गोरखपुर : गोरखपुर का आनंदलोक हॉस्पिटल… और डॉक्टर आनंद कुमार अग्रवाल ! एक मरीज के गॉल ब्लैडर की सर्जरी… और कुछ ही घंटों बाद मरीज की मौत ! फिर वही हल्ला…गॉज स्पंज शरीर में छोड़ दिया गया, घोर लापरवाही !मुकदमा दर्ज… और फिर चिकित्सीय ज्ञान से लबालब भरी मीडिया की प्रेस कॉन्फ्रेंस ! अस्पताल में हुई हर मौत के बाद का यह घटनाक्रम कोई नई कहानी नहीं है बस घटना के किरदार और स्थान बदलते रहते हैं ।
डॉक्टर आनंद अग्रवाल साहब कोई साधारण डॉक्टर नहीं हैं बल्कि 1995 से फैमिली आधारित मेडिकल सेटअप (आनंदलोक हॉस्पिटल) चला रहे हैं । जो मरीज “आनंद” वाले “लोक” की तलाश में यहाँ आते हैं, उन्हें आनंद की भरपूरी प्राप्त होने के जबरदस्त “आसार” नजर आते हैं । डॉक्टर साहब अनुभवी हैं…और यह भी बखूबी जानते हैं कि मरीज की मौत के बाद “चांव-चांव” मचाने वाली “माइकधारी अर्धज्ञानी” भीड़ से कैसे निपटना है । सो, “प्रेस कॉन्फ्रेंस” बुला ली गई ।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर साहब अपना पूरा मेडिकल ज्ञान उड़ेल रहे हