गोरखपुर : पत्रकारों का सड़क पर इज़हार-ए-मोहब्बत का दिन… प्रेम का दिन… गुलाब, चॉकलेट और “आई लव यू” का दिन था 14 मार्च 2026 ! उस दिन “गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के कुछ “महानुभावों” ने प्रेम की परंपरा को बिल्कुल नया “आयाम” दे दिया । नज़ारा कुछ ऐसा था कि “पत्रकार बंधु” सड़क पर एक-दूसरे की माँ-बहन को “सम्मान” दे रहे थे । हाथों में कलम की जगह चप्पलें थीं…और ज़ुबान पर “ पत्रकारिता के सवालों की जगह “माधर-बिरादर” का “वैश्विक शब्दकोश” खुला हुआ था ।
प्रेस क्लब से प्रेस कॉन्फ्रेंस तक और सड़क से तमाशे तक ?
सूत्रों और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार, यह “विहंगम प्रेमपूर्ण” दृश्य उस समय सामने आया जब सीओ कैंट की “प्रेस कॉन्फ्रेंस” खत्म हुई । प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जो होना था वह पत्रकारिता का “संवाद” नहीं था बल्कि पत्रकारिता के “सड़” चुके “घाव” से रिसता हुआ “मवाद” था । सड़क पर “तमाशा” बना और जनता बानी “तमाशबीन” ! आखिरकार कुछ पुलिसकर्मियों ने बीच-बचाव कर इस “पत्रकारीय प्रेम प्रसंग” को शांत कराया ।
क्या था मामला ?
आरोप है कि मोतीराम अड्डा स्थित “खुशी” हॉस्पिटल, जो पहले से सील हो चुका था, उसके संचालक “लोलारक ठाकुर” से अस्पताल खुलवाने के नाम पर “एक लाख दस हजार” रुपये पत्रकार “धर्मेंद्र पटवा” और “निखिल गुप्ता” ने ले लिए । समय बीता… एक-दो महीने नहीं बल्कि डेढ़ साल बीत गए । लेकिन न तो अस्पताल खुला और न ही रुपये वापस हुए । थक-हार कर अस्पताल संचालक ने अपने गाँव के परिचित पत्रकार “हरेन्द्र दुबे” को यह बात बताई । इसके बाद 14 फरवरी को सीओ की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद हरेन्द्र दुबे ने पत्रकार “निखिल” से रुपये वापस करने की बात कही । बात शुरू हुई थी रुपये से लेकिन धीरे-धीरे मामला “चप्पल” से लेकर “माधर-फादर” तक होता हुआ “बिरादर” तक पहुँच गया । इसी बीच “फटे में टांग” घुसेड़ने की “हसरत” पाले पत्रकार “फैय्याज अहमद” मैदान में उतर गया और “निखिल” का पक्ष लेने लगा । फिर क्या था… मामले ने तूल पकड़ा और “बहसबाजी” पत्रकारिता का “चोला” उतारकर “सड़कछाप अखाड़े” में तब्दील हो गयी । नीचे अस्पताल संचालक की बातचीत सुनें !
कहानी में ट्विस्ट !
हरेन्द्र दुबे का आरोप है कि जो रुपये लिए गए थे, वे सिर्फ एक जेब में नहीं रहे बल्कि कुछ “पत्रकार” मित्रों के बीच भी बाँटे गए । यही कारण बताया जा रहा है कि सब कुछ जानते हुए भी “फैय्याज अहमद” आरोपी “निखिल” के “पक्ष” में खड़ा हो गया । लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…असली ट्विस्ट तो इसके बाद आया । जबरदस्त चर्चा है कि इस पूरे विवाद में अब तक पत्रकार “अजीत” की कोई भूमिका सामने नहीं थी । लेकिन फिर भी “प्रेस क्लब” में पत्रकार “हरेन्द्र दुबे” के खिलाफ शिकायत पत्रकार “अजीत” के नाम से ही दी गई, और “गवाह” के रूप में उस शिकायती पत्र पर पत्रकार “फैय्याज अहमद” और “संतोष” ने हस्ताक्षर किये । पत्रकार अजीत के नाम से दिया गया देखें पत्र
मंत्री जी की त्वरित सक्रियता !
