गोल्ड का दौर..और गोल्डन किरदारों की सुनहरी करतूतें !

गोरखपुर/देवरिया : वर्तमान “कालखंड” में “गोल्ड” और “गोल्डन” किस्म के लोगों की करामातों ने जनता जनार्दन को “हैरत” में डाल रखा है । एक तरफ “गोल्ड” है जो झटके पर “झटका” दिए जा रहा है । कभी खबर आती है कि “गोल्ड” दो लाख के “आंकड़े” को छूने वाला है, तो कभी “गोल्ड” अचानक से “बोल्ड” होकर “धड़ाम” होते हुए माथे पर चिंता की “लकीरें” खींच देता है । दूसरी तरफ ये “गोल्डन टाइप” के लोग हैं, जो अपने “कारनामों” से प्रशासनिक गलियारों की “पृष्ठभूमि” पर अपनी “सुनहरी यादें” चस्पा करते चले जा रहे हैं । कहीं ये “चमत्कार” दिखाते हुए दिखाई देते हैं, तो कहीं ऐसा “दृश्य” रच देते हैं कि देखने वालों को समझ ही नहीं आता कि इसे संयोग कहा जाए, “सिस्टम” का कमाल कहा जाए ? इन दिनों दो अलग-अलग “गोल्डन” किस्से चर्चा में हैं ! एक “देवरिया” से जुड़ा हुआ और दूसरा “गोरखपुर” से !

गोल्ड का पहला काण्ड ! देवरिया का “गोल्डन बाबा”

सीएमओ कार्यालय में 15 लाख रुपये की ठगी के जिस मामले की चर्चा इन दिनों जोर-शोर से हो रही है, उसमें एक तथाकथित “गोल्डन बाबा” का नाम भी खूब उछल रहा है । बताया जाता है कि जब  “सीएमओ” साहब देवरिया जिले में पदस्थ थे, तब से यह “गोल्डन बाबा” उनके आगे-पीछे “परिक्रमा” करते अक्सर देखे जाते थे । देवरिया स्थित “सीएमओ” कार्यालय के बारे में ठीक ठाक जानकारी रखने वाले एक “स्थानीय” सूत्र का कहना है कि यह “बाबा” वहाँ भी बड़े आत्मविश्वास के साथ ऐसे काम अपने हाथ में ले लेते थे, जो सीधे साहब के स्तर पर जाकर “अटक” जाते थे । “गोल्डन बाबा” का अंदाज़ ऐसा रहता था मानो किसी फाइल के रुकने या चलने की “चाबी” उन्ही के पास हो ! किसी को किसी काम में दिक्कत आई नहीं कि “बाबा” प्रकट हुए और “समाधान” का रास्ता बताते हुए नजर आए ।

कहते हैं कि “गोल्डन बाबा” के “मायाजाल” का असर ऐसा था कि जब साहब “देवरिया” से गोरखपुर आए तो “बाबा” ने यहाँ भी अपनी “परिक्रमा” शुरू कर दी । प्रशासनिक गलियारों में उनकी उपस्थिति धीरे-धीरे इतनी सामान्य हो गई जैसे वे किसी “अदृश्य” पद पर नियुक्त हों । शायद यही कारण था कि “राजेश अस्पताल” के संचालक से हुई ठगी के मामले में भी इस “गोल्डन बाबा” ने कई बार “अस्पताल संचालक” को यह भरोसा दिलाया कि पूरा मामला “मैनेज” कराया जा सकता है । और उस “मैनेजमेंट” की कीमत बताई गई पूरे 15 लाख रुपये ! अब यह “मैनेजमेंट” किस स्तर पर होना था, किसके माध्यम से होना था और उसका वास्तविक स्वरूप क्या था यह तो जाँच का विषय है । लेकिन इतना जरूर है कि “गोल्डन बाबा” की कथित सक्रियता ने इस प्रकरण को और भी “रहस्यमय” बना दिया है । इस मामले में नया अपडेट यह भी है कि कथित “गोल्डन बाबा” सीएमओ से मिलने के लिए “गोरखपुर” पधारे भी थे और बताया गया कि उनसे मिले भी ! अस्पताल संचालक ने खूब “आवभगत” भी की और “तारामंडल” स्थित होटल में उनका “स्टे” अरेंजमेंट भी कराया.. लेकिन “बाबा” बिना कुछ कहे अचानक से “अंतर्ध्यान” हो गए ।

गोल्डन बाबा से अस्पताल संचालक की बातचीत सुनें !

