लगभग तीन चार दिन पहले सोशल मीडिया पर एक ख़बर हवा में तैरती रही कि मंत्री संजय निषाद के कार्यक्रम में स्वागत के लिए लाया गया बुलडोज़र पलट गया । बाद में पता चला कि एक आदमी मर गया..हाँ, मर गया लेकिन, बस इतना ही ! क्योंकि व्यवस्था की फाइल में यह सिर्फ एक “दुर्घटना” थी…तो किसी अफ़सर की नोटशीट में “दुर्भाग्यपूर्ण घटना”…और मीडिया के लिए तो यह मात्र “ग़ैरज़रूरी शोर” था ! आख़िर वह आदमी था ही क्या ? न कोई मंत्री, न अफ़सर, न एंकर…बस ज़िंदगी भर वोट डालने की मशीन बना रहा और “लोकतंत्र” को महान पर्व मानकर हर पाँच साल में वोट डालने के लिए लाइन में खड़ा होता रहा । अब मर गया तो मर गया ! क्योंकि “लोकतंत्र का पर्व” तो चलता ही रहेगा…मंत्री जी के घर दावतें भी चलती रहेंगी…मगर उसके घर…”आज भी चूल्हा नहीं जला होगा ” !

सबसे ज़्यादा हैरत तो पत्रकार बिरादरी को देखकर होती है । एक समय था जब किसी वीआईपी की आवभगत स्वीकार करने से पहले पत्रकार सौ बार सोचता था कि “कहीं कलम शर्मिंदा न हो जाए !” मगर आज ? आज की पत्रकारिता तो “निर्लज्जता” का लाइव प्रसारण है । पता चला कि मंत्री जी के घर के “मांगलिक कार्यक्रम” में “पत्रकारिता के तमाम पुरोहितों” का पूरा “हुजूम” मौजूद था । पत्रकारिता का हर “लालायित चेहरा” मंत्री जी के लिए बाल्टी भर भर कर “शुभकामनाएं” लेकर पहुँचा था । मंत्री जी के मांगलिक कार्यक्रम में पहुँचे पत्रकार कुछ यूँ मुस्कुरा रहे थे, जैसे भीषण बाढ़ में चार दिन से छत पर फँसा हुआ कोई आदमी हेलीकॉप्टर से गिराये जा रहे खाने को देखकर मुस्कुराता है । ऐसा लगता है जैसे “पत्रकारिता के छर्रेबाजों” का “बौद्धिक अवचेतन” मात्र “गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है”…तक सीमित होकर रह गया है । आखिर “पत्रकारिता के छर्रेबाजों” के कलम की स्याही उस व्यक्ति के मौत पर सूख क्यों गई, जो बुल्डोजर के पलटने से “काल कलवित” हो गया था….और लोकतंत्र के “कैमरे का फ़्लैश” अचानक से अमावस की रात के “घटाटोप अंधकार” में सहम कर सिमट क्यों गया ? जो बुलडोज़र के नीचे दबकर मरा उसके लिए न कोई शोक,न कोई सवाल,और न कोई संवेदना ! क्या हर जगह, हर बार पूरी निर्लज्जता के साथ “पत्रकारिता की लाश” पर सेंकी गई “लिट्टी चोखा” का भरपूर आनंद लेना आवश्यक हैं ?
बुल्डोजर का क्या दोष ? वो तो बेजान है…एक पहेली है..जो कभी
किसी की जान ले रहा है….तो कभी किसी का घर तोड़ रहा है…कभी किसी के सपने कुचल रहा है…तो कभी किसी का भविष्य रौंद रहा है ! मशीन ही तो है बुल्डोजर ? इसलिए कभी किसी के चरणों में लोट रहा है…तो कभी किसी को सलामी दे रहा है..कभी किसी की ग़ुलामी कर रहा है..तो कभी आंखें मूंद ले रहा है । ये बुलडोज़र है या कोई नेता..या फिर कोई पत्रकार ? जो व्यवस्था की जरूरतों के अनुसार इस तेज़ी से रंग बदल रहा है,कि गिरगिट की पूरी प्रजाति ही ख़तरे में आ गई है ! कल मैंने व्हाट्सएप्प पर एक खबर देखी ! ख़बर “हिंदुस्तान अखबार” जैसे बड़े संस्थान की थी…आप भी देखिए !

अखबार की खबर देख पुलिस महकमे का “मीडिया सेल” सक्रिय हो गया और मीडिया सेल ने इस खबर को अर्धसत्य बताते हुए खबर का खंडन “व्हाट्सएप्प ग्रुप” पर ही कर दिया।

इस खंडन का सीधा सा मतलब था, कि जो छापा गया है वैसा कुछ भी गंभीर घटित नहीं हुआ है । मतलब सब ढोलम पोल है ! इसका मतलब कि अखबार की इस खबर ने सीधा सीधा व्यवस्था की छवि खराब करने जैसा गंभीर अपराध कर दिया है ।

इस घोर अपराध के लिए जब हमने अखबार पर FIR की बात व्हाट्सएप्प ग्रुप में कही, तो व्हाट्सएप्प ग्रुप से लेकर मीडिया सेल तक ऐसा घोर सन्नाटा पसर गया, जैसे हमने धर्मशास्त्रों में घोषित कोई महाअपराध कर दिया हो ! मुकदमा दर्ज नहीं हुआ ! जानते है क्यों ? क्योंकि यह “व्यवस्था” गरीबों कमज़ोरों और असहायों के अधिकारों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि रसूखदारों, धनाढ्यों, भ्रष्टाचारियों और गुंडों की चौखट पर “मत्था टेकने” के लिए बनी है। “कानून अंधा” नहीं है बल्कि इस “कानून” ने जानबूझकर आँखों पर पट्टी बाँध रखी है । “नैतिकता की देह” जल चुकी है बस “आखिरी हड्डी” चटक रही है !

आज सहारा के पत्रकारों को देखिए ! क्या व्यवस्था में इनकी व्यथा को समझने वाला कोई है ? जिस प्रशासन को इन्होंने अपने सिर माथे पर बैठाया…और जिस प्रशासन ने इनकी बात कभी अनसुनी नहीं की.. क्या वो प्रशासन अब कुछ सुनेगा ? शायद नहीं
ज़रूरतों के मौसम में बहुत क़रीब थे लोग,
मौसम बदला तो आज फ़ालतू समझे गए ।

