एक आम और मध्यम वर्ग का इंसान होने के नाते यह कहना अब “आरोप” नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है कि उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार अपने सबसे बेशर्म दौर में कुलांचें भर रहा है । देश-प्रदेश का आम आदमी हाड़तोड़ मेहनत कर जैसे-तैसे रोटी-दाल जुटा पा रहा है और उस दाल रोटी से भी कुछ बचाकर टैक्स दे रहा है । लेकिन जिनकी तनख्वाह लाखों में है, उनका पेट आज भी हराम के माल से ही भरता दिख रहा हैं । चारों तरफ लूट, चोरकटई और डकैती का अलार्म बज रहा है… और जो जिम्मेदार हैं, वही इस अलार्म को म्यूट कर मजा मारते फिर रहे हैं ।
क्या है मामला ?
दस्तावेज़ों और पत्राचार के आधार पर यह बात फिर से एक बार सामने आई है कि कानपुर की “गोपाल केमिकल्स” वर्षों से गोरखपुर के “जिला अस्पताल” और “मेडिकल कॉलेज” में सप्लाई के नाम पर भारी घोटालेबाजी में लिप्त है । हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो स्थानीय व्यवस्था किसी “संगठित गिरोह” के इशारों पर कठपुतली बन चुकी हो ।
मेडिकल कॉलेज में 8.5 लाख की रुई और सवालों का ढेर !
दस्तावेज़ों के अनुसार “मेडिकल कॉलेज” में लगभग 8.5 लाख रुपये की रुई की सप्लाई कानपुर के “गोपाल केमिकल्स” द्वारा की गई । सैंपल लखनऊ की कंपनी “ट्रूवेटा हेल्थकेयर” का पास हुआ था, लेकिन “दोयम” दर्जे की रुई “कमीशन बाजी” के चक्कर में कहीं और से खरीद कर “मेडिकल कॉलेज” में सप्लाई कर दी गयी । माल कहीं और से खरीदा गया लेकिन कानपुर के “गोपाल केमिकल्स” ने बिलिंग में रुई की खरीददारी “ट्रूवेटा हेल्थकेयर” के नाम पर ही दिखाई । “गोपाल केमिकल्स” का बिल देखने के लिए नीचे लिखे “मेडिकल कॉलेज बिल” पर क्लिक करें ।
अब “ट्रूवेटा हेल्थकेयर” द्वारा शासन को लिखे गए पत्र में यह बताया गया है कि उसके नाम का इस्तेमाल कर कहीं और से खरीदा गया माल “मेडिकल कॉलेज” में सप्लाई किया गया है । सवाल सीधा है कि अगर सैंपल किसी और का…माल किसी और का…तो फिर बिल “ट्रूवेटा हेल्थकेयर” के नाम का क्यों फाड़ा गया है…और इस “सुनियोजित डकैती” में कौन कौन शामिल हैं ? शासन को लिखा गया “ट्रूवेटा हेल्थकेयर” का पत्र देखें !
600 का सैनिटाइज़र, और 2250 की बिलिंग ?
कुछ महीने पहले “सिस्टम” के स्टिंग ऑपरेशन में सामने आए तथ्यों ने “व्यवस्था की रीढ़” हिला दी थी । महज 600 रुपये के सैनिटाइज़र को “जिला अस्पताल” गोरखपुर में 2250 रुपये दिखाकर कानपुर के इसी “गोपाल केमिकल्स” द्वारा ही बिल किया गया था । दस्तावेज़ों में लगभग “दो लाख” रुपये का भुगतान दर्शाया गया, जबकि “वास्तविक भुगतान” कहीं कम दर पर होने की बात सामने आई । “जिला अस्पताल” से कमीशनबाजी की इस खरीददारी में “डॉक्टर सुमन” और फार्मासिस्ट “अजय” का नाम सामने आया था जिनपर शासन से जाँच खोली गई और जाँच अभी भी प्रचलित है । स्टिंग में कानपुर के “गोपाल केमिकल्स” की यह बात भी रिकॉर्ड हुई थी कि… कि “जिस रेट का बिल चाहिए, बना देंगे” ! यह वाक्य किसी फिल्मी “डायलॉग” जैसा नहीं, बल्कि सड़ चुके सिस्टम का “एक्स-रे” है !
सिस्टम या सिंडिकेट ?
यह सारी स्थिति यही संकेत दे रही है कि यूपी में भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि “संगठित गठजोड़” का रूप ले चुका है । बाबू से लेकर चपरासी तक, और “मल मूत्र” का परीक्षण करने वाले “टेक्नीशियन” से लेकर कुर्सी पर जमे “साहबान”तक…हर कोई इस खेल में अपने हिस्से का माल तय करता हुआ दिखाई दे रहा है । और सबसे मजेदार यह..कि इसी प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” का ढोल बड़ी “बेशर्मी” से पीटा जा रहा है । “दूध”और “दवा” सबमे मिलावट है और “धर्मोपदेशक” लोग चीनी के बोरे में बैठकर “डाइबिटीज” पर ज्ञान दे रहे हैं । दूध पीने की बात सोचकर ही डर लगता है…इसलिए यदि कोई गाय पाल सके…तो ही अपने बच्चों को दूध की आदत डाले ! वरना बच्चों से कह दे कि दूध जैसी कोई चीज होती ही नहीं है । आये दिन “थार” गाड़ी वाले आतंक मचाये हुए हैं लेकिन “महेन्द्रा कंपनी” ने अपनी थार गाड़ी की ‘मैन्युफ़ैक्चरिंग डिफेक्ट’ के बारे में एक शोध करवाना भी आज तक जरूरी नहीं समझा । कुछ न कुछ तो “मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट” जरूर है…वर्ना कोई भी “चिमरखी” इसमें सवार होते ही अपने आप को “सिकंदर” कैसे समझने लगता है ? लोग कहते हैं कि “रेलवे” ने बहुत तरक्की की है ! क्या “घंटा” तरक्की की है ! आज तक “रेलवे” ने यह नहीं सोचा कि ट्रेन के शौचालय में बंधे “लोटे” के चेन की लंबाई थोड़ी और बढ़ा दी जाए…ताकि “लोटा” आसानी से अपने “गंतव्य” तक पहुँच सके ।
कल प्रसारित होने वाली खबर !
प्रेस क्लब में चुनाव है..क्या चल रहा है प्रेस क्लब में….?

