गोरखपुर : सीएमओ कार्यालय की सेटिंग आधारित व्यवस्था की असीम “अनुकंपा” के कारण डॉ. पराग अग्रवाल का वह बयान अब सामने आ चुका है, जो राजेश हाईटेक हॉस्पिटल की जाँच के दौरान जाँच टीम द्वारा दर्ज किया गया था । जाँच पूरी हो चुकी है और परिणाम आ चुके हैं । अस्पताल का “लाइसेंस” निरस्त हो चुका है ! डकारने वाले 18 लाख “डकार” चुके हैं FIR दर्ज है….एकाध और दर्ज हो सकती है…”पुलिस जाँच” फ़िलहाल जारी है…बस सेहत महकमे द्वारा पूर्ण की जा चुकी “जाँच” पर सवाल पूछना बाकी है ।
जाँच रिपोर्ट पहला सवालिया निशान !

जाँच दल की रिपोर्ट में दिखाया गया है कि अस्पताल में घटी घटना का “संज्ञान” 4 फरवरी को लिया गया और “अस्पताल” पर सभी चिकित्सकीय कार्य रोकने के निर्देश दिए गए । सीएमओ आफिस से जारी एक अन्य नोटिस के अनुसार मेडिकल कॉलेज की “माइक्रोबायोलॉजी” टीम 9 तारीख को अस्पताल में सैंपल “कलेक्ट” करने पहुँची । संचालक का कहना है कि निर्देश के क्रम में 4 फरवरी से ही “अस्पताल” को बंद कर दिया गया था । अब इस स्थिति में पहला सवाल यह है कि पाँच दिन बाद “सैंपल” क्यों ? सीएमओ कार्यालय की रिपोर्ट कहती है कि “बायपोलर कॉटरी मशीन” और “ऑपरेशन थिएटर” में “बैक्टिरियल इन्फेक्शन” पाया गया । अस्पताल 4 फरवरी से बंद और सैंपल उठाये गए 9 फरवरी को ! जब “Infection Prevention & Control” गाइडलाइन 24 घंटे के भीतर “सैंपलिंग” की बात करती हैं, तो पाँच दिन बाद की जाँच किस “वैज्ञानिक सिद्धांत” पर आधारित थी ? पाँच दिन बंद पड़े OT में “बैक्टीरिया” मिलना कोई आश्चर्यजनक और “हृदय विदारक” घटना नहीं है । यदि कोई चीज खुले वातावरण में पाँच दिन से पड़ी रहे तो “बैक्टीरिया” ओटी में ही नहीं बल्कि “मुँह” और “विचारों” में भी पनप सकता है । तो क्या पाँच दिन बाद का “कलेक्ट” किया गया “सैंपल” घटना वाले दिन की सटीक “तस्वीर” दे सकता है ? या जाँच का “नतीजा” पहले से ही तय था और “सैंपल” बाद में उठाया गया ?
जाँच रिपोर्ट पर दूसरा सवालिया निशान !
1 फरवरी को एक ही दिन में 30 लोगों के आँखों का “ऑपरेशन” ! एक ही “ऑपरेशन थिएटर” ! एक ही “बाइपोलर कॉटरी मशीन” औऱ एक ही “सर्जन” डॉ. पराग अग्रवाल ! लेकिन “संक्रमण” का पैटर्न देखिए कि मरीज नंबर 1,2,3 संक्रमित लेकिन मरीज 4 से 13 सामान्य ! मरीज नंबर 14 से 18 संक्रमित लेकिन मरीज 19 से 25 सामान्य ! मरीज नंबर 26 संक्रमित लेकिन मरीज 27 और 28 सामान्य ! फिर मरीज नंबर 29 और 30 संक्रमित ! अब सवाल उठता है कि यदि OT और मशीन ही “संक्रमण” का स्रोत थे, तो संक्रमण “क्रमिक” (continuous) क्यों नहीं फैला ? “बैक्टीरिया” ने भी “चयनात्मक” नीति अपना लिया था, या फिर कोई “दैवीय” प्रकोप या घोर “चिकित्सकीय” लापरवाही थी ?
डॉक्टर के लिए क्या कहता है ACT !
