यूपी : मैंने अपने छात्र जीवन में पहले यही सीखा कि व्यक्ति का कर्तव्य क्या है ? हर व्यक्ति के कर्तव्य के अनुपालन के दरम्यान रोजाना आने वाले मामलों में कुछ सही होता है और कुछ गलत ! लेकिन आज सही और गलत को नजरअंदाज कर कर्तव्यपालन की परंपरा बड़ी जोर शोर से चल पड़ी है । पत्रकारों के कर्तव्य पालन की बात करें तो पत्रकारिता का धर्म है गलत को उजागर करना । सच को सामने लाना । सच कभी सुविधा से नहीं आता बल्कि साहस से आता है और साहस आने के लिए आपका सत्य पर होना आवश्यक है । फिर मैंने कानून पढ़ा..वो इसलिए ताकि समझ में आये कि गलत की सजा क्या होती है । छात्र जीवन और सैनिक अधिकारी वाली पारिवारिक पृष्ठ भूमि ने और साथ ही तीन साल की NCC ट्रेनिंग ने अनुशासित रहना सिखाया…पत्रकारिता ने अपराध को देखने का नजरिया दिया और वकालत ने बताया कि अपराध का परिणाम क्या होता है ?
अपनी जीवनी फिर कभी बाद में, फ़िलहाल आज की खबर जान लेते हैं । यह वाक्या “खबर” कम और “अपराध” ज्यादा है । एक ऐसा “अपराध” जिसे “सरकार” और “व्यवस्था” के प्रति “विश्वासघात” कहना ज्यादा उचित रहेगा । कहते हैं कि ज़िंदगी मंज़िल का लालच देकर पूरी उम्र को “यात्रा” बना देती है । लेकिन जब यह “यात्रा” ईमानदारी से भटककर “जुगाड़ और सेटिंग” की पगडंडी पर चल पड़े, तो “मंज़िल” नहीं, “मंजर” बदल जाता है । अपने पद से अधिक “वेतनमान” लेने के मामले में “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” द्वारा उठाये गए मुद्दे की “आग” अब सिर्फ जिला अस्पताल गोरखपुर तक ही सीमित नहीं दिख रही बल्कि अन्य जिलों से भी इसी प्रकार के प्रकरण की परतें अब खुलकर सामने आ रही हैं । इन मामलों में जल्द ही “रिकवरी” के साथ-साथ FIR की कार्रवाई भी शुरू हो सकती है ।
क्या था मामला ?
गोरखपुर के स्वास्थ्य महकमे में कार्यरत लैब टेक्नीशियन “बड़े भैय्या” सहित कुछ कर्मियों पर आरोप सामने आया कि इन लोगों ने अपने वास्तविक “पद” और “पात्र इंक्रीमेंट” के सापेक्ष अधिक वेतनमान प्राप्त किया । सूत्रों के अनुसार यह मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं है । अब इसी क्रम में आजमगढ़ के कोषागार ने स्वास्थ्य भवन लखनऊ स्थित “वित्त नियंत्रक” को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि “सेवानिवृत्त” लैब टेक्नीशियन दरोगा सिंह और रामचंद्र प्रसाद को ₹5400 “ग्रेड पे” के आधार पर सेवानिवृत्ति लाभ देना नियमसम्मत नहीं है । इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि लैब टेक्नीशियन “दरोगा सिंह” तथा “रामचंद्र प्रसाद” द्वारा भी अपनी नौकरी के दरम्यान उच्च “ग्रेड पे” का लाभ ऐसे प्राप्त किया जाता रहा, जो उनके मूल पद और “सेवा अभिलेखों” के अनुरूप नहीं था । “कोषागार” के इस पत्र के बाद यह आसार नजर आ रहे हैं कि “दरोगा सिंह” मुल्जिम बना दिये जायेंगे और रामचंद्र समेत तमाम लोगों के खिलाफ वेतन अंतर की रिकवरी और दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है । पत्र देखें …
कौन हैं दरोगा सिंह ?
