सिकरीगंज कांड : पहले बदनाम, अब हाईकोर्ट के आदेश पर अखबारों की खामोशी ! क्या कानूनी कार्यवाही की पटकथा हो रही तैयार ?

गोरखपुर : सिकरीगंज स्थित “न्यू राजेश हाईटेक हॉस्पिटल” प्रकरण अब एक नए और बेहद “संवेदनशील” मोड़ पर पहुँचता दिख रहा है । ताज़ा जानकारी के अनुसार अस्पताल संचालक द्वारा दैनिक जागरण, हिंदुस्तान और अमर उजाला समेत अनेक मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया पत्रकारों को “व्हाट्सएप्प” के माध्यम से एक “निवेदन” भेजा गया है । इस निवेदन का सीधा आशय है कि “मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद” द्वारा अस्पताल के लाइसेंस निरस्तीकरण पर लगाई गई रोक की खबर को भी उसी प्रमुखता से प्रकाशित और प्रसारित किया जाए, जिस तरह अस्पताल के खिलाफ पहले “नकारात्मक” खबरों को उछाला गया था । लेकिन सवाल यहीं से खड़ा होता है कि क्या यह सिर्फ एक “निवेदन” है, या फिर आने वाली “कानूनी जंग” की ठोस “रणनीति” ?

निवेदन के पीछे छिपा कानूनी खेल…

कानूनी नजरिए से देखें तो यह साधारण “अनुरोध” नहीं है, बल्कि एक संभावित “डॉक्यूमेंटेशन” है जो आगे चलकर “मीडिया” के खिलाफ मानहानि, दुष्प्रचार और पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के मामलों में “साक्ष्य” बन सकता है । बगैर किसी साक्ष्य के “नकारात्मक” खबरों का लगातार प्रकाशन और प्रसारण करने वाला मीडिया यदि “हाइकोर्ट” इस आदेश को “नजरअंदाज” करता है….तो यह साबित करना आसान होगा कि पहले चलाई गई खबरें “एकतरफा” थीं और जानबूझकर संस्थान की “छवि” खराब करने के लिए प्रसारित और प्रकाशित की गई । नीचे देखें हाइकोर्ट का आदेश !

Highcourt order PDF

मीडिया ट्रायल या सुनियोजित अभियान ?

इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि बिना ठोस “साक्ष्यों” के कई प्रमुख अखबारों और तथा कथित “फेसबुकिया पत्रकारों” ने लगातार कई दिनों तक खबरों का ऐसा “सिलसिला चलाया” जिसमें हर दिन जानबूझकर नए नए “एंगल” गढ़े गए । इन “नकारात्मक” खबरों को देखकर पत्रकारिता की आत्मा “लालटेन” में हिलती हुई “बत्ती” से भी दोगुनी रफ्तार से “काँप” गयी । जाँच चल रही थी, लेकिन “निष्कर्ष” पहले ही सुना दिया गया और अस्पताल संचालक को “कलप्रिट” घोषित कर दिया गया ! लेकिन “ऑपरेशन” करने वाले डॉक्टर पराग अग्रवाल पर सवाल उठाने में पत्रकारिता ने अजीब सी “खामोशी” ओढ़ ली । अखबारों की यह “चयनात्मक आक्रामकता” अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है । अब इस मामले में “अखबारी पत्रकारिता” की हालत 90 की “दशक” में आई फ़िल्म “रुदाली” की तरह हो चली है । वो “फफक”-“फफक” कर रो रही है और यही कारण है कि रोती हुई कलम की आवाज “भाड़े” पर रोने वाली “पेशेवर रुदालियों” की बिलखती हुई आवाज से भी कई गुना अधिक “भारी” लग रही है ।

संचालक का सीधा आरोप : साजिश के तहत किया गया चरित्र हनन..

अस्पताल संचालक ने साफ आरोप लगाया है कि….

“एक सुनियोजित साजिश के तहत मेरे संस्थान को निशाना बनाया गया, ताकि लाइसेंस रद्द कराकर हमें पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए ।”

यह आरोप इसलिए भी वजनदार लगने लगा है क्योंकि यदि इस
मामले में मीडिया “निष्पक्ष” होता, तो “हाईकोर्ट” के आदेश को भी उतनी ही “प्रमुखता” से छापा जाता… जितना प्रकरण के “घटित” होने के बाद एक नैरेटिव को “छापा” जा रहा था ।

रिकॉर्डिंग ने खोली ‘पत्रकारिता’ की दूषित मंशा !

इस मामले को और “गंभीर” बना देती है “दैनिक जागरण” गोरखपुर के पत्रकार “दुर्गेश त्रिपाठी” की एक कॉल रिकॉर्डिंग ! जिसमें उन्हें अस्पताल संचालक से कहते हुए सुना गया कि….

“सारे पत्रकार आपसे नाराज़ है” !

यह कथन अपने आप में “संकेत” देता है कि खबरें “तथ्यों” के आधार पर नहीं, बल्कि “भावनात्मक या व्यक्तिगत रुख” के साथ “साजिशों” के साये में चलाई जा रही थीं । इसके इतर यह भी “संकेत” मिले हैं कि “हिंदुस्तान के मिश्रा जी” और “दैनिक के द्विवेदी” जी के “रक्त सम्बन्धियों पर स्वास्थ्य विभाग की ऐसी “कृपा” बरसी कि उन्हें “ब्लड बैंक” से लेकर “100 वार्ड वाले सरकारी अस्पताल” में नौकरी मिल गयी ।

15 लाख की ठगी : अब कोर्ट तक पहुँचा मामला !

इस पूरे विवाद के बीच एक और “विस्फोटक दावा सामने आया है कि “सीएमओ कार्यालय” गोरखपुर परिसर में अस्पताल का “लाइसेंस” निरस्त नहीं करने के एवज में “15 लाख” रुपये ठगे जाने का मामला भी अब “न्यायालय” की चौखट तक पहुँच चुका है । हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मामला किस “अदालत” की किस “बेंच में दाखिल हुआ और स्वास्थ्य महकमे के किन-किन अधिकारियों/व्यक्तियों को इसमें “नामजद” किया गया है । यदि ऐसा होता है, तो यह केवल एक “अस्पताल” का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे “स्वास्थ्य तंत्र” और “प्रशासनिक व्यवस्था” पर बड़ा सवाल बन जाएगा ।

सबसे बड़ा सवाल : क्या मीडिया खुद कटघरे में खड़ा होगा ?

अब हालात तेजी से बदल रहे हैं और “हाईकोर्ट” का आदेश आ चुका है । अस्पताल संचालक ने आधिकारिक रूप से “मीडिया” को सूचना दे दी है और ऐसा लगता है जैसे “संभावित” कानूनी कार्रवाई की “जमीन” तैयार हो रही है । ऐसे में यदि “अखबारी पत्रकार” अब भी चुप रहते हैं, तो यह “चुप्पी” ही उनके खिलाफ सबसे बड़ा “सबूत” बन सकती है । सिकरीगंज का यह मामला अब सिर्फ एक “अस्पताल” का विवाद नहीं रह गया है बल्कि यह मीडिया की “विश्वसनीयता” “प्रशासनिक पारदर्शिता” और “न्यायिक हस्तक्षेप” तीनों की “परीक्षा” बन चुका है ।

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

Related Post