गोरखपुर : सिकरीगंज स्थित “न्यू राजेश हाईटेक हॉस्पिटल” से जुड़ा वह “बहुचर्चित” और “सनसनीखेज” प्रकरण, जिसे स्थानीय “अखबारी तंत्र” ने भ्रमजाल के तहत “अर्धसत्य” के साथ परोसा था…अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने CMO द्वारा अस्पताल के खिलाफ जारी सभी “आदेशों” को रद्द करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि “कानून” की कसौटी पर खरे उतरे बिना कोई “प्रशासनिक” कार्रवाई टिक नहीं सकती । मतलब सीधा सा है कि CMO साहब ने जिस अस्पताल का “लाइसेंस” निरस्त करने का “फरमान” जारी किया था वो आदेश अब कूड़े में “तब्दील” हो गया है । हाईकोर्ट ने अपने निर्णय और कलमरूपी हथियार से CMO कार्यालय की “पक्षपाती व्यवस्था” के साथ ही “पीत पत्रकारिता” की दोनो “टाँगों” में भी गोली मार दी है । ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो “अर्धसत्य” महीनों तक अखबारों की सुर्खियों में था, वह सच था या कोई सुनियोजित स्क्रिप्ट ?
क्या थी पूरी घटना : ऑपरेशन, संक्रमण और सवालों का सिलसिला !
फरवरी 2026 में “न्यू राजेश हाईटेक हॉस्पिटल” में 30 मरीजों की आँखों का “ऑपरेशन” किया गया । इनमें से 18 मरीजों में संक्रमण पाया गया और करीब 9 मरीजों की दृष्टि प्रभावित होने की बात सामने आई । घटना गंभीर थी, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन असली विवाद तब शुरू हुआ जब “सीएमओ” और जाँच टीम की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे । CMO गोरखपुर द्वारा की गई जाँच को एकतरफा और “तथ्यहीन” बताते हुए कई विधिक प्रश्न खड़े हुए । अस्पताल का “लाइसेंस” रद्द करने जैसे कठोर फैसले पर भी “कानूनी विशेषज्ञों” ने आपत्ति जताई । इसी बीच यह भी चर्चा में रहा कि कुछ “अखबारी संस्थानों” ने खबरों में सच्चाई और तथ्य प्रस्तुत करने के बजाय “प्रायोजित नैरेटिव” को इस तरह प्राथमिकता दी…जैसे पहले फैसला तय हो चुका था…और खबरें सिर्फ उसे “जायज़” ठहराने के लिए छापी जा रही थी ।
जब ‘सिस्टम’ सक्रिय हुआ : तकनीकी जाँच से बदला पूरा खेल
मामले को जब “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के संज्ञान में लाया गया तो इसे सिर्फ एक “खबर” की तरह नहीं बल्कि “तकनीकी” और “विधिक दृष्टिकोण” से परखा गया । जाँच रिपोर्ट और प्रशासनिक आदेशों के बीच मौजूद “विरोधाभासों” को उजागर किया गया । इसके बाद “अस्पताल संचालक” को लीगल सेल के जरिये हाईकोर्ट में “निःशुल्क” कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई । परिणाम यह रहा कि हाईकोर्ट ने CMO के सभी “आदेशों” को रद्द कर दिया और यह भी निर्देश दिया कि इस प्रकरण की सभी जाँच रिपोर्ट की प्रतियां “अस्पताल संचालक” को भी उपलब्ध कराई जाएं । कह सकते हैं कि जो झूठ “फाइलों” में दबा था, वही “झूठ” कोर्ट पहुँचते ही चीखकर “सच” बोल उठा ।
मेडिकल काउंसिल की एंट्री: अब जिम्मेदारी तय होने की बारी
“सिस्टम वेबसाइट मीडिया” द्वारा जाँच प्रक्रिया पर उठाये गए सवालों के बाद “यूपी मेडिकल काउंसिल” भी सक्रिय हो गया । इस मामले में ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर पराग अग्रवाल, जो अब तक “जाँच की आँच” से दूर थे, उन्हें भी “काउंसिल” द्वारा तलब कर लिया गया । अस्पताल संचालक “राजेश राय” को भी तलब किया गया था, लेकिन काउंसिल के नोटिस को “क्षेत्राधिकार” और विधिक आधार पर “चुनौती” दी गई, जिसके बाद “अस्पताल संचालक” के खिलाफ कार्रवाई फिलहाल “ठंडे बस्ते” में चली गई है ।
कॉल रिकॉर्डिंग से खुली परतें: ‘दक्षिण द्वार’ की व्याख्या !
कुछ दिन पहले “दैनिक जागरण” गोरखपुर के पत्रकार “दुर्गेश त्रिपाठी” की “कॉल रिकॉर्डिंग” जब “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” पर प्रसारित हुई, तो इस “प्रकरण” का एक नया पहलू सामने आया । रिकॉर्डिंग में “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” को पत्रकार साहब ने ‘दक्षिण दिशा’ बताते हुए “अशुभ” कहा और अस्पताल संचालक से यह भी कह दिया कि “सिस्टम” से मदद मांगने के कारण “कुछ पत्रकार लोग” आपसे नाराज हैं । त्रिपाठी जी की बात सही निकली क्योंकि “सिस्टम” वास्तव में “दक्षिण द्वार” है, लेकिन सिर्फ उनके लिए जो “चोर” के साथ “सीनाज़ोर” भी हैं । इसलिए सिकरीगंज प्रकरण में “प्रायोजित खबर” छापने वालों को अब यही करना चाहिए कि… उनके “अखबारी दफ्तर” से लेकर “CMO कार्यालय” के बीच में जहाँ कहीं भी “चुल्लू” भर पानी मिले….उसमें आँख मूँदकर “छलाँग” लगा दें ! क्योंकि “मोक्ष” पाने का इससे बेहतर “अवसर” फिर नहीं मिलेगा !
न्याय की ओर एक कदम, लेकिन कहानी अभी अधूरी !
यह कहना गलत नहीं होगा कि इस पूरे प्रकरण में “अखबारी तंत्र” और “सीएमओ कार्यालय तंत्र” की संभावित मिलीभगत की आशंकाएं लगातार कई तरह से सामने आती रहीं । “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” ने इन सभी पहलुओं को देखते हुए तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया, जिससे “अस्पताल संचालक” को न्याय की दिशा में राहत मिली । हालांकि, न्याय की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है क्योंकि करीब “15 लाख” रुपये की कथित ठगी से जुड़े पहलुओं पर अभी भी कार्रवाई बाकी है ।

