“खबर नहीं, प्रमोशन : दैनिक जागरण के आंख का पानी”

पेटकारिता : जब अखबार “खबर” छोड़कर प्रचार बेचने लगे, तो समझ लीजिए समस्या सत्ता की नहीं बल्कि पत्रकारिता की है । “खबर” अगर सवाल न पूछे, तो वह खबर नहीं “प्रमोशन” होती है । पत्रकारिता यह जानती है कि “अखबार की साख” विज्ञापन से नहीं बल्कि सवालों से बनती है और जो अखबार जिम्मेदारों से सवाल करना छोड़ दे, वह पाठकों से जवाब भी खो देता है । जब खबर की जगह चाटुकारिता छपने लगे, तो लोकतंत्र नहीं बल्कि मार्केटिंग मजबूत होती है । ऐसी मार्केटिंग, जिसकी अहमियत ठोकरों पर और उम्र महज “बालिश्त” भर की होती है ।

अब आप ही बताईये कि दैनिक जागरण के इस तथाकथित प्रमोशन का मूल्य आखिर कितना रहा होगा ? सीधे शब्दों में पूछें तो “सूचना” ने इसके लिए कितना भुगतान किया होगा ? नहीं ! यह सवाल किसी रेट कार्ड या बिल की जानकारी के लिए नहीं है । बस यह समझना है कि प्रथम दृष्टया यह सामग्री खबर की जगह विज्ञापन क्यों लग रही है ? क्योंकि सामान्यतः खबरें सवाल पूछती हैं, और यहाँ तो “प्रश्नवाचक चिन्ह” का भी प्रवेश वर्जित दिखाई दे रहा है । अब इस व्यक्ति की शक्ल ही देख लीजिए.. इसके चेहरे का “आभामंडल” “संतुष्ट” लग रहा है या “सोंटा” खाने के डर से सुस्त लग रहा है ? अब भला कौन-सा अखबार ऐसा होगा, जो खबर की थाली में “लोटा” लेकर यूँ ही घूमेगा ? अगर ऐसा हो रहा है तो उसे “खबर” कहें या “क़बर” (कब्र) ?

इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कि… चाटुकारिता आज के दौर में लगभग पूरी मीडिया कर रही है ! कभी कभी तो मैं भी कर लेता हूँ । मगर फिर भी ज़्यादातर संस्थान आँख का थोड़ा-बहुत पानी बचाकर रखने की कोशिश तो करते हैं । लेकिन दैनिक जागरण ने तो शायद यह मान लिया कि अब उस पानी की भी कोई ज़रूरत नहीं । कुछ नहीं मिला तो सस्ते टाइप के फ़ूड स्ट्रीट वाले रेस्टोरेंट में डोसे की थाली के साथ मिलने वाले टिश्यू पेपर से ही बचे खुचे आंख का पानी पोंछ लिया ! कम से कम प्रस्तुति में यह एहसास तो दिया ही जा सकता था कि अखबार अभी भी “अखबार” है । और हाँ, यह जो “यूपी का संतुष्ट नागरिक” आपने दिखाया है ज़रा उसका पूरा “एड्रेस” भेज दीजिए । पहले मैं चेक कर लूँ कि कहीं के “ए आई” तो नहीं ? फिर मैं उसी जगह आपको प्रदेश के बीसियों “असंतुष्ट नागरिकों” से मिलवा दूँगा । चाहे वह जगह लखनऊ हो, या फिर प्रदेश का कोई और जिला !

अब ऊपर दी गयी “विरह वेदना” को कौन छापेगा ? ऐसी तमाम असन्तुष्टि, तुष्टिकरण और “विरह वेदनाएं” चित्कार कर रही हैं । सवाल यह नहीं है कि संतुष्ट होकर कौन कौन अपने घर में बैठा “लक्ष्मीकांत प्यारेलाल” का संगीत सुन रहा है, बल्कि सवाल यह है कि असंतुष्टों की “विरह वेदना” के चीत्कार की कहानियों को कौन छापेगा ? या फिर डर यह है कि SIR खत्म होने के बाद उन्हें प्रदेश से बाहर ही न कर दिया जाए ?

जनाब, अपनी मार्केटिंग टीम को यह समझाइए कि कमाई का लक्ष्य पूरा करने के लिए अखबार की बची-खुची साख को ही दांव पर न लगाया जाए ! कमाई की शाखाओं पर फल कम आना कई कारणों से हो सकता है, लेकिन जड़ों के कटने का नुकसान बहुत बड़ा होता है । और जब जड़ें सूख जाती हैं, तो फिर न पत्रकारिता बचती है और न विश्वास ! सिर्फ पन्नों पर छपे प्रचार रह जाते हैं ।

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

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