सी एम सिटी : देश–प्रदेश में अब कानून सबके लिए एक जैसा नहीं रह गया है । एक कानून रसूखदारों के लिए है और दूसरा उस आम आदमी के लिए…जिसे हर पाँच साल में सिर्फ़ वोट देने की मशीन समझा जाता है । संविधान की किताब में भले ही सबके लिए बराबर हों, लेकिन ज़मीन पर बराबरी का कोई अस्तित्व नहीं है । शरीर की सभी “206 हड्डियाँ” और संविधान की सभी “448 धाराएँ” तोड़ने वाले रसूखदार, इस पूरी “व्यवस्था’ को अपने इशारे पर “बेगम जान” की तरह नचाते हैं ।
IGRS का मतलब (Ignore Grievance Register System)
यानी शिकायत दर्ज तो होती है, लेकिन उस पर कार्रवाई करना वैकल्पिक माना जाता है। IGRS आज पीड़ित की ज़मीनी सच्चाई को नज़रअंदाज़ करने का ऐसा तंत्र बन चुका है, जहाँ फर्जी रिपोर्ट्स के पहाड़ खड़े कर दिए जाते हैं । हाँ, इस व्यवस्था का एक “फायदा” ज़रूर है….कि IGRS पर लगाई गई फर्जी रिपोर्ट्स को अदालत में “मारक हथियार” की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है । गोरखपुर से व्यवस्था का ऐसा ही असली रंग उजागर हुआ है।सीओ कोतवाली की रिपोर्ट बताती है कि उनके क्षेत्र में दरगाह की गद्दी पर काबिज़ एक स्थानीय अपराधी पर हत्या, असलहा तस्करी, बलवा, मारपीट, तोड़फोड़ और आपराधिक साज़िश जैसे गंभीर मुकदमे दर्ज हैं । इसके बावजूद इसी “व्यवस्था” ने उसे न सिर्फ़ “लाइसेंसी असलहा” दिया, बल्कि इस “सभ्य नागरिक” को देश छोड़कर जाने के लिए “पासपोर्ट” भी थमा दिया । किसी भी आपराधिक मुकदमे में दो ही वैधानिक स्थितियाँ होती हैं “अंतिम रिपोर्ट” या “आरोपपत्र” ! दोनों ही हालात में रिकॉर्ड अदालत तक पहुँचाना पुलिस की ज़िम्मेदारी है । लेकिन दरगाह की गद्दी पर काबिज़ इस सभ्य व्यक्ति से जुड़े इन गंभीर मामलों के रिकॉर्ड अदालत की “ऑनलाइन एप्लीकेशन” में ढूँढने पर भी नहीं मिलते । सामान्यतः ऐसा तभी होता है जब पुलिस कुछ छिपाना चाहती है या किसी को बचाना चाहती है । क्योंकि रिकॉर्ड अदालत पहुँचते ही सब कुछ “ऑनलाइन” हो जाता है और “कर्मकांड” छिपाए नहीं जा सकते । नीचे देखें सनसनीखेज रिपोर्ट !
सीओ कोतवाली रिपोर्ट PDF क्लिक करें..
फर्जी रिपोर्ट्स की जद में आएंगे कई वर्दीधारी !
कोतवाली सर्किल से प्राप्त कुछ अन्य आधिकारिक रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि संबंधित दरगाह का कोई “बैंक खाता” ही नहीं है । तब सवाल यह है कि देश–विदेश से आने वाला बेहिसाब चंदा आखिर जाता कहाँ है ? क्या यह चंदा “थाने की तिजोरी” में रखा जाता है ? “अवैध फंडिंग” का प्रथम दृष्टया संकेत यही है कि जब खाता ही नहीं है, तो विदेशों से आने वाला पैसा किस “मुल्क” की तिजोरी में जमा हो रहा है….(इराक, दुबई, पाकिस्तान या फ़िलिस्तीन) ? और इन्ही देशों की यात्राएँ भी पासपोर्ट पर दर्ज हैं।
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गलत सूचना में फँसी कोतवाली पुलिस…नीयत पर सवाल !
इस पूरे प्रकरण में “सीओ कोतवाली” की भूमिका गंभीर संदेह के घेरे में इसलिए भी आ जाती है, क्योंकि उनके द्वारा उच्चाधिकारियों को भेजी गई रिपोर्ट और उसी आधार पर “आरटीआई” में दिया गया जवाब पूरी तरह गलत है । आरटीआई के तहत पुलिस ने पासपोर्ट फ़ाइल संख्या “LK + 14 अंकों” की जानकारी दी, जबकि पासपोर्ट सेवा नियमों के अनुसार फ़ाइल नंबर 12 कैरेक्टर (2 अक्षर + 10 अंक) का ही होता है । यह तकनीकी रूप से असंभव विवरण RTI Act, 2005 की धारा 20 के तहत दंडनीय है । इससे सूचना की शुद्धता, रिकॉर्ड प्रबंधन और कोतवाली सर्किल की नीयत तीनों पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं ।

हालिया गोरखपुर के “अंशिका कांड” ने भी इस व्यवस्था की परतें खोल दी हैं कि कुछ सीओ से लेकर इंस्पेक्टर तक, और कुछ दरोगा से लेकर सिपाही तक की लंगोट कितनी ढीली हो चुकी है । नोएडा के निलंबित सीओ “ऋषिकांत शुक्ला” यह भी समझा चुके हैं कि वर्दी के भीतर रहते हुए भी 100 करोड़ की दौलत का “अंपायर” कैसे खड़ा किया जाता है । जब वर्दी के अंदर इतना कुछ पनप सकता है, तो आम आदमी के भरोसे को आखिर किस गली में जाकर दम तोड़ना चाहिए ? इसलिए “अंशिका कांड” पर हाय तौबा मचाना बंद कीजिए । आप व्यवस्था में बैठी एक “अंशिका” को लेकर “राग दरबारी” गा रहे हैं, जबकि ऐसी अनगिनत “अंशिकाएँ” “दरगाह बहादुर” की आड़ में ‘पनाह” लिए बैठी हैं । आने वाले समय में गोरखपुर की धरती पर “अंशिका कांड” से भी बड़े, “प्रागैतिहासिक खुलासे” और ‘ऐतिहासिक कार्यवाहियाँ” संभव हैं । सब कुछ मैनेज कर लेने का भ्रम पालने वाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि ‘महापाप” के दुष्परिणाम कभी मैनेज नहीं होते ! वे मनुष्य की सीमा से बाहर, “नक्षत्रों के हैंगर” में किसी अनिष्ट की “प्रबल आशंका” के साथ टंगे रहते हैं ।

फ़िलहाल, ऊपर दिए गए “गोपनीय” विभागीय ईमेल की तस्वीर से यह पता चलता है, कि इस संगीन मसले पर विदेश मंत्रालय से मिले निर्देशों के अनुसार आज संबंधित विभाग की यात्राएँ और औपचारिकताएँ पूरी कर, “झोला–झंड” उठाए मेरे कदम फिर एक नई “इन्वेस्टिगेशन” की ओर बढ़ चुके हैं । क्योंकि गोरखपुर के दरगाह की पाक सरजमीं से की गई “हनी ट्रैप” की साजिश में “मकसद” मुकदमा लिखवाना नहीं….बल्कि “मुकद्दर” लिखना है।

