आज “सुप्रीम कोर्ट” में “आवारा कुत्तों” को लेकर “बहस” हो रही है ! खतरा, सुरक्षा, संख्या और समाधान पर बहस हो रही है लेकिन, इस बहस के शोर में एक पुराना सवाल फिर से सिर उठा रहा है । क्या इंसान जब भी असुविधा में पड़ता है, तब “करुणा” सबसे पहले “कुर्बान” कर दी जाती है ? यही सवाल 67 साल पहले एक “आवारा कुतिया” से भी पूछा गया था । उसका नाम था “लाइका” !
67 साल हो गए…”लाइका” को गए लेकिन “लाइका” की कहानी आज भी दिल को भारी कर देती है । वो कोई “वैज्ञानिक” नहीं थी, ना किसी “युद्ध” की नायिका, ना किसी “झंडे” की सिपाही, ना उसे पता था कि इंसान अपनी “तरक़्क़ी” की कीमत किससे वसूलता है और ना उसे ये पता था कि “इतिहास” क्या होता है ? वो बस एक “आवारा कुतिया” थी जिसने “इंसानों” की आवाज़ पर “पूँछ हिलाकर” भरोसा कर लिया । उसे सिखाया गया उसे पिंजरे में रहने की आदत डलवाई गई ! शोर, कंपन और अकेलेपन से समझौता करना सिखाया गया । उसके पास भोजन था…पानी था…तकनीक थी…लेकिन घर लौटने की कोई योजना नहीं थी । क्योंकि वापसी का इंतज़ाम महँगा पड़ता था, जटिल था, और इंसान को अपने लक्ष्य से भटका सकता था । क्या प्रगति इतनी निर्दयी हो सकती है कि उसे दया की ज़रूरत ही न लगे ? क्या वो “विज्ञान” जो “ब्रह्मांड” नाप सकता है, किसी “बेज़ुबान की आँखों” में “डर” नहीं पढ़ सकता ? “लाइका” अंतरिक्ष में नहीं मरी, बल्कि वो “इंसानी स्वार्थ” की कक्षा में मरी । “लाइका” ने कभी सितारों तक जाने का सपना नहीं देखा । उसे बस वही चाहिए था जो हर जीव चाहता है । “सुरक्षा” “अपनापन” और “जीवन” !
तरक़्क़ी के नाम पर इंसानी स्वार्थ !
लाइका ने “इतिहास” नहीं चुना, बल्कि उसे इंसानी स्वार्थ की खातिर “इतिहास” बना दिया गया । आज हम उसे “स्पेस मिशन की पहली सफलता” कहते हैं, लेकिन उस वक्त वो अंतरिक्ष में अकेली डर से काँपती “आख़िरी साँस” ले रही थी । जब हम तरक़्क़ी पर तालियाँ बजाते हैं, रॉकेट की ऊँचाई गिनते हैं, तकनीक की ताक़त पर गर्व करते हैं तो एक सवाल अब भी ज़िंदा है, और अब भी हवा में तैरता है कि..क्या “प्रगति” “करुणा” से ज़्यादा बड़ी हो सकती है ? क्या वो “विज्ञान” जो जीवन बचाना सिखाता है….. वो किसी बेज़ुबान के जान की क़ीमत पर सही ठहराया जा सकता है ? “लाइका” ने मनुष्यों को सिर्फ चाँद के रास्ते नहीं दिखाए, बल्कि उसने हमें हमारी “संवेदनहीनता” को आईना दिखाया । अगर आपको लगता है कि “तरक़्क़ी” बिना “दया” के अधूरी है…अगर आपको लगता है कि हर जान की क़ीमत होती है… तो बेजुबानों के लिए मन में “करुणा” का भाव जरूर रखिये । क्योंकि कभी-कभी…एक “खामोश” याद हज़ार “नारों” से ज़्यादा कह जाती है और एक “बेजुबान बद्दुआ” जीवन के सारे “आशीषों” को छीन सकने की “कूवत” रखती है ।

