समीकरण सेट करने की रात…..कितना सटीक होगा प्रेस क्लब चुनाव का एग्जिट पोल ?

कल “प्रेस क्लब” में “लोकतंत्र” का त्योहार है । इस वक्त गले मिलना भी “गणित” है और चाय पिलाना भी “निवेश” ! पोस्टर कम हैं, मगर फुसफुसाहटें इतनी कि दीवारों ने भी कान बंद कर लिए हैं । अगर आप इन दिनों “प्रेस क्लब” के गलियारों से गुजरें तो आपको लगेगा जैसे हवा भी किसी न किसी के “पक्ष” में खड़ी है । बनावटी “मुस्कानें” रोजाना के मुकाबले थोड़ी लंबी हो गई हैं और हाथ मिलाना थोड़ा ज्यादा “गर्मजोशी” वाला हो गया है । बस एक कमी खल रही है कि हर चुनाव में “एक्जिट पोल” बताने वाले महारथियों के इस चुनाव का “एक्जिट पोल” कोई नहीं बता रहा ! इसलिए देखते हैं कि सबका “एग्जिट पोल” दिखाने वालों के खुद के “चुनाव” का “एग्जिट पोल” क्या कहता है !

अध्यक्ष पद : “खालिस सोना” चढ़ सकता है कुर्सी !

आग में तपा कर शुद्ध किये गए “खालिस सोने” को “कुंदन” कहा जाता है । सोने का भाव इन दिनों भले गिर रहा हो लेकिन “प्रेस क्लब” के “अध्यक्ष” की कुर्सी पर इस बार “ख़ालिस सोने” का दावा सबसे प्रबल बताया जा रहा है । पिछली चुनाव में इन्होंने उपाध्यक्ष पद पर अपनी चमक से सबको चौकाया था । अब इस चुनाव में “चौबीस कैरेट” वाले प्रत्याशी का “पलड़ा” भारी बताया जा रहा है । मिलावट वाले उम्मीदवार अभी भी “शुद्धता” “प्रमाणपत्र” खोज रहे हैं । “प्रेस क्लब” की गलियों में चर्चा है कि इस बार “स्वर्णिम चेहरे” वाले वरिष्ठ/गरिष्ठ पत्रकार की किस्मत चमकने वाली है ।

मंत्री पद : “विनम्र” महाराज बनाम “अनिच्छुक फ़क़ीर” !

मंत्री पद पर “विनम्र महाराज” की चाल सबसे सधी हुई है । “चुनावी गणित” कहता है कि इस बार “विनम्र महाराज’ का पलड़ा भारी है, क्योंकि प्रेस क्लब में झुककर चलने वालों की संख्या सीधी रीढ़ वालों की संख्या से कहीं ज्यादा है । “विनम्र” भी किसी प्रत्याशी के नाम का ही “पर्यायवाची” है । झुकी गर्दन, जुड़े हाथ और मुस्कान ऐसी कि विरोधी भी “आशीर्वाद” दे बैठें । वे बोलते कम हैं, मगर वोट ज्यादा जोड़ते हैं । दूसरी ओर चुनावी मैदान में इसी पद पर “दरगाह” की ओर से एक “अनिच्छुक फ़क़ीर” भी प्रत्याशी के तौर पर खड़े हुए हैं । चर्चा हैं कि उन्हें चुनावी अखाड़े में इस बार “जबरन” उतार दिया गया है । ये “जीतने” की बजाय किसी को “हराने” के “मूड” में उतरे हैं ! अर्थात इरादा “जीत” का कम और “समीकरण” बिगाड़ने का ज्यादा है । इन्हें ठीक वैसे ही आगे बढ़ाया गया है जैसे “शतरंज’ में “प्यादे” को सिर्फ रास्ता रोकने के लिए आगे बढ़ाया जाता है ।

संयुक्त मंत्री पर “अखाड़ा-पुरुष” का दंगल

संयुक्त मंत्री पद पर इस बार “पहलवानी कब्जा” होने के सम्पूर्ण आसार नजर आ रहे हैं । मंत्री पद की रेस में इस बार “अखाड़ा-पुरुष’ सबसे भारी दिखाई दे रहे हैं । प्रेस क्लब के “चुनावी दंगल” में इस “दंगल वीर” ने कईयों को पहले ही “मिट्टी” पकड़ा दी है । फर्क बस इतना है कि चुनाव में “लंगोट” की जगह “प्रचार-पर्चा” है, और यहाँ पटखनी “मतपत्र” से दी जाएगी । अब कौन हैं ये “अखाड़ा पुरूष” टाइप प्रत्याशी ये तो सभी जानते हैं !

