गोरखपुर फाइल्स : जीडी 73/A का रहस्य ! किस किरदार ने रची यह सियाह पटकथा ?

हालिया दिनों में “भास्कर” के स्टिंग ऑपरेशन ने उस “स्याह” बाज़ार का “परदा चाक” किया, जहाँ फर्ज़ी बलात्कार और पोक्सो के मुक़दमे अब कुछ गिरोहों की नज़र में महज़ “कारोबार” बन चुके हैं । पोक्सो से लेकर बलात्कार, गैंगरेप और छेड़खानी तक… हर इल्ज़ाम का जैसे “रेट-कार्ड” तय है । शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा सौदा, जहाँ कोई “पेशेवर” महिला या लड़की अपनी “इज़्ज़त” को दाँव पर लगाकर दूसरों की “इज्जत” को “सिक्कों” में तोलने चल देती है । कानपुर में “अखिलेश दुबे गैंग” और कुछ पुलिसकर्मियों की कथित मिलीभगत की दास्तानें भी सामने आईं । बलात्कार के फर्जी इल्ज़ामात के सहारे सुर्ख़ियाँ बटोरने और माल समेटने की बातें “हवा” में नहीं, “दस्तावेज़ों” में दर्ज हुईं । ये सब मिलकर एक ऐसे “निज़ाम” की तस्वीर उकेरता है जहाँ सच्चाई और साज़िश की “सरहदें” धुँधली कर दी गई हैं । सीएम सिटी गोरखपुर भी इस शर्मनाक धंधे के दंश से “महफ़ूज़” न रह सका । यही वजह थी कि महज़ तीन साल पहले “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” ने गोरखपुर में चल रहे इस खेल का “नक़ाब” उतार कर शहर को “हैरत” में डाल दिया था । आरोपियों और महिलाओं का पूरा गिरोह बेनक़ाब हुआ, और लोगों ने राहत की साँस ली । मगर सवाल अब भी मौज़ूँ है कि क्या वाक़ई यह “स्याह” कारोबार अब गोरखपुर से “रुख़्सत” हो चुका है ? जवाब है नहीं ! क्योंकि इस बार इस शर्मनाक धंधे से जुड़े “कुख्यातों” ने “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” को ही निशाना बनाने की “जुर्रत” की…लेकिन अपने ही बिछाए जाल में “उलझते” चले गए ।

पाक मुकद्दस दरगाह शहीद मुबारक खां…

गोरखपुर के शहीद मुबारक खां जैसे पाक व मुकद्दस “दरगाह” की आड़ में “नापाक” मंसूबों की एक ऐसी ही घटिया और शर्मनाक “दास्तान” बुनी गई थी । अब इस शर्मनाक और घटिया “दास्तान” की परत-दर-परत उधड़ रही है और खुलासे का सनसनीखेज़ मोड़ अब “मंज़र-ए-आम” है । इशारे साफ़ हैं की फ़रेब का ताना-बाना बुनने में खुद को उस्ताद समझने वाले “इक़रार” का दाँव अब उसी पर उल्टा पड़ चुका है । हर बार तमाम लोगों के खिलाफ साजिशों को असल का अमलीजामा पहनाने में कामयाब रहा “इक़रार” यह भूल गया था कि अब उसकी “नापाक रूह” से “दरगाह मुबारक” भी “रुखसती” चाहती है । यही वजह है कि “मुकद्दस दरगाह” की “रूहानी ताकत” ने इस बार “इक़रार” की “कुंडली” ऐसी जगह उलझा दी जहाँ “शैतान” और “जिन्नाद” भी “पनाह” माँगते हैं ।

क्या था असल माजरा ?

अपने कारनामों के खुलासे “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” पर देखकर बौखलाया इक़रार, “शातिराना” चालों का ऐसा “जाल” बिछा रहा था मानो कोई “सियाह” पटकथा लिखी जा रही हो । अब तक जो तस्वीर सामने थी, उसमें एक “पेशेवर महिला” को “सुपारी” देकर “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के संपादक समेत तीन अन्य लोगों पर “गैंगरेप” का फर्ज़ी मुक़दमा दर्ज कराने की “साज़िश” दिखाई दे रही थी । मगर “हक़ीक़त” की “तह” में उतरे तो कहानी और भी “पेचीदा” निकली । मामले को बिल्कुल असली रंग देने के लिए कथित “पेशेवर” महिला से फ़ोन कराकर यह तक कहलवाया गया कि उसे इस “काम” के एवज़ में “रकम” अदा की गई, जिसके बाद उसने दिल्ली के “कालिन्दीकुंज” थाने में तहरीर दी थी ! लेकिन “क़िस्सा” यहीं करवट लेता है क्योंकि बाद में उसी महिला ने इस खेल का हिस्सा बनने से “इंकार” कर दिया ।

घटनाक्रम, जाँच और रिकॉर्डिंग्स से बेनक़ाब राज़..

