प्रेस क्लब चुनाव में “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” का “एग्जिट पोल” 60 प्रतिशत तक सटीक रहा । पाँच प्रत्याशियों के विषय मे किये गए “एग्जिट पोल” में तीन ने बाजी मारी और दो “धराशायी” हो गए । बहरहाल, प्रेस क्लब के चुनाव सम्पन्न हुए । उम्मीदों की गठरी इतनी भारी थी कि लगा अब पत्रकारिता की “नाव” नई दिशा पकड़ेगी ! दशा सुधरेगी और कलम की स्याही फिर से जनसरोकारों को खुशबू देगी । लगा था कि नई कार्यकारिणी “मीडिया” को “मर्यादा” का पाठ पढ़ाएगी और “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” थोड़ी मरम्मत के बाद फिर से सीधा खड़ा दिखेगा । जाहिर है कि चुनाव हुआ है तो “जीत” भी हुई होगी और जीत का “जश्न” भी ! “ढोल ताशे” भी बजे होंगे “नृत्य” भी हुआ होगा और हो सकता है कि “मुन्नी” भी एक बार फिर से “बदनाम” हुई होगी ! लेकिन सब एक पर्दे के भीतर हुआ होगा ताकि “लोकतंत्र” का पाठ पढ़ाने वालों के “अलोकतांत्रिक चेहरों” पर पर्दा पड़ा रहे । परंतु कल “जीत के जश्न” ने यह बता दिया कि अब पत्रकारिता भी अपना “विद्रूप चेहरा” ढकते ढकते खुद ही “उकता” गयी है ।
अपने विद्रूप चेहरे से “नकाब” उतार फेंकने की “अकुलाहट” कल इतनी जबरदस्त थी कि “लोकतंत्र” का यह “उत्सव” रात होते-होते “लोक-नृत्य” में बदल गया ! प्रेस क्लब के दरवाज़े पर ढोल-नगाड़े ऐसे बज रहे थे मानो किसी “जनहित याचिका” पर “ऐतिहासिक फैसला” आ गया हो ! “आतिशबाज़ी” ऐसी कि जैसे “भ्रष्टाचार” पर “स्थायी रोक” लग गई हो ! नारे ऐसे, जैसे लगा कि “सत्य” ने अभी-अभी “असत्य” को “पराजित” कर दिया हो ! “नृत्य” ऐसा… जैसे लगा कि “रीढ़विहीन पत्रकारिता” में अचानक “रीढ़” उत्पन्न हो गयी हो ! लेकिन इस “विजयगाथा” के “उत्सव” का असल चरम दृश्य तब सामने आया….जब जश्न को “पूर्णता” देने के लिए “सुरा-सम्मेलन” का “शुभारंभ” प्रेस क्लब के “मुख्य गेट” पर ही शुरू कर दिया गया ।
प्रेस क्लब का प्रवेशद्वार, जो कभी “वैचारिक बहसों” और “सामाजिक सरोकारों” का प्रतीक माना जाता था कल अचानक “खुले बार काउंटर” में तब्दील हो गया । एक पत्रकार महोदय ने शायद सोचा कि जब “भाग्य” खुल ही गए हैं तो फिर “बोतल” क्यों बंद रखी जाए ? और जब “बोतल” खुलनी ही है तो “चोरी छिपे” क्यों खुले ? इतनी “साफगोई” का नतीजा कुछ ऐसा रहा कि “लोकतंत्र की रक्षा” का “संकल्प” लिए एक “योद्धा” प्रेस क्लब के द्वार पर ही “लोकतंत्र” को “तरल श्रद्धांजलि” अर्पित करने लगे । विडंबना देखिए कि जो लोग दिन में “नैतिकता” पर “संपादकीय” लिखते हैं, उन्होंने “प्रेस क्लब” के गेट पर चल रहे इस “जाम ए जश्न” को रोकने की खातिर कोई “मशक्कत” नहीं की । जो “कैमरे” के सामने “संयम” का पाठ पढ़ाते हैं, उनके कदम कैमरे के पीछे “संयम” को “तिलांजलि” देकर “मुन्नी” को “बदनाम” करते हुए “थिरकने” क्यों लगते हैं ? जो सत्ता से “पारदर्शिता” की माँग करते हैं, वे स्वयं “पारदर्शी” गिलास में भविष्य की दिशा तलाशते दिखते हैं !
कहते हैं कि “जीत” का जश्न मनाइए, पर “गरिमा” तो बचाइए” ! लेकिन यहाँ “गरिमा” तो मतगणना की पेटी में ही दम तोड़ चुकी थी । जीत का “उन्माद” ऐसा लग रहा था जैसे “पत्रकारिता का मंच” नहीं बल्कि कोई “ठेका” हासिल हुआ हो । ऐसा लगा जैसे चुनी गई नई कार्यकारिणी शायद यह दिखाना चाहती है कि “अभी तो सिर्फ झाँकी है… पूरी पिक्चर बाकी है” ! अब पहले ही दिन “प्रेस क्लब” के मुख्य द्वार पर दृश्य ऐसा है, तो “अंदरूनी कमरों” में “लोकतंत्र” का कौन-सा “अध्याय” लिखा जाएगा, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है !
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