गोरखपुर : गोरखपुर के सीएमओ कार्यालय में मुख्यमंत्री का OSD बनकर अस्पताल संचालक से एकमुश्त 15 लाख रुपये ठगने के कथित मामले में अब कहानी ने ऐसा मोड़ लिया है, जिसने पूरे प्रकरण को और उलझा दिया है…या शायद और भी ज्यादा साफ़ कर दिया है । अब तक जो सामने था, वह यह कि अस्पताल संचालक से सीएमओ कार्यालय परिसर में 15 लाख रुपये एकमुश्त लिए गए और लगभग तीन-चार घंटे बाद अस्पताल का पंजीकरण निरस्त कर दिया गया । लेकिन कहनी का एक बेहद दिलचस्प मोड़ यहीं से शुरू होता है ।

आनन-फानन में तहरीर… और तारीख गायब !
घटना के मामले में जानकारी मिली कि सीएमओ गोरखपुर ने साइबर थाने में अज्ञात ठगों के खिलाफ “मुकदमा” दर्ज कराने हेतु तहरीर दे दी । पहली नज़र में यह सक्रियता लग सकती है लेकिन जब तहरीर सामने आई, तो उसमें एक बड़ा “झोल” यह दिखा कि उसमें “तारीख” ही गायब है । तारीख की जगह सिर्फ “फरवरी 2026” लिखा हुआ है । इतनी गंभीर घटना…इतनी बड़ी ठगी.. ठगी सीएमओ साहब के कार्यालय परिसर में….और हड़बड़ी इतनी कि तहरीर में “तारीख” डालना ही भूल गए ? या फिर जल्दबाज़ी किसी और कारण से थी ? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सीएमओ साहब को “ठगी” की जानकारी दी किसने ? अस्पताल संचालक का दावा है कि उसकी इस संबंध में “सीएमओ” से कोई बातचीत नहीं हुई । यदि पीड़ित ने सूचना नहीं दी, तो फिर सूचना का स्रोत क्या था ? और यदि सूचना मिल गई थी, तो “तहरीर” में पीड़ित का नाम क्यों नहीं ? क्या सीएमओ साहब “पीड़ित” का नाम भी नहीं जानते थे ? या फिर नाम जानकर भी न जानने का “अभिनय” किया गया ? इस प्रकरण में संयोग इतना “प्रबल” है कि 28 फरवरी को 15 लाख की ठगी…28 फरवरी को ही लाइसेंस निरस्त और 28 फरवरी को ही सीएमओ साहब की साइबर थाने में तहरीर पड़ जाती है !

सीएमओ परिसर में ठगी…तहरीर साइबर थाने में और मुकदमा कैंट में !
ठगी की कथित घटना सीएमओ कार्यालय परिसर में हुई । रुपयों का झोला हाथों-हाथ लिया गया । यह “भौतिक” लेन-देन था । फिर मुकदमे की तहरीर “कोतवाली” थाने की बजाय साइबर थाने में क्यों ? क्या पूरा घटनाक्रम “डिजिटल” था, या “डिजिटल” बनाकर पेश किया गया ? यह प्रश्न इसलिए भी अहम है क्योंकि बाद में मुकदमा थाना कैंट में दर्ज हुआ रात लगभग साढ़े नौ बजे ! लेकिन वहाँ भी वही कहानी दोहराई गई…. मुकदमे में “पीड़ित” का नाम नहीं, मुख्यमंत्री का “OSD” बनकर ठगी का स्पष्ट उल्लेख नहीं । इतने बड़े प्रकरण को इतनी “साधारण” भाषा में दर्ज करना क्या महज़ “संयोग” है या गंभीर आरोपों को “हल्का” बनाने की कोशिश ?
तहरीर थी या तहरीर में लिपटा सेल्फ डिफेंस का परवाना ?
अस्पताल संचालक ने “सीएमओ” की इस “सक्रियता” को चोर की दाढ़ी में “तिनका” बताया है । संचालक का आरोप है कि यह तहरीर इसलिए दी गई क्योंकि सीएमओ साहब को आशंका थी कि इस मामले में खुद उनके और उनके कर्मचारियों खिलाफ ही “मुकदमा” दर्ज हो सकता है । दूसरी ओर, संचालक ने कल रात ही अपनी तहरीर IGRS पर एसएसपी गोरखपुर को संबोधित करते हुए दी है । इस तहरीर में संचालक ने “ठगों” के साथ सीधे-सीधे सीएमओ और उनके कार्यालय के कर्मियों को जिम्मेदार ठहराया है । संचालक द्वारा दी गई तहरीर देखें ….
घटनाओं का स्क्रिप्टेड कथानक….
घटनाओं की टाइमिंग देखिए कि 15 लाख की कथित “ठगी”…उसी दिन “लाइसेंस” निरस्तीकरण..उसी दिन “ठगों” के खिलाफ साइबर थाने में “तहरीर”…”तहरीर” में पीड़ित का नाम और तारीख गायब ! फर्जी “OSD” एंगल का जिक्र तक नहीं और मुकदमा थाना “कोतवाली” की बजाय “कैंट” में दर्ज ! अब इतने सारे “संयोग” अगर एक साथ हों, तो इसे अद्भुत “प्रशासनिक अव्यवस्था” कहें…या फिर “अलौकिक” खगोलीय “घटनाक्रम” !

