घूस सब लेते हैं, “बदनाम” एक क्यों ? और “मांझा” अब भी आज़ाद कैसे ?

वेब सीरीज़ “घूसखोर पंडत” का कड़ा विरोध होना चाहिए क्योंकि यह “घोर अन्याय” है ! “घूसखोर” सिर्फ़ “पंडत” ही क्यों ? क्या बाकी समाज को इस “महान परंपरा” से बाहर रखा जाएगा ? क्या बाकी की जतियों को इतने वर्षों के “सतत प्रयास” साधना और अनुभव के बाद भी इस “उपाधि” से वंचित कर दिया जाएगा ? यह सिर्फ़ “भ्रामक” हीं नहीं है बल्कि “घूसखोरी” की पौराणिक व्यवस्था के साथ “जातिगत अन्याय” है । आज हम गर्व से कह सकते हैं कि “घूसखोरी” भारत की सबसे बड़ी “समावेशी व्यवस्था” है । यहाँ न जाति बाधा है…न धर्म की दीवार है…न लिंग का भेद…और न संप्रदाय की रोक ! यह एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जो जातिवाद, सांप्रदायिकता और तमाम “वादों” के “ज़हर” से मुक्त है । भारतवर्ष में जो भी व्यक्ति किसी भी पद पर बैठा है…छोटा हो या बड़ा….सरकारी हो या अर्धसरकारी…किसी भी पंथ, मज़हब, जाति या जेंडर का हो…दबा के “घूस” लेता है । (हालांकि कुछ “अपवाद” हैं लेकिन उन्हें “सिस्टम” खुद भी “शक” की नज़र से देखता है !)

बराबरी का अधिकार : घूस में भी “लैंगिक समानता” !

महिलाएँ भी पीछे नहीं हैं साहब, “बराबरी का अधिकार” यहाँ भी पूरी “निष्ठा” से निभाया जाता है । “भुक्तभोगी” जानते हैं कि “घूस” के मामले में जाति, क्षेत्र और विचारधारा कोई काम नहीं करती । हाँ, कभी-कभार बिरादरी, पहचान या चेहरे के आधार पर थोड़ा बहुत “डिस्काउंट” मिल सकता है…परंतु पूरी माफी इस “सैद्धांतिक व्यवस्था” के बिल्कुल “विपरीत” है ।

घूस का संवैधानिक सिद्धांत डिस्काउंट मिलेगी माफी नहीं !

एक साहब अपनी “बिरादरी की भर्ती” में थे ! थोड़ा “कम” लेते थे लेकिन “कमा” सबसे लेते थे । और हाँ, कुछ खास मामलों में “सुंदरियों” के लिए अलग “रेट-कार्ड” भी चलता था बशर्ते मामला “एप्स्टीन मॉडल” की तरह आपसी समझदारी पर आधारित हो । अब ऐसे में सवाल उठता है कि “घूस” जैसी महान और “सर्वसमावेशी” चीज़ को किसी एक “जाति” से क्यों जोड़ा जाए ? यह “साज़िश” है..यह “विभाजन” है….यह “घूसखोरी की मूलभावना” के खिलाफ है..यह “घूसखोरी की गंगा” में “जातिवाद की गंदगी” घोलने का प्रयास है । हम इसका विरोध करते हैं..सिर्फ विरोध क्यों…बल्कि कड़ा विरोध करते हैं । घूस जैसी महान, “निष्पक्ष” और “राष्ट्रव्यापी व्यवस्था” को किसी एक जाति से क्यों जोड़ा जा रहा है ? यह घूसखोरी को “बदनाम” करने की “साज़िश” है । यह “घूसखोरी” को “विभाजित” करने का “षड्यंत्र” है ।

घूस का जातिवाद घूसखोरी की”मूल भावना” पर “हमला” !

“घूसखोरी” भारत की सबसे सफल “सेक्युलर नीति है । “घूस” जैसी “लोकतांत्रिक व्यवस्था” को “जाति तथा वर्ण” के दायरे में “कैद” कर इसे कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है । इस “कुत्सित प्रयास” की कड़ी निंदा और “तीव्र भर्त्सना” होनी चाहिए । समय की माँग है कि हर जाति, हर धर्म, हर लिंग के लिए अलग-अलग “घूसखोर” वेब सीरीज़ बनाई जाए,या फिर “घूसखोरी” को जाति-मुक्त “राष्ट्रीय विरासत” घोषित किया जाए ।

जड़ पर “प्रहार” की जगह “कैमरे” पर छापेमारी !

अब देखिए, कि “घूसखोर पंडत” वेब सीरीज “नेटफ्लिक्स” से ही गायब हो गयी है ! मतलब वार “जड़” पर हुआ… नतीजा “ऑनलाइन” भी मिलना मुश्किल है ! लेकिन “चाइनीज मांझे” के मामले में कल तक “व्यवस्था” के “व्यापारी” औऱ “अधिकारी” जहाँ आपसी सहमति से “पेंच” लड़ा रहे थे…आज उसी “व्यवस्था” में “दो फाड़” हो चुका है..और “मांझे” से होने वाली मौत को “हत्या” के दायरे में ला दिया गया है । दुकानों पर छापे पड़ रहे हैं और पतंगवाले “कैमरे” में धकेले जा रहे हैं.….लेकिन वो “ऑनलाइन गोदाम” कौन देखेगा…जहाँ से घर-घर “होम डिलीवरी” हो रही है ? उन सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स साइट्स और होम-डिलीवरी के ज़रिए बिना किसी डर, बिना किसी रोक-टोक के “चाइनीज मांझा” बेचने वालों को कौन रोकेगा ? ना “सर्वर” बंद हो रहे हैं, ना “सप्लाई चैन” तोड़ी जा रही है, ना “ऑनलाइन” विक्रेताओं को कोई पूछ रहा है । कानून की छापेमारी सिर्फ़ “कैमरे” के सामने चल रही है, और अपराध “इंटरनेट” के रास्ते घर तक पहुँच रहा है ।

“घूसखोर पंडत” हुआ बेकार पर “मांझा” निकला होशियार !

“घूसखोर पंडत” बनाने वाले “महामूर्ख” निकले लेकिन “मांझा” समझदार निकला ! “मांझा”समझदार है…इसलिए इस “मांझे” ने अब तक किसी “VIP” को अपना “शिकार” नहीं बनाया । ये जानता है कि जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन से “आम आदमी” सड़क पर “बेमौत” नहीं मरेगा । अभी हो रही कार्यवाही की “परेड” में नीचे वाला “पकड़ा” जाएगा और ऊपर वाला “सुरक्षित” रहेगा…क्योंकि इस “व्यवस्था” में कानून नीचे बहुत “सख्ती” से चलता है और ऊपर पहुँचते-पहुँचते “भक्ति” में लीन हो जाता है । असली “किलर” यह मांझा नहीं है बल्कि असली “किलर” तो ये “व्यवस्था” है…जो हर “मौत” के बाद “जागती” है और “अगली मौत” होने तक फिर “सोने” चली जाती है ।

By systemkasach

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