Indian Penal Code की धारा 88 यह कहती है कि यदि कोई कार्य किसी व्यक्ति की भलाई (benefit) के लिए, उसकी सहमति (consent) से और “सद्भावना” में किया गया हो, और उस “सद्भावनापूर्वक” किये गए कार्य के कारण अनजाने में यदि नुकसान हो जाए, तो वह “अपराध” नहीं माना जाएगा । इसका मतलब है कि यदि ऑपरेशन सही प्रक्रिया और अनुमति के साथ किया गया और फिर भी “जटिलता” हो गई, तो केवल परिणाम खराब होने से डॉक्टर “अपराधी” नहीं माना जायेगा । अब ऐसा कानूनी “कवच” हमारे अंधे कानून में कुछ गिने चुने “पेशे” की भलाई के लिए ही है । ऐसा कोई “कवच” या “ढाल” अस्पताल संचालक को प्राप्त नहीं है ! शायद यही कारण है कि इस मामले में अस्पताल संचालक को “सजा-ए-मौत” (लाइसेंस निरस्तीकरण) की सजा सुना दी गयी ।
जाँच रिपोर्ट पर तीसरा सवालिया निशान ! पीडीएफ देखें
डॉ. पराग अग्रवाल ने जाँच टीम को दिए अपने बयान में कहा कि
OT में Standards & Guidelines का पालन नहीं किया जाता था और उन्होंने कई बार इस पर आपत्ति भी की थी । यदि यह “तथ्य” सत्य है, तो 1 फरवरी को उसी “OT” में 30 सर्जरी डॉक्टर साहब ने क्यों की ? यह भी एक रिकार्डेड “तथ्य” है कि डॉक्टर साहब जिस “राजेश हाईटेक हॉस्पिटल” की “OT” को अपने बयान में बेकार और “मानकविहीन” बता रहे हैं…उस “OT” में अब तक वो “300” से अधिक “सर्जरी” कर चुके हैं ! यदि “OT” में हालात ऐसे थे तो एक जिम्मेदार “चिकित्सक” को उसके संभावित “परिणामों” का ज्ञान अवश्य होता है । यदि जोखिम ज्ञात था, तो फिर “सर्जरी” स्थगित क्यों नहीं की गई ? क्या डॉक्टर को “बाध्य” किया गया था ? क्या इस संबंध में कोई “लिखित आपत्ति” दर्ज की गई थी ? या फिर किसी “उच्च प्राधिकरण” को सूचित किया गया था ? यदि ज्ञात “जोखिम” के बावजूद सर्जरी की गई, तो इसका जिम्मेदार मात्र अस्पताल संचालक को नहीं ठहराया जा सकता । “National Medical Commission Act, 2019” के तहत “Professional Misconduct” की परिभाषा में यह “आचरण” आ सकता है जहाँ “चिकित्सकीय दायित्वों” का निर्वहन अपेक्षित “सावधानी” के बिना किया गया हो । मामला गंभीर है इसलिए इस मामले में संबंधित “मेडिकल कौंसिल” द्वारा “प्रैक्टिसिंग लाइसेंस” निरस्त भी किया जा सकता है !
“समरथ को नहिं दोष गुसाईं” !
तुलसीदास की यह पंक्ति आज भी “प्रासंगिक” है । शक्ति के समीकरणों में दोष का “निर्धारण” अक्सर सरल नहीं होता । यह लेख किसी को “दोषी” घोषित नहीं करता बल्कि केवल यह पूछता है कि क्या “जाँच” वैज्ञानिक कसौटी पर पूर्ण थी ? क्या “संक्रमण” का पैटर्न “तार्किक” रूप से समझाया गया ? क्या बयान और निर्णय के बीच “विरोधाभास” की पड़ताल हुई ? क्या इस पूरे कांड का एकमात्र जिम्मेदार सिर्फ अस्पताल संचालक है ? क्या लाइसेंस जारी करने वाले “सीएमओ” कार्यालय तथा “ऑपरेशन” करने वाले डॉक्टर की कोई जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी ? क्योंकि जब “30” ऑपरेशन होते हैं और कुछ “आँखें” चली जाती हैं, तो सवाल उठना उतना ही “स्वाभाविक” है जितना असल “दोषियों” तक “जाँच की आँच” का पहुँचना !