कहा जाता है कि “प्रेस क्लब” के मंत्री जी ने भी शिकायत का तुरंत संज्ञान लेते हुए पत्रकार “हरेन्द्र दुबे” से “स्पष्टीकरण” मांग लिया । लेकिन इस बार कहानी उलटी पड़ गई क्योंकि पत्रकार हरेन्द्र दुबे ने भी जवाब में पूरा मामला खोलते हुए “अवैध” वसूली की सारी “परतें” सामने खोल कर रख दीं । यह बात और है कि जिस पत्र के आधार पर “विवाद” उठा, उस पत्र पर हरेन्द्र दुबे के हस्ताक्षर नहीं हैं लेकिन उन्होंने “बयान” में उसे अपना बताते हुए यह कहा कि जल्दबाजी में “हस्ताक्षर” छूट गए । देखें पत्रकार हरेन्द्र का पत्र !
इस मामले में जिस पत्रकार “निखिल गुप्ता” पर अस्पताल संचालक से “1 लाख 10 हजार” की वसूली का आरोप लगा है उसने भी अपनी शिकायत “प्रेस क्लब” में दी है । पत्रकार निखिल गुप्ता का पत्र देखें !
सवाल… जो असहज करते हैं !
अब सवाल सिर्फ इस “झगड़े” का नहीं है बल्कि सवाल “शराफत का चोला” ओढ़े कुछ पत्रकारों के उस “विद्रूप चेहरे” का है जो सीएमओ कार्यालय में “15 लाख” की ठगी पर अपनी छाती पीटते हैं….”एम्बुलेंस गैंग” और “अवैध अस्पताल” के नाम पर “विधवा विलाप” करते हैं…और किसी “सिपाही” के हाथ में “100” रुपये का नोट दिख जाए तो उसके “चरित्र” का “पोस्टमार्टम” कर देते हैं । अब इस तरह के चंद पत्रकारों का अपना खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना दिख रहा है, यह इस घटना ने “आईने” की तरह सामने रख दिया । सवाल यह भी है कि क्या यही वह “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” है जिसने कभी वरिष्ठ पत्रकारों के “आदर्शों” और गरिमा से अपनी “पहचान” बनाई थी ? क्या प्रेस क्लब में दी गई शिकायत का संज्ञान लेने से पहले “मंत्री जी” को शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर का मिलान नहीं करना चाहिए था ? क्या प्रेस क्लब में कुछ लोग सिर्फ फर्जीवाड़े का “जाल” बुनने के लिए ही बैठे हैं ? और क्या इस बात की जानकारी जिम्मेदारों को नहीं है कि फर्जी “वेबसाइट” बनाकर “फर्जी” खबर चलाने के मामले में “फैय्याज” पहले से ही “अदालत” के “कठघरे” में खड़ा हैं । “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के पास तो वह कॉल रिकॉर्डिंग भी मौजूद है जो यह बताती है कि “दरगाही पत्रकारों” के साथ मिलकर “प्रेस क्लब” का कौन सा पदाधिकारी “नई कार्यकारिणी” को एक बार फिर “पाक दरगाह” के उस “नापाक” शख्सियत के “हरम” में ले जाना चाहता था…जिसके “दामन” पर “देश विरोधी” गतिविधियों और “हनी ट्रैप” गैंग जैसे “बदनुमा” दागों के “पुख्ता” सबूत मौजूद हैं । सवाल तो बस, प्रेस क्लब की “पत्रकारिता” की उस “साख” का है जिसे बनाने में तो “दशकों” लगे लेकिन इसे “गिराने” में कुछ लोगों को सिर्फ कुछ दिन ही लगेंगे ।