इस पूरे प्रकरण में थाना चिलुआताल गोरखपुर में एक मुकदमा दर्ज हो चुका है और एक अन्य “हाईकोर्ट” की दहलीज पर है । मुक़दमे के वादी शाहिद खान द्वारा दिए गए “शपथपत्र” का “मुतालिया” चौंकाने वाला है । सबूतों के हवाले से इक़रार अहमद, पेशेवर महिला, नदीम और इक़रार के दो गुर्गों के मोबाइल नंबरों को इस शर्मनाक साज़िश का “सरगना” बताया गया है । जाँच अधिकारी की “कॉल रिकॉर्डिंग्स” और “कालिन्दीकुंज” थाना से प्राप्त “इनपुट्स” ने तो जैसे इस “ड्रामे” का “नक़ाब” ही उतार दिया । इन जानकारियों के मुताबिक 29 अक्टूबर 2025 को “कलिन्दीकुंज” में दी गई बताई जाने वाली “गैंगरेप” की तहरीर, दरअसल, कभी थाने में “दाख़िल” ही नहीं हुई थी । मगर उस तहरीर को असली साबित करने के लिए थाने की “मुहर” बनवाकर “तहरीर” पर “जड़ी” गई । इतना ही नहीं, बल्कि उस फर्जी तहरीर पर “जीडी संख्या 73/A” अंकित कर उसे “ओरिजनल” दिखाने की हर मुमकिन कोशिश की गई ।

जीडी के राज़ का इशारा -: वर्दी में है कोई विभीषण !

थाने से प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक “जीडी संख्या 73/A” पर किसी “तहरीर” का ज़िक्र नहीं, बल्कि थाना “कलिन्दीकुंज” के सिपाही धर्मेंद्र मीणा की “रवानगी” दर्ज है । अब सवाल ये है कि “जीडी” की इतनी सटीक जानकारी किसी बाहरी शख़्स तक पहुँची कैसे ? क्या वर्दी के “दामन” पर दाग़ लगाने वाला कोई “वर्दीधारी विभीषण” अंदर ही बैठा है ? यह सवाल अब फुसफुसाहट नहीं, बल्कि “दस्तावेजी गूँज” बन चुका है ।

कैसे फँसा तिकड़मबाज़ इक़रार ?

सारी “साज़िश” रचने के बाद “इक़रार” ने 29 अक्टूबर 2025 की इसी कथित “तहरीर” को अपने गुर्गे “नदीम” के ज़रिये “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के संपादक के मोबाइल पर भेजकर धमकाने की “हिमाक़त” कर दी थी । अब सवाल यह था कि “हजार किलोमीटर” दूर एक ऐसी “गुमनाम” तहरीर जो “कालिन्दीकुंज” थाने की “चौखट” तक पहुँची ही नहीं….वो आखिर “इक़रार” और उसके “गुर्गे” नदीम तक महज 24 घंटों के “दरम्यान” कैसे पहुँच गयी ? बस… यही वो “लम्हा” था जहाँ से खेल पलट गया और “भूंसे के ढेर” से “सुई” खोजने वाला “खोजी दस्ता” हरकत में आ गया । एक बेहद “साजिश” भरी घटिया “पटकथा” की “स्क्रिप्ट” परत दर परत खुलती चली गईं । “इनपुट्स” और “रिकॉर्डिंग्स” ने साफ़ कर दिया कि कालिन्दीकुंज थाने की “मुहर” और “जीडी” की नकल कर फर्ज़ी “तहरीर” तैयार कर “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” को डराने,धमकाने और “ब्लैकमेल” करने की कोशिश इसलिए की गई… ताकि “इक़रार” अपने खिलाफ “प्रसारित” हो रही “खबरों” पर “विराम” लगा सके ।

क्या इक़रार को बचाने में लगी है पुलिस ?