गोल्ड का दूसरा काण्ड ! गोरखपुर का “गोल्डन साहनी”

इधर “गोरखपुर” में भी एक और “गोल्डन” चरित्र अपने कारनामे से चर्चा के केंद्र में आ गया । यह शख्स नशे में धुत्त होकर “फ्लाईओवर” पर अपनी “चारपहिया” गाड़ी ऐसे दौड़ा रहा था मानो सड़क नहीं, बल्कि कोई “सर्कस” का रेस ट्रैक हो ! “रफ्तार” का यह खेल इतना “खतरनाक” साबित हुआ कि “स्कूटी” सवारों को उसने ऐसी जोरदार टक्कर मारी कि दो लोग मौके पर ही काल के गाल में समा गए। कुछ ही क्षणों की “लापरवाही” ने दो परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी । “सोशल मीडिया” पर प्रसारित “पोस्टों” में यह भी दावा किया जा रहा है कि इस “गोल्डेन” साहनी की चारपहिया गाड़ी का अब तक 30 से ज्यादा बार “चालान” हो चुका है । मतलब ये शख्स आदतन “सर्कसबाज” रहा है । इसकी बेअंदाजी ऐसी कि जैसे “चालान” यह किसी “शौक” की तरह कटवाता रहा हो और कानून-व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित हो । कारण जो भी रहा हो लेकिन आखिरकार पुलिस ने इस “गोल्डन” को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया । लेकिन जेल जाते समय “गोल्डन” के चेहरे का जो “हाव भाव” सामने आया, उसने लोगों को और भी ज्यादा चौंका दिया !

गोल्डन चेहरे पर न तो “अपराध” का बोझ दिखाई दिया, और न किसी मासूम की “मौत” का पछतावा ! बल्कि “अंदाज़” कुछ ऐसा था मानो वह कोई “अपराध” करके नहीं, बल्कि कोई “ऐतिहासिक” क्रांति कर जेल जा रहा हो । हैरत की बात तो यह भी रही कि शक्ल-सूरत से “सख्त” और कठोर दिखने वाला यह शख्स पुलिस की “गिरफ्त” में आने के बाद भी “लंगड़ाता” हुआ नहीं, बल्कि अपने दोनों हाथ “जेब” में डालकर “कैटवॉक” करता हुआ दिखाई दिया । उसकी “चाल” और “चेहरे” के भाव यह संकेत देते नजर आए कि शायद उसे इस पूरी स्थिति का कोई खास “भय” ही नहीं है । अगर जिम्मेदार लोग सच में देख सकें तो देखें कि “असल” अपराधियों की पहचान अक्सर इसी तरह सामने आती है । न इनके “चेहरे” पर अपने “कर्मों” का कोई पछतावा दिखाई देता है, और न इनके “दिल” में “कानून” का डर ! क्योंकि किसी “कानून” से ज्यादा इन्हें भरोसा “सिस्टम” की उन गलियों में खुलते हुए तमाम “रास्तों” पर होता है जहाँ न्याय और कानून की “नीलामी” होती है । शायद यही कारण है कि कभी “गोल्डन बाबा” जैसे लोग “प्रशासनिक” गलियारों के “सूत्रधार” बनकर “चमत्कार” दिखाते नजर आ जाते हैं…तो कभी “गोल्डन साहनी” बनकर “सड़कों” पर “मौत” की रफ्तार बनकर दौड़ते हैं ।

By systemkasach

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