आजमगढ़ के लैब टेक्नीशियन “दरोगा सिंह” के संदर्भ में भी यही चर्चा है कि ये भी गोरखपुर के लैब टेक्नीशियन “बड़े भैय्या’ के नक्शे कदम पर चलने वाले “सुघर चरित्र” हैं । विभागीय जानकार बताते हैं कि दरोगा सिंह भी “बड़े भैय्या” की तरह “तीन पाँच” वाली “विधा” के काफी “पारंगत महारथी” माने जाते हैं । लेकिन दुर्भाग्य है कि अब सारा खेल पलट गया है और जो “खाया” था उसे वापस लौटाने की “तलवार” सिर पर लटकने लगी है । अपनी नौकरी के दरम्यान लंबे समय तक “प्रभाव” और “व्यवस्था की समझ” के कारण इन लोगों को सब कुछ सामान्य दिखता रहा, परंतु अब “सेवानिवृत्ति” के बाद जब सेवा अभिलेखों की पुनर्समीक्षा हो रही है, तो समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं । हालात ऐसे हैं कि “सेवानिवृत्ति” के समय यदि “ग्रेड पे” और वेतनमान पर “प्रश्नचिन्ह” लग जाए, तो पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ भी प्रभावित हो सकते हैं । ऐसे में “रिकवरी” की तलवार और “आपराधिक मुकदमा” दोनो साथ साथ चलता है । सेवा अभिलेख और वित्तीय नियम तो अंततः कागज़ पर ही तय होते हैं। अब निगाहें इस पर हैं कि पूरे प्रदेश में क्या इस मामले में अब व्यापक स्तर पर “ऑडिट” होगा ? क्या अन्य जिलों में भी रिकवरी और FIR की कार्रवाई शुरू होगी ? और यदि गड़बड़ी सिद्ध होती है तो ये जिम्मेदारी व्यक्तिगत होगी या संस्थागत ? समय ही तय करेगा कि यह मामला एक “उदाहरण” बनेगा या व्यवस्था के “सुधार का प्रारंभ” !
व्यक्तियों की चूक या प्रशासनिक विफलता !
बड़ा प्रश्न तो यह है कि क्या यह सिर्फ कुछ व्यक्तियों की चूक है या फिर एक व्यापक “प्रशासनिक शिथिलता” का परिणाम है ? जब “नौकरी पदानुसार” और “वेतन प्रभावानुसार” तय होने लगे, तो व्यवस्था पर “प्रश्नचिन्ह” लगना स्वाभाविक है । हमारी व्यवस्था के अतिरिक्त इतनी “उदार’ व्यवस्था और कहाँ मिलेगी कि नौकरी “चपरासी” जैसी और तनख्वाह “साहबों” जैसा ! ऐसी स्थिति देखकर यह कहा जा सकता है कि यहाँ न “जनतंत्र’ है औऱ न “गणतंत्र” है.. सिर्फ और सिर्फ “भ्रमतंत्र” है ! भारत एक “विकसित” नहीं बल्कि “अविकसित” और “असभ्य” देश की ओर बढ़ रहा है । यहाँ बच्चों के “दूध” से लेकर “दवा” तक में मिलावट है..यहाँ न शुद्ध “हवा” है..न यहाँ शुद्ध “पानी” है ! यहाँ “अंडे” नकली पाए जा रहे हैं…”पनीर” में मिलावट पाई जा रही है…हर खाने-पीने की वस्तु में मिलावट है…लेकिन फिर भी हम “जनसंख्या” और “भ्रष्टाचार” में लगातार “विश्व कीर्तिमान” स्थापित करने की ओर अग्रसर हैं । क्या ये “विकसित देश” की तरफ़ बढ़ने की निशानियां हैं ? जितना भी चाहे हाथ पैर मार लीजिए,लेकिन जीवन में आधी अधूरी सच्चाई, हराम की कमाई, एक्सपायरी दवाई, भागी हुई लुगाई, रिश्वतखोर सिपाही, रट्टामार पढाई, लालची घर जमाई, जंग लगी कढाई, फटी हुई रजाई और राजनीति मे भाई….ज्यादा दिन नहीं टिकते !
अति के बाद क्षति तय…
अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि रिटायरमेंट के समय ऐसा मामला फँस जाने के बाद “बड़े भैय्या” का क्या होगा..और इनकी तारीफ में दिन रात “चारण’ और “भाँटगिरी” करने वालों को अब “फंडिंग” कौंन करेगा ? मामला खुलने के बाद परिस्थितियाँ “विकट” लग रहीं हैं और संभावित परिणामों की आहट महसूस कर “बड़े भैय्या” ऐसे “निरीह” लग रहे हैं जैसे “वेनेजुएला” “अमेरिका” के “आतंक” की छाया में सूखकर “पीला” हुआ जा रहा हो । प्रकृति का “सर्वविदित” और “अकाट्य” सत्य यही है कि, “अति” के बाद “क्षति” तय है….चाहे आप कितने भी बड़े “दिग्गज” क्यों न हों !