उपाध्यक्ष : “इलाज पर्ची” से “चुनावी पर्चे” तक का सफर !

उपाध्यक्ष पद पर एक ऐसे चेहरे की चर्चा है जो “जिला अस्पताल” के वार्डों की “कृपा ऑक्सीजन” पर चला करते हैं । “पच्चीस बरस” से भी पुराने “डॉक्टर साहब” के “स्टेथोस्कोप” की छाया में पला यह “रणनीतिकार” इस बार लोगों के “सेंटीमेंट्स” पर काबिज होने में सफल रहा है । इनकी राजनीतिक सेहत हमेशा से “कृपा-प्रसाद” पर निर्भर रही है । पद पर काबिज होने के लिए आक्रांता “मुहम्मद गोरी’ की तरह इन्होंने इतनी बार “चुनावी चढ़ाई” की है..कि इनकी लगन देख लोगों के दिलों में अब इनके लिए “कृपा भाव” जागृत हो चुका है । इस बार महोदय ने भावनाओं का “आई वी ड्रिप’ लगा रखा है इसलिए कल तक “तड़तड़ा” कर खड़ा हो जाने की “प्रबल” संभावना है ।

कोषाध्यक्ष : “मर्यादा” वाले “मुनीमजी” !

क्लब की तिजोरी इस बार “मर्यादा वाले मुनीमजी” के “सुशीलता’ को जाती दिख रही है । कम बोलने और ज्यादा गिनने की कला में “माहिर” बताए जाते हैं । कहते हैं कि तिजोरी उसी को सौंपी जाती है जिसकी जेब सबसे कम “शोर’ करती हों । इसलिए क्लब की “तिजोरी” इस बार “शालीन तिजोरीपाल” के हाथों में जाती दिख रही है ।

पुस्तकालय मंत्री : “दिव्य-दृष्टि” वाले कथावाचक !

पुस्तकालय की अलमारियों के बीच इस बार एक ऐसे “कथावाचक” खड़े हैं जिनकी तुलना सीधे महाभारत के “संजय” से की जा रही है । जैसे उस “महागाथा” में संजय ने “धृतराष्ट्र” को दूर बैठकर युद्ध का हाल सुनाया था, वैसे ही हमारे “दिव्य-दृष्टि वाले पुस्तकपाल” चुनावी “कुरुक्षेत्र” का सीधा प्रसारण करने को तत्पर हैं । पुस्तकालय मंत्री पद पर इस बार दिव्य-दृष्टि वाले पुस्तकपाल की दावेदारी प्रबल है जो बिना पढ़े भी सब देख लेने का दावा रखते हैं । कहते हैं उन्हें हर चाल पहले से दिख जाती है ! कौन किससे मिला और किसने किसको साधा इन्हें सब मालूम है । कहते हैं कि क्लब के “धृतराष्ट्रों” की हर गतिविधि का “सीधा प्रसारण” यही सुनाते हैं ।

पत्रकारिता और “चुनावी महाभारत” के “पितामह” !

पौराणिक कथाएँ इस बात की साक्षी हैं कि हर युग और लगभग हर युद्ध “पितामह” के बगैर अधूरा है । “महाभारत का”ल में भी “पितामह” थे ..”भीष्म पितामह” ! “पक्ष” या “विपक्ष” सबके लिए आदरणीय, अनुकरणीय और बिल्कुल “तटस्थ” ! ठीक इसी तर्ज पर “पत्रकारिता” और इस “चुनावी संग्राम” के भी “भीष्म पितामह” मौजूद हैं ! फर्क बस इतना है, कि “महाभारत काल” वाले “पितामह” “श्वेत वस्त्र” धारण करते थे और “पत्रकारिता” वाले पितामह “करिया” !

इस बार का चुनाव केवल “पदों” का नहीं बल्कि “प्रतीकों” का भी है । “सोना” चमक रहा है, “विनम्रता” झुक रही है, “फ़क़ीरी अजान” की रणनीति बदल रही है, “पहलवान” गरम है, “जिला अस्पताल” का वार्ड राजनीति सिखा रहा है, “तिजोरी” मुस्कुरा रही है और “महाभारत” का वर्णन चुनावी “मुखारविन्द” से प्रसारित हो रहा है । यह तो आकलन भर है लेकिंन देखना यह दिलचस्प होगा कि “मतपेटी किसे “आशीर्वाद” देती है ? वैसे, यह तो सभी जानतें हैं कि “प्रेस क्लब” की जनता ही असली “धृतराष्ट्र” भी है और “अर्जुन” भी ।

By systemkasach

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