गोरखपुर : सिकरीगंज स्थित राजेश हाईटेक हॉस्पिटल में सर्जरी के बाद 9 मरीजों की आंखों की रोशनी जाने के मामले में अब एक नया मोड़ सामने आया है । अब तक इस पूरे प्रकरण में कार्रवाई का केंद्र केवल अस्पताल संचालक को बनाया गया था, जबकि सर्जरी करने वाले डॉक्टर पराग अग्रवाल के खिलाफ कोई प्रभावी और प्रत्यक्ष जाँच सामने नहीं आई थी । इसी बीच “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” ने इस पूरे मामले में उपलब्ध तथ्यों और जाँच प्रक्रिया की विसंगतियों पर सवाल उठाते हुए खबर प्रकाशित की थी । खबर में यह प्रमुख प्रश्न उठाया गया था कि जब सर्जरी किसी डॉक्टर द्वारा की गई, तो फिर जाँच और जवाबदेही का दायरा केवल एक नॉन मेडिको अस्पताल संचालक तक सीमित क्यों रखा गया?
कौंसिल ने डॉ पराग अग्रवाल को किया तलब..
प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार अब इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है । मामला सार्वजनिक रूप से चर्चा में आने और सवाल उठने के बाद सीएमओ गोरखपुर की ओर से राजधानी स्थित यूपी मेडिकल कौंसिल को पत्र भेजा गया । इसके बाद मेडिकल काउंसिल ने सर्जरी करने वाले डॉक्टर डॉ. पराग अग्रवाल को तलब कर लिया है । देखें पत्र…
नोटिस पर संचालक ने उठाये सवाल… सीएमओ को भी तलब करने की माँग !
हालांकि काउंसिल ने अस्पताल संचालक को भी दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने के लिए कहा है । इस पर अस्पताल संचालक ने कड़ा रुख अपनाते हुए यूपी मेडिकल कौंसिल को पत्र भेजकर यह सवाल उठाया है कि काउंसिल का अधिकार क्षेत्र मुख्यतः पंजीकृत चिकित्सकों तक सीमित है, ऐसे में एक नॉन-मेडिको अस्पताल संचालक को सीधे तलब करने का आदेश किस विधिक प्रावधान के तहत दिया गया है ? अस्पताल संचालक ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि जब काउंसिल ने इस मामले में संज्ञान सीएमओ गोरखपुर के पत्र के आधार पर लिया है, तो अस्पताल से संबंधित सभी प्रशासनिक अभिलेख काउंसिल सीधे सीएमओ कार्यालय से भी प्राप्त कर सकती है । साथ ही यह भी लिखा है कि पूरे प्रकरण में प्रार्थी द्वारा सीएमओ गोरखपुर पर प्रत्यक्ष आरोप लगाए गए हैं जिसमे जाँच लंबित है । इस स्थिति में सीएमओ गोरखपुर को भी तलब करने का निवेदन किया गया है ।
पुलिस गुडवर्क की ओर–कैमरे फुटेज भी सामने आए…
15 लाख रुपये ठगी प्रकरण में अब कुछ कैमरों के फुटेज भी सामने आ रहे हैं । कुछ दिन पूर्व CMO द्वारा एक पत्रकार से बातचीत में यह कहा गया था कि जिस स्थान से संबंधित घटनाक्रम बताया जा रहा है, वहाँ के कुछ सीसीटीवी कैमरे खराब थे । इस बयान के बाद कई अखबारों में भी कुछ कैमरों के खराब होने को लेकर खबरें प्रकाशित हुई थीं । लेकिन इसी बीच जांच के दौरान पुलिस ने आसपास लगे अन्य सीसीटीवी कैमरों की तलाश शुरू की । ऐसी ही एक फुटेज में 28 फरवरी की तिथि पर अस्पताल संचालक को एक झोला हाथ में लिए इधर-उधर टहलते हुए देखा गया है । अब यह फुटेज भी पूरे घटनाक्रम में एक नई परत जोड़ती दिखाई दे रही है । सवाल यह भी उठ रहा है कि जब कुछ कैमरों को खराब बताया गया था, तब आसपास लगे अन्य कैमरों में दर्ज यह गतिविधि आखिर जांच को अब किस दिशा में ले जाएगी ? नीचे दी गयी तस्वीर घटना के दिन 28 फरवरी की सीसीटीवी फुटेज का वो स्क्रीनशॉट है, जिसे पुलिस ने पहचान की पुष्टि के लिए अस्पताल संचालक को भेजा था । संचालक ने स्वयं को इस फुटेज में पहचानने की पुष्टि की है।

अभी और बढ़ सकता है जाँच का दायरा…!
इस प्रकार अब यह प्रकरण तीन स्तरों पर चर्चा में है ! एक तरफ मरीजों की आंखों की रोशनी जाने की गंभीर घटना की वास्तविक जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न, दूसरी तरफ जाँच प्रक्रिया तथा अधिकार क्षेत्र को लेकर उठे कानूनी सवाल और तीसरी तरफ इस प्रकरण में 15 लाख की ठगी का घटनाक्रम ! अब देखना यह होगा कि यूपी मेडिकल कौंसिल की कार्यवाही इस मामले में किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या सर्जरी करने वाले डॉक्टर की भूमिका की भी उतनी ही गंभीरता से जांच होती है, जितनी अब तक अस्पताल संचालक के संदर्भ में दिखाई गई थी । इस पूरे प्रकरण में एक बात स्पष्ट हो गई है कि यदि तथ्यों के साथ सवाल उठाए जाएँ तो कई बार दबे हुए मुद्दे भी जाँच के दायरे में आ ही जाते हैं और यही पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी माना जाता है ! सही है कि नहीं त्रिपाठी जी ?

