गोरखपुर : जो लोग “व्यवस्था” से थक-हारकर “मीडिया” के पास इसलिए पहुँचते थे कि उनकी आवाज़ को कोई “मंच” मिलेगा तो उनकी पीड़ा भी कहीं न कहीं गूँजेगी ! अब ऐसे लोगों को अब एक नई सलाह दी जानी चाहिए । आप “कुत्ता” पालिए, “गाय” पालिए “बकरी” पालिए…मन करे तो “साँप” भी पालिये मगर “गलतफहमी” मत पालिए ! क्योंकि “व्यवस्था” पर आरोप लगते हुए आपने कई बार देखा और सुना होगा लेकिन शायद यह पहला अवसर है जब एक “पीड़ित” “अखबारी” पत्रकारों की “नीयत” और “निष्पक्षता” पर “प्रश्नचिन्ह” लगाते हुए सीधे “एडीजी जोन” से शिकायत करने पहुँचा । इस प्रकरण ने एक और बात खोलकर रख दी है कि कुछ पत्रकारों के स्वार्थ और दबाव के कारण कुछ पुलिसकर्मी किसी भी घटना का सही फीडबैक अधिकारियों तक पहुँचने ही नहीं देते हैं । इनमे ज्यादातर वही लोग हैं जिनसे अधिकारी वर्ग किसी घटना या पीड़ित के मामले में सही फीडबैक प्राप्त होने की उम्मीद रखते हैं । बहरहाल, उक्त प्रकरण में आज अखबारों में छपी खबर ने “पत्रकारिता” के कालिखनुमा इतिहास में एक “काले धब्बे” की तरह दर्ज होकर अपना स्थान ग्रहण कर लिया है ।
कल का घटनाक्रम…
सीएमओ कार्यालय में “15 लाख” रुपये की ठगी के मामले में कल “विवेचक” ने “अस्पताल संचालक” को घटनास्थल यानी कि सीएमओ कार्यालय पर बुलाया । संचालक का कहना है कि जहाँ उसने पैसे दिए थे, उसी स्थान पर “सीसीटीवी” कैमरा लगा है । लेकिन जवाब मिला कि “कैमरा” खराब है । दिलचस्प बात यह है कि कुछ दिन पहले स्वयं सीएमओ साहब भी अपने बयान में यह स्वीकार कर चुके हैं कि वह “सीसीटीवी” खराब पड़ा है । उसका मतलब इत्तेफाक दर इत्तेफाक के बाद इस प्रकरण के साथ एक और नया इत्तेफाक जुड़ गया है ! मतलब 28 फवरी सीएमओ प्रांगण में 15 लाख की ठगी, फिर उसी दिन लाइसेंस निरस्त, फिर उसी दिन पीड़ित द्वारा बगैर कोई शिकायत किये ही सीएमओ द्वारा सायबर थाने में दी गयी तहरीर.. और अब जहाँ रुपये दिए गए वहाँ की “सीसीटीवी” खराब ! अब ये सारे “इत्तेफाक” हैं या किसी सुनियोजित “पटकथा” की प्री प्लानिंग का हिस्सा ?
और अब देखिए “अखबारी योद्धाओं” की करामात !
