आज के हालात पर आम आदमी की “बेबसी” को उकेरता एक गीत है ! हर कदम पर कोई कातिल है….कहाँ जाए कोई !
फ़िल्म “अर्जुन पंडित” के इस गीत में संगीत दिलीप सेन,समीर सेन का है,गीतकार जावेद अख्तर हैं और आवाज उदित नारायण की है । समय मिले तो इस गीत को सुनिए और आम आदमी की “बेबसी” को महसूस कीजिये । बहुत लोग इस घटना को जानते हैं कि “संभल” में स्क्रैप का बिजनेस करने वाले “जफरूद्दीन” अपने बेटे “आस मोहम्मद” के साथ “कबाड़” ले जा रहे थे । यूपी पुलिस ने रोका, थाने ले गई और छोड़ने के लिए 30 हजार रुपये मांगे ! “जफरूद्दीन” पैसे देकर रिहा हो गए, लेकिन सामान वापस नहीं मिला । बाद में पुलिस ने सामान लौटाने के बहाने फिर से पैसे मांगे । “जफरूद्दीन” ने SP से शिकायत की और जाँच में सच्चाई सामने आने के बाद “SP” ने 8 पुलिसकर्मियों को “सस्पेंड” कर दिया ।
दूसरी तरफ “मध्यप्रदेश” के जिला मुख्यालय “नीमच” में “पुलिस बिकी हुई है” लिखकर एक “हेड कॉन्स्टेबल” ने “खुदकुशी” कर ली ! “सुसाइड नोट” में लिखा कि “डीजीपी” सर से निवेदन है कि पुलिस को इतना भी मत बेचो कि सही आदमी नौकरी नहीं कर पाए । “नीमच” जिले में सब कुछ बिक रहा है । कोई सुनने को तैयार नहीं है। थाने में पीसीआर लाइन, रोजनामचा, जिम, खेल सब पैसों में बिक रहे हैं । उक्त सभी बातें “नीमच” पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल “होशियार सिंह” के “सुसाइड नोट” का हिस्सा है । मतलब अपने “सुसाइड नोट” में “होशियार सिंह” ने अपने ही विभाग के अधिकारियों पर प्रताड़ना, भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगाए जिस कारण “हेड कॉन्स्टेबल होशियार सिंह” की मौत ने पूरे पुलिस महकमे को “कटघरे” में खड़ा कर दिया ।
संभल में “सस्पेंड” होने वाले “वर्दीधारी” कुछ महीनों बाद फिर से बहाल होंगे..और फिर नए “शिकार” तलाशेंगे ! “हेड कॉन्स्टेबल” की मौत का जिम्मेदार बना पुलिस का “विभागीय भ्रष्टाचार” कुछ दिनों बाद फिर से “अंगड़ाई” लेना शुरू कर देगा और एक नए “होशियार सिंह” की बलि कुछ दिनों बाद फिर से चढ़ा दी जाएगी ।
बहरहाल, छोड़िए इन बातों को और एक वाकया सुनिए ! आज से कोई हफ्ता भर पहले लखनऊ में एक “रिटायर्ड” क्लास वन अधिकारी के घर मेरा जाना हुआ । वहाँ उनके साथ उनके एक परिचित बैठे थे जो “बिहार पुलिस” में “इंस्पेक्टर” थे । बातचीत चल रही थी तो “इंस्पेक्टर साहब” कहने लगे कि बेटा बारहवीं की परीक्षा देने वाला है । फिर आगे की कॉलेज पढ़ाई के लिए उसे दिल्ली में पढ़ना है । “इंस्पेक्टर साहब” भविष्य में दिल्ली के किसी कॉलेज में अपने बेटे को “दाखिला” दिलाने की योजना लेकर आये थे । चाह रहे थे कि दिल्ली में कहीं एक “फ्लैट” मिल जाए । कहने लगे की बेटा अभी बाहरवीं की परीक्षा का प्रैक्टिकल दे रहा है, परीक्षा होने ही वाली है । परीक्षा होगी, रिजल्ट आएगा, तब तक फ्लैट मिल जाए, बस इसी “टेंशन” में इसी मसले पर आपसे “राय सलाह” करने आये हैं ।
