गोरखपुर के छर्रेबाजों का ‘रायता-राज’ : सुनियोजित साजिश के जरिये वर्दी पर हमला !

गोरखपुर : सोशल मीडिया के “छर्रेबाजों” ने गोरखपुर से एक नया सनसनीखेज तमाशा परोस दिया है। इनका दर्द बड़ा मार्मिक है । पुलिस अब रोड जाम करने वालों से “चाय-बिस्कुट” की परंपरागत दलाली सेवा निभाने से भी मना कर रही है । जिस जिस्म में मुँह से लेकर “अंग-विशेष” तक “दलाली के बिस्कुट” ठूंसे हों, उसे अब “खाना” नहीं बल्कि “खून” चाहिए । इनकी “डिक्शनरी” में एक ही “फलसफा” है कि जिस थाने से “दलाली की थाली” मिल जाए, वहाँ “रामराज्य” है और जो वर्दीधारी “नियम-कानून” की किताब खोल दे, वो “रंगबाज़” है ।

क्या था सोशल मीडिया का रायता ?

आज सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर “छर्रेबाजों” ने बड़ा रायता फैलाया कि “दरोगा जी ने पिस्टल लहरा दी” ! लेकिन जब ज़मीनी पड़ताल हुई, तो सच्चाई सामने आई कि सड़क के सारे अतिक्रमणकारी एकजुट होकर एक वर्दीधारी को “कातिलाना नीयत” से घेर चुके थे । अब सवाल है कि क्या ऐसी स्थिति में दरोगा जी को आत्मरक्षा के लिए चेतावनी देने की बजाय “सफेद झंडा” दिखाना चाहिए था ? क्या कानून कहता है कि भीड़ तुम्हें नोचने आए और तुम “संविधान की प्रस्तावना” पढ़ते रहो ? अगर कोई कानून का जानकार ज़रा “रीढ़” के साथ बोल सकता हो, तो बताए कि “दरोगा जी” ने गलत क्या किया ?

स्पोर्ट्स कॉलेज चौराहा : अराजकता का स्थायी ठिकाना !

स्पोर्ट्स कॉलेज चौराहा कोई “पिकनिक स्पॉट” नहीं, बल्कि अतिक्रमण और “अवैध परिवहन” का खतरनाक “हॉटस्पॉट” है।
अवैध ट्रक, बालू मंडी से जुड़े भारी वाहन, बिना पार्किंग लाइन में खड़े ट्रक रोज़ “भीषण जाम” का कारण बनते हैं, और कई बार यही अतिक्रमण राहगीरों की जान भी ले लेता है । लेकिन छर्रेबाजों को न जाम दिखता है, न लाश ! उन्हें बस मोबाइल कैमरा और “चवन्निछाप पत्रकारिता” दिखती है ।

दरोगा जी कौन हैं, ये जानना भी ज़रूरी है !

जिन दरोगा जी को टारगेट किया जा रहा है, वो कोई सड़कछाप भर्ती नहीं हैं बल्कि “भारतीय नौसेना” से सेवानिवृत्त, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की पृष्ठभूमि वाले “देशरक्षक” रहे हैं । आज UP पुलिस में “सब-इंस्पेक्टर” के रूप में समाज की सुरक्षा कर रहे हैं । विडंबना है कि “सरहद” की रक्षा करने वाला जब “सड़क” की रक्षा करे, तो “छर्रेबाज” मोबाइल में “साँप-सीढ़ी” खेलते हुए उसे अपराधी घोषित करने लगते हैं ।

अफवाह बनाम हकीकत !