इस मामले में “दैनिक जागरण” और “हिंदुस्तान” अखबार ने लगभग एक जैसी खबर छापी है । प्रकाशित भ्रामक खबर, सत्यता के बिल्कुल विपरीत है। हो सकता है कि औरों ने भी ऐसी ही खबर छापी हो ! खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारी योद्धा का नाम तो नहीं पता है लेकिन प्रकाशित खबर कहती है कि “सीसीटीवी” फुटेज में कोई “संदिग्ध” नहीं दिखा बल्कि सिर्फ “अस्पताल संचालक” को आते-जाते देखा गया । यानी सीधा संदेश कि “अस्पताल संचालक” झूठ बोल रहा है । अब संदिग्ध तो इन अखबारियों को तभी दिखेगा जब इनके आँखों पर “मोतियाबिन्द” की तरह चिपका हुआ “मक्कारी” का पर्दा हटेगा । ऐसी खबर छापने से पहले अगर ये लोग किसी “गलीज गड्ढे” या “बजबजाते कुएँ” में डूब मरते तो शायद “पत्रकारिता” के शरीर पर बचा हुआ “अन्तःवस्त्र” उतरने से बच जाता । पत्रकारिता का शायद यही बजबजाता स्वरूप अस्पताल संचालक को समझ नहीं आया और वो दैनिक जागरण के कथित पत्रकार दुर्गेश त्रिपाठी की सलाह पर शिकायत लेकर एडीजी साहब के पास पहुँच गया । जब कप्तान साहब के संज्ञान में यह बात आई तो फौरन मुकदमा लिखने का आदेश दिया गया । सत्यता तक पहुँचने के लिए जो आवश्यक था उसके अनुसार तहरीर में संशोधन भी हुआ, लेकिन थाने पहुँचने पर संचालक से जब यह कहा गया कि सीएमओ आफिस के समस्त कर्मचारियों का नाम भी तहरीर से निकाल दिया जाए तो संचालक ने मना कर दिया । अब ऐसा लगता है कि यह मामला भी कोर्ट की दहलीज पर दस्तक देगा ।
दर्द पुराना है… नाम है “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” !
एक बार “रेडलाइट” एरिया में “पेशेवर” महिलाओं के जीवन पर “स्टोरी” शूट करते समय एक “वेश्या” की कही गयी बात आज भी मेरे “ज़हन” में “शूल” बनकर चुभती रहती है । उसने कहा था कि “हम “वेश्याएँ” पैसों के लिए शरीर का “धंधा” करती हैं, लेकिन फिर भी अपना “ज़मीर” बड़ी “साफगोई” से बचा ले जाती हैं ! “दुर्भाग्य” देखिए कि कुछ लोग “कलम” का “धंधा” करते-करते “ज़मीर” तक “गिरवी” रख देते हैं । यही कारण है कि दैनिक जागरण के कथित पत्रकार दुर्गेश त्रिपाठी ने संचालक से हुई बातचीत में इस ठगी की सारी सच्चाई खुद ही बयां कर दी । यहाँ तक कह डाला कि संचालक का “पैसा” जहाँ गया वो सबको पता है और “गोल्डन बाबा” के सीएमओ साहब के साथ रिश्ते भी सबको पता है । लेकिन छपेगा कुछ नहीं क्योंकि इन्हें “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” से पुरानी “खुन्नस” है । हो सकता है कि ये खुन्नस इसलिए हो कि पत्रकारिता की आड़ में किये जाने वाले न जाने इनके कितने अवैध “धंधों” पर इस “सिस्टम मीडिया” की वजह से लात पड़ी…और न जाने कितने “कर्मकांड” सबूतों सहित “एक्सपोज” हुए । इस बार फिर वही “दर्द” जाग उठा है । बातचीत लंबी है इसलिए बातचीत के मुख्य अंश ही इस रिकॉर्डिंग में शामिल किए गए हैं । सुनिए बड़े पत्रकार साहब का ऑडियो..