रिटायर्ड अधिकारी साहब ने “इंस्पेक्टर साहब” की बात सुनकर तपाक से कहा कि इतना परेशान होने की जरूरत ही नहीं है । दिल्ली में किराए पर “फ्लैट” तुरंत मिल जाएगा । किस इलाके में चाहिए और कितना “बजट” है ? यह सुनते ही “इंस्पेक्टर साहब” तपाक से बोले, अरे नहीं ! “किराए” पर नहीं, “खरीद” ही लूँगा ! लेकिन “कैश” पर नहीं ! और आप तो समझते हैं कि हम लोग “चेक” से नहीं ले सकते । बातें सुनकर मैंने अंदाजा लगाया कि जाहिर है “इंस्पेक्टर साहब” दिल्ली में फ्लैट ढूंढ रहे हैं, और फ्लैट अपने नाम पर लेंगे भी नहीं ! मैं हैरान था कि वो बेटे को दिल्ली में पढ़ाने के लिए तीन चार “करोड़” का “फ्लैट” ऐसे खरीदने चले थे…..जैसे कोई झोला उठाकर “तरकारी” खरीदने निकला हो ! जानते हैं एक “इंस्पेक्टर” किस “रैंक” का “अधिकारी” होता है ? सेक्शन ऑफिसर, सुपरिंटेंडेंट स्तर के क्लेरिकल अधिकारी के बराबर ! कुछ विभागों में जूनियर इंजीनियर, तहसील स्तर के नायब तहसीलदार के आसपास के “वेतन-ग्रेड” के समकक्ष !
मेरे सगे रिश्तेदार लगभग ढाई दशक पहले “आईपीएस” थे । हालांकि उनमें ईमानदारी का “कीड़ा” ऐसा था कि इस कीड़े ने उन्हें कभी “मलाईदार पोस्ट” पर बैठने नहीं दिया । “ट्रांसफर” और “आईपीएस” साहब दोनों एक साथ चलते थे । जब वो “बिहार” में थे तब उन्हें देखता था और सोचता था कि ये “आईपीएस” होकर भी अपने बच्चों को कार से स्कूल नहीं भेज पाते । परिवार बाजार जाने से पहले दस बार सोचता है और यहाँ एक “इंस्पेक्टर” अपने बेटे की पढ़ाई के लिए तीन चार करोड़ का फ्लैट एक झटके में खरीदने निकल पड़ा है ! मुझे समझ नहीं आता था कि इस “गणित” में गड़बड़ी कहाँ है । उन्हें देखकर मैं अक्सर सोचता था कि एक “आईपीएस” की सैलरी कितनी होती होगी जो वो ढंग से जी भी नहीं पाता, और एक “इंस्पेक्टर” की कितनी होती होगी जो तीन चार करोड़ की “फ्लैट”..….?
वैसे “बिजली विभाग” के भी कई अधिकारियों और कर्मचारियों के घर में “लक्ष्मी” का संपूर्ण वास मैं खुद देखता रहा हूँ । हैरान होता हूँ और सोचता हूँ कि साल दर साल घाटे में जाने वाले बिजली विभाग के कर्मचारी और अधिकारी आखिर साल दर साल कैसे मालामाल होते चले जाते हैं ? खैर छोड़िए, क्योंकि सभी विभागों की कहानी ऐसी ही है, लेकिन आज हिसाब-किताब सिर्फ “पुलिस विभाग” का है इसलिए “ट्रैक” पर वापस आते हैं ।
पुलिस की नौकरी में सबसे नीचे “कांस्टेबल” होता है। उसकी कुल तनख्वाह 30 से 42 हजार प्रति माह के बीच सिमट जाती है । “हेड कांस्टेबल” 35 से 45 हजार तक ! “एएसआई” 40 से 50 हजार ! “सब इंस्पेक्टर” 50 से 65 हजार ! और जिस “इंस्पेक्टर” को लोग इलाके का “बादशाह” समझते हैं, उसकी पूरी तनख्वाह, सारे भत्ते जोड़कर, 65 से 80 हजार के बीच प्रति माह होती है । इसके बाद “डीएसपी” या “एसीपी” आते हैं। वर्दी का रौब बढ़ता है, पर जेब की गहराई बहुत नहीं बढ़ती ! 80 हजार से 1 लाख तक !फिर “एडिशनल एसपी” अधिकतम 1 लाख से 1 लाख 20 हजार तक और उसके बाद जिला का “राजा” कहे जाने वाले “एसपी” की तनख्वाह भी 1 लाख 10 हजार से एक लाख 40 हजार के बीच ही रहती है । सरकारी बंगला, अर्दली, गाड़ी, सायरन, सलाम और अलार्म सब मिलता है, लेकिन बैंक खाते में “करोड़ों” की बारिश नहीं होती ! होती है तो “नकद” में !