कालिन्दीकुंज थाने की रिपोर्ट्स और जाँच अधिकारी की कॉल रिकॉर्डिंग्स बताती है कि 29 अक्टूबर 2025 को ऐसी कोई तहरीर कालिन्दीकुंज थाने में प्राप्त ही नहीं हुई । लेकिन जब सीओ साहब को प्रार्थना पत्र देकर इस मामले में “इक़रार” के खिलाफ मुक़दमा दर्ज करने का निवेदन किया गया…तो मामला टालने के लिए साहब ने यह रिपोर्ट लगा दी  कि प्रकरण पहले ही “कालिन्दीकुंज” थाना में दर्ज है । वाह रे “सीओ साहब” का “निज़ाम” ! क्या ग़ज़ब का “इत्तेफ़ाक़” है ! अपने थानों का तो साहब को कुछ पता ही नहीं औऱ हजार किलोमीटर दूर बने थानों की रिपोर्ट साहब यहीं बैठकर लगा दे रहे हैं । प्राप्त “दस्तावेज़” इस ओर भी इशारा करते हैं कि “इक़रार” के “मुक़दमों” और “पासपोर्ट” संबंधी “आरटीआई” जैसे मामलों में भी साहब ने ग़लत रिपोर्ट्स लगाने का सिलसिला “बदस्तूर” जारी रखा । आखिर क्या सोचकर ? शायद यही सोचकर, कि “इक़रार” पर दर्ज मुकदमों की “दफ़न” की जा चुकी फाइलों को अब कोई नहीं खोजेगा ! शायद ये सोचकर, कि “इक़रार” का “असलहा” यूँ ही गोरखपुर की “लाइसेंस व्यवस्था” को मुँह चिढ़ाता रहेगा ! या फिर ये सोचकर, कि गलत तरीके से बने “पासपोर्ट” के जरिये “इक़रार” यह देश छोड़कर आराम से भाग सकेगा ! दूसरी तरफ “चिलुआताल” पुलिस की “सुस्ती” का आलम यह है कि दो महीने गुजरने को हैं..वादी के गवाह इंतजार कर रहे हैं…मगर दर्ज मुकदमे में अब तक विवेचक ने वादी के “गवाहों”को बुलाकर उनके बयान तक दर्ज नहीं किये हैं । इस मामले में पुलिस की “फर्ज़ी रिपोर्ट” और “शिथिलता” महज़ मजबूरी या कोई और “दास्तान” नहीं है…बल्कि पुराने विभागीय जानकार दबे “लफ़्ज़ों” में कहते हैं कि पुलिस पर “इक़रार” का एक भारी-भरकम “एहसान” है…और वही बोझ आज तक पुलिस “बेमन” से “ढोए” जा रही है । बेशक ढोइए साहब, रोकता कौन है ? मगर “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” किसी एहसान या दबाव का “मोहताज” नहीं है, क्योंकि यह हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि इज़्ज़त, साख और सच्चाई पर सीधा “वार” है । पुलिस की हीलाहवाली, टालमटोल और फर्ज़ी रिपोर्ट्स के इस सिलसिले ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि बहुत जल्द इस मामले में उच्चस्तरीय “न्यायिक दख़ल” की दस्तक सुनाई दे सकती है ।

पासपोर्ट मामले पर विदेश मंत्रालय की नजर..

नियमों को दरकिनार कर बनाये गए “इक़रार” के “पासपोर्ट” के मामले में “विदेश मंत्रालय” के निर्देश पर “आरपीओ” लखनऊ और “गोरखपुर पासपोर्ट सेवा केंद्र” सक्रिय हो चुका है । उपरोक्त संस्थान में कार्यरत एक कर्मचारी ने बताया कि “पासपोर्ट” मामले में थाना “राजघाट” से “इक़रार” के आपराधिक मुकदमों का विवरण मांगे हुए 15 दिन से ऊपर गुजर चुके हैं लेकिन अब तक कोई “विवरण” नहीं भेजा गया है । आखिर रिपोर्ट भेजने में इतनी दुविधा में क्यों है “साहब” ? भेज दीजिये वैसी ही कोई फर्जी “रिपोर्ट” जो इक़रार के मामलों में अबतक भेजी जाती रही है ।

जीडी 73/A एक्सपोज, ताकि स्याही और जमीर जिंदा रहे…

अपने कारनामों के खिलाफ प्रसारित खबर को रुकवाने के लिए यदि “इक़रार” ने ये “शर्मनाक” और “ढिठाई” का रास्ता न चुना होता, तो हो सकता है कि इक़रार की साज़िश भरी “सल्तनत” कुछ और समय तक “महफूज” रहती । लेकिन घटना के बाद हमने “ख़ामोशी” नहीं चुनी, क्योंकि “ख़ामोशी” अक्सर “गुनाह” की “हमराज़” बन जाया करती है । पत्रकारिता में आने के बाद मुझे “सिस्टम” के अंदर और बाहर बैठे ऐसे ऐसे “महादैत्यों” और “महाबदमाशों” से लड़ना पड़ा, जिनके बारे में लोग सुनकर ही अपनी राह बदल लेते हैं । लेकिन मैं खूब “लड़ा” भी, “भिड़ा” भी और खूब “झेला” भी ! सच्चाई यह है कि मैं न तो कोई “जंग” छेड़ना चाहता हूँ, और न ही किसी “मोड़” पर उलझना मेरी “फ़ितरत” है । लेकिन लाख न चाहते हुए भी फिर कोई “अदृश्य” ताक़त, कोई अनदेखी “क़ुव्वत” मुझे उसी “अखाड़े” में उतार देती है जहाँ “सच” और “झूठ” आमने-सामने खड़े होते हैं । शायद यह “पेशा” नहीं, एक “पैग़ाम” है । शायद यह “संघर्ष” नहीं, एक “ज़िम्मेदारी” है । और शायद मैं नहीं “लड़” रहा बल्कि मुझे “लड़वाया” जा रहा है… ताकि “स्याही” ज़िंदा रहे, और “ज़मीर” भी

By systemkasach

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