से रख दी और तर्क दिया कि अध्यक्ष से ठीक नीचे वाले पद के लिए प्रेस क्लब का चुनाव लड़ना है । जब मांग पूरी नहीं हुई, तो वीडियो वायरल । अब सवाल सीधा है पत्रकार साहब कि अगर एम्बुलेंस “माफिया” के लिए चल रही थी तो अब तक आप किस बात की वसूली उस एम्बुलेंस संचालक से करते रहे हैं ? ये महज आरोप नहीं पत्रकार साहब, बल्कि आपके खाते में उस एम्बुलेंस संचालक के खाते से हुए लेन-देन के कुछ स्क्रीनशॉट मौजूद हैं ।
कौन हैं ये पत्रकार साहब ? (फ्लैशबैक)
यह वही पत्रकार साहब हैं जो कभी जो जिला अस्पताल में पिछले 25 वर्षों से जमे डॉक्टर साहब की गाड़ी चलाया करते थे । 25 सालों से जमे वही डॉक्टर साहब, जिन पर कमीशनखोरी, प्राइवेट प्रैक्टिस और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांचें सबूतों के आधार पर चल रही हैं । ड्राइवर बन चुके पत्रकार साहब कुछ दिनों बाद इन्ही डॉक्टर साहब के पास कंपाउंडर बने, और बिना ग्रैजुएशन पूरा किये माइक उठा लिया और पैदा हो गए फेसबुकिया पत्रकार ! आज भी दिन-भर जिला अस्पताल में इन्ही डॉक्टर साहब की सेवा में मंडराना, उनके लिए मोर्चा संभालना और जरूरत पड़ने पर वीडियो-खबर का हथियार चलाना यही इनकी पत्रकारिता है । ये वही पत्रकार साहब हैं जो 25 सालों से जमे डॉक्टर साहब के लिए दवाओं का कमीशन दुकानों से इकट्ठा कर डॉक्टर साहब तक पहुँचाते रहे हैं । अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि एक तीर से दो शिकार करने को कोशिश की गई । पत्रकार साहब को चुनाव का खर्च भी निकलना था और 25 सालों से जमे डॉक्टर साहब को नवागत चिकित्सा अधीक्षक पर दबाव भी बनाना था..इसलिए यह पूरी पटकथा रच दी गई । योजना डॉक्टर साहब के करीबी रिश्तेदारों “बड़े भैय्या” ने बनाई और चेहरा बनाया गया उसी पत्रकार को, जिसके खिलाफ खुद “एम्बुलेंस संचालक” से वसूली करने के प्रमाण मौजूद हैं । पत्रकार साहब के कारनामे अद्भुत हैं और ऊपर से दावा करते हैं कि प्रेस क्लब के चुनाव में “नैतिकता” और “पत्रकारिता” बचाएंगे । “कम्पाउण्डर” “ड्राइवर” “खलासी” “पंचर जोड़ने वाले” “ठेला लगाने वाले” “मंदिर से घंटा चुराने वाले” “12वी पास और फेल” जब पत्रकार बनेंगे और यही पत्रकार जब भ्रष्टाचारियों का एजेंट बनेंगे तो पत्रकारिता की मौत होगी…”प्रेस क्लब सीढ़ी बनेगी” और “कुटाई प्रक्रिया” बदस्तूर चलती रहेगी । अब इस स्थिति में दोष किसे देंगे ? सिस्टम को ? पुलिस को ? या उस कुटाई को जो अब दस्तूर बनती जा रही है !
आपकी तस्वीर और पहचान को इस बार उजागर इसलिए नहीं किया जा रहा है “पत्रकार साहब” कि कम से कम अपनी नहीं तो उस पद की गरिमा का ध्यान आप रखिये, जिस पर आप चुनाव लड़ने के लिए उतावले हैं..और डॉक्टर साहब से गुजारिश है कि आप अपनी और छीछालेदर न करवाएं..इतनी मेहनत से पढ़े हैं तो डॉक्टरी ही कीजिये और ये साजिश वाजिश जैसा “कुटिल काम” महिला चिकित्सालय में बैठे अपने सगे रिश्तेदार “बड़े भैय्या’ के लिए छोड़ दीजिए !