अखबारी तंत्र…
अखबारी तंत्र ने इस मामले में नमक का हक बहुत ईमानदारी से अदा किया है । अखबार इस पूरे मामले को साधारण साइबर ठगी बताने पर आमादा है । भले ही यहाँ “भौतिक” लेनदेन हुआ हो और “साइबर एंगल” का दूर दूर तक इस घटना से कोई मेल मिलाप न हो … लेकिन तब भी । अस्पताल संचालक के पास “अखबारनवीसों” ने कल रात फोन कर सारी घटना की सिलसिलेवार जानकारी ली लेकिन सबकुछ जानने के बाद भी कुछ भी नहीं “छापा” गया । “ख़बरवीरों” ने तो इस बात पर भी प्रश्न नहीं उठाए कि 15 लाख का लेनदेन जब हाथों हाथ हुआ तो फिर साइबर थाने में साहब ने तहरीर क्यों दे दी और मामला कोतवाली की बजाय थाना कैंट में क्यों दर्ज हुआ ? इसलिए कहता हूँ कि “कृपा कोटा” से मिली नौकरियों का प्रभाव बड़ा “व्यापक” होता है ।
घटना की दस्तक पंचम तल तक
यह घटना अब चर्चा का विषय बन चुकी है । यह भी बताया जा रहा है कि 9 लोगों की आँख की रोशनी जाने के बाद उच्चाधिकारियों ने 20 फरवरी के पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि अस्पताल का “लाइसेंस” निरस्त होगा । 20 फरवरी को अस्पताल संचालक को “स्पष्टीकरण” देने के लिए नोटिस जारी करते हुए तीन दिन का समय भी सीएमओ साहब ने दिया । संचालक ने समय सीमा के भीतर “स्पष्टीकरण” दे भी दिया तो फिर “निरस्तीकरण” का आदेश जारी करने में साहब ने 28 फरवरी तक इंतजार क्यों किया ? संचालक का कहना है कि उसके पास ठगों का फोन 20 फरवरी से ही आना शुरू हुआ था । कहा जा रहा है कि लखनऊ के “पंचम तल” तक इस घटना की “गूँज” पहुँच चुकी है । “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” पर खबर प्रकाशित होने के बाद यह मामला अब दबे “स्वर” से निकलकर खुले “विमर्श” में आ चुका है । कहीं थाना “कैंट” में मुकदमा दर्ज कराने का मकसद “सीसीटीवी” छुपाना तो नहीं ? क्या अब तक “कैंट” पुलिस “सीसीटीवी” तक पहुँच सकी है ? फिलहाल तो हालात ऐसे हैं कि इस प्रकरण में “आन मिलो सजना” की “पटकथा” कभी भी शुरू हो सकती है…जहां सभी किरदार अंततः एक ही “फ्रेम” में दिखाई देंगे । जाँच जो भी हो लेकिन “हालात” यह बता रहे हैं कि इस कहानी का असली अंत “अदालत” ही तय करेगी और शायद वही बताएगी कि यह ठगी थी, साजिश थी, या व्यवस्था का एक और “अनगढ़ अध्याय” !