कथित पत्रकार दुर्गेश त्रिपाठी साहब द्वारा एक अन्य ऑडियो में यह भी कहा गया है कि सिस्टम वाले ने कई पत्रकारों के खिलाफ अदालत से कार्यवाही करा रखी है जिसका इन्हें बहुत “मलाल” है । तो आपके इन सभी ऑडियो के आधार पर क्या यह मान लिया जाए पत्रकार साहब, कि आप भी “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के खिलाफ हुई तमाम साजिशों में बराबर शरीक रहे हैं ? अस्पताल संचालक से फोन करके आप कहते हैं कि…“तुम सिस्टम वाले के पास गए हो, इसलिए सारी “मीडिया” तुमसे नाराज़ है ।” क्यों भाई ? क्या कभी “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” को आपने किसी के दरवाजे पर अपनी तरह “विज्ञापन” की भीख माँगते देखा है ? क्या कभी किसी “थाने-चौकी” में अपनी तरह “दलाली” करते देखा है ? क्या किसी “निर्दोष” के खिलाफ अपनी तरह फर्जी “खबर” चलाते देखा है ? क्या कभी कोई खबर बिना “दस्तावेज़” और “प्रमाण” के “प्रसारित” होते देखा है ? और क्या कभी फर्जी खबरों के जरिये “न्याय” का गला घोंटते देखा है ? फिर यह जलन क्यों ? आपकी हालत तो ऐसी लगती है जनाब, जैसे “सिस्टम” वाले ने आपके “खेत” पर चढ़ाई कर आपका घर-बार “हड़प” लिया हो । और आप होते कौन हो सभी “पत्रकारों” का ठेका लेने वाले ? आप जैसों को याद रखना चाहिए कि “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” कोई पत्रकारिता की “दुकान” नहीं बल्कि एक “संघर्ष” का नाम है । यहाँ किसी की भी रोजी रोटी किसी पत्रकारिता “कृपा” की “मोहताज” नहीं है । सिस्टम वाले के बारे में जाकर “गूगल” पर ढूँढ लो… “एआई” पर ढूँढ लो… मिल जाएगा । और इसी गूगल पर खुद नाम भी ढूँढो पत्रकार साहब…शायद आपके विषय में कोई “फेसबुक” या “इंस्टाग्राम” की प्रोफाइल ही मिल जाए ।
“थोड़ा देख लीजिएगा”आखिर क्या देख लें,CMO साहब ?
एक ऑडियो वायरल है जिसमे एक पत्रकार ने “सीएमओ साहब से इस पूरी घटना के बारे में पूछा तो साहब ने बड़े “इत्मीनान” से पूरी कहानी सिलसिलेवार सुना दी । घटना का हर पहलू बताया… हर मोड़ समझाया… और अंत में पत्रकार से कहा कि “थोड़ा देख लीजिएगा…” ! नीचे देखें वीडियो
अब सवाल यह है कि आखिर क्या देख लें, सीएमओ साहब ? घटना देखें ? सच देखें ? पीड़ित का लुटा पिटा परिवार देखें या फिर वह “एंगल” देखें जो खबर छापने के नाम पर “दलाली” के लिए जरूरी होता है ? अब जरा “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” से सीएमओ साहब की बातचीत भी सुन लीजिए ।
सिस्टम : “सर नमस्कार, मैं सत्येंद्र कुमार बोल रहा हूँ, सिस्टम वेबसाइट मीडिया से” ।
सीएमओ : “जी बोलिए” !
सिस्टम :“सर उस घटना के विषय में कुछ…”
सीएमओ : (बीच में ही बात काटते हुए) “उस घटना के संबंध में कुछ नहीं कहना है”! और… फोन कट
अरे साहब, “सिस्टम” ने तो अभी यह भी नहीं बताया था कि वह कौन-सी घटना के बारे में पूछना चाहता है । हम तो बस आपसे “संचारी रोग नियंत्रण” अभियान के सम्बंध में जानना चाहते थे लेकिन आप तो पहले ही सब कुछ समझ गए । इसलिए अब हम भी समझ गए कि आप सचमुच “अंतर्यामी” हैं । तभी तो 28 फरवरी को भी आपने सब कुछ बिना बताए ही जान लिया था । उसी दिन अस्पताल संचालक से “सीएमओ” कार्यालय के प्रांगण में 15 लाख की ठगी भी हो गयी.. अस्पताल संचालक का उसी दिन लाइसेंस “निरस्त” कर दिया गया और उसी दिन “संचालक” के कुछ बताए बगैर ही आपने “ठगी” की तहरीर भी “साइबर थाने” में भी दे दी । और उस दिन रुपयों की ठगी भी सीएमओ प्रांगण में उसी जगह हुई जहाँ का “सीसीटीवी” खराब था । वाह साहब ! इतनी “दूरदर्शिता” तो शायद “ज्योतिषियों” में भी नहीं होती । अब सवाल सिर्फ इतना है कि जब “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” सवाल पूछता है तो फोन क्यों कट जाता है…और जब बाकी लोग पूछते हैं तो “थोड़ा देख लीजिएगा” क्यों कहा जाता है ?