ये कोई ऐसी नौकरी नहीं कि आदमी खुद ब खुद “करोड़पति” बन जाए । एक ईमानदार “एसपी” अपनी पूरी “सैलरी” जोड़ता रहे और एक रुपया भी खर्च न करे, तब भी अपने “रिटायरमेंट” तक कितना जोड़ लेगा ? “इंस्पेक्टर” की पूरी जिंदगी की कमाई तो उससे बहुत कम ही होगी ! फिर भी आपने शायद ही कोई ऐसा “इंस्पेक्टर” देखा होगा जिसकी संपत्ति “करोड़ों” से नीचे हो । लखनऊ में जो मिले थे वो तो बगैर चेहरे पर कोई शिकन लिए तीन-चार “करोड़” का बजट अपने साथ ही लेकर आए थे ।
बस,सवाल यहीं से शुरू होता है और यहीं चुभता भी है । ये वही वर्दी है जो “कानून” का डर दिखाती है और उसी डर की कीमत वसूलती भी है । ये वही लोग हैं जो कागज पर “तनख्वाह” से घर चलाते दिखते हैं, पर असल में लोगों की मजबूरी और डर को अपना हथियार बनाकर फाइलों की गर्दन मरोड़ते हुए अपना भविष्य बनाते हैं । “सरकारी मकान” में रहते हुए भी अगले दस साल की “कॉलोनी” का “नक्शा” दिमाग में खींच डालते हैं । नौकरी के बाद “बिल्डर” बन जाते हैं, होटल के “मालिक” बन जाते हैं, “अस्पताल” खड़े कर लेते हैं । और अब तो “राजनीति” का दामन भी थाम रहे हैं । एक बार “राजनीति” में समा गए तो फिर कोई नहीं पूछता कि ये सब किस पैसे से और कैसे हुआ ?
ये तो बिल्कुल भी मत सोचिएगा कि वो अचानक “राजनीति” में जन सेवा का भाव लेकर घुस गए हैं । ये तो अपने “काले” को “सफेद” करने के लिए ऐसा करते हैं । वैसे भी पूछता कौन है ? लोग तो यही मान कर बैठे हैं कि “पुलिस” में है तो कमाएगा ही ! “वर्दी” के साथ “रिश्वत” सरकारी “हक” जो बन गया है । यही है आधुनिक भारत की सबसे चुभती हुई कहानी, जिसमें “सैलरी” छोटी है, पर “संपत्ति” बहुत बड़ी ! पहले भी समाज में “चोर अधिकारी” थे । लेकिन ये “आंकड़ा” बहुत छोटा था ! अब तो कमाल ही हो गया है…और ये कमाल इसलिए…क्योंकि हर तरफ भ्रष्टाचार के प्रति “जीरो टोलरेंस” की “पवन पुरवईया” चल रही है
कल क्या है खास….?
गोरखपुर में डॉक्टर से 15 लाख की रंगदारी माँगने के मामले में एक पुराना वीडियो खोलेगा राज …!