घटना के दिन जब पुलिस जाम खुलवाने पहुँची, तब ट्रक चालकों ने सहयोग नहीं किया बल्कि दरोगा जी को घेर लिया । यह “समाजशास्त्र” का पहला अध्याय है कि जब “झुंड” बड़ा हो तब उसकी भाषा भी “हिंसक” जानवरों जैसी हो जाती है । स्थिति “कानून-व्यवस्था” से निकलकर “भीड़ नियंत्रण” की बन चुकी थी । अब ऐसे में “आत्मरक्षा” के लिए शस्त्र निकालना फायरिंग नहीं बल्कि “चेतावनी” और “संवैधानिक” अधिकार है । लेकिन “छर्रेबाजों” को यह कौन समझाए कि अगर मेहनत से हाईस्कूल भी पास किया होता, तो आज फेसबुक की आड़ में दलाली नहीं करनी पड़ती ।

दरोगा जी के बहाने थाना चिलुआताल था टारगेट !

प्रमाण है कि दरोगा जी को टारगेट कर चिलुआताल थाने को बदनाम करने की “फील्डिंग” सेट की गई थी । दरोगा जी तो बस बहाना थे। असल टारगेट था थाना “चिलुआताल” ! एक मुकदमे में राजधानी पुलिस की जीडी और मुहर की कूटरचना कर ब्लैकमेलिंग की कोशिश करने वाले “आदतन अपराधी” के खिलाफ सबूत मिलने पर जब “चिलुआताल पुलिस” ने उसपर अपना शिकंजा कसा…तो दरगाह को ढाल बनाकर बैठे उस आदतन अपराधी ने अपने पाले हुए “छर्रेबाजों” को “एक्टिवेट” कर दिया ।

दरगाही पत्रकार : एक रासायनिक दुर्घटना !

बहुत कम लोग जानते हैं कि “दरगाह के दिव्यलोक” से इन छर्रेबाजों को “रायता” फैलाने के लिए “फंडिंग” के इतने अभूतपूर्व इंतज़ाम दिए जाते हैं….जितनी 11वीं शताब्दी में “फिरदौसी” को “शाहनामा” लिखने के लिए “महमूद गजनी” ने भी नहीं दिए होंगे । क्या आप जानते हैं कि “जुगनू” अपने पेट में होने वाली “रासायनिक प्रतिक्रिया” के कारण चमकते हैं । जब “ल्यूसिफेरिन” और “एंजाइम ल्यूसिफरेज”….”ऑक्सीजन” के साथ मिलते हैं, तो उस “केमिकल रिएक्शन” से “जैव-प्रकाश” उत्पन्न होता है । ठीक इसी तरह जब किसी एक ही शरीर में दलाली, भ्रम, झूठ, फरेब, मक्कारी, चापलूसी, बेग़ैरती सब एक साथ समा जाती है…तब सबके “समिश्रण” से एक ऐसे “खतरनाक केमिकल रिएक्शन” का अवतार होता है….जिसे “दरगाही पत्रकार” कहते हैं ।

सोशल मीडिया पर रायता फैलाने में सबसे आगे !

अपने “आका ए हवस” की तौहीन से बौखलाए “छर्रेबाज” काफी व्यथित थे औऱ कई दिनों से मौके की तलाश में थे । घटना का वास्तविक फैक्ट छिपाते हुए सोशल मीडिया पर सबसे पहले रायता फैलाने की शुरुआत इस “धमाका टाइप” “फुस्स पटाखे” से की गई । इसके बाद इस “फुस्स पटाख़े” से कनेक्टेड कई “चवन्नीबाज एक्टिवेट” हो गए । ये कोई पहली बार नहीं है बल्कि इस तरह के और भी रायता इन छर्रेबाजों द्वारा पहले भी फैलाया जा चुका हैं । यही वजह है कि रायता फैलाने के आरोप में इन “छर्रेबाजों” के कटोरों में कोर्ट से पहले भी “ढाई करोड़” की नोटिस और मुकदमा दोनों गिर चुका है । प्रशासन को तो इस “धमाका वमाका” टाइप जैसे “आतंकित” करने वाले नाम का त्वरित “संज्ञान” लेते हुए इस पर तुरंत “पोटा” “लोटा” “मकोका” “टाडा” “टाडाफिल” सब लगा देना चाहिए ।

घटनास्थल का वीडियो और प्रत्यक्षदर्शी का बयान !

By systemkasach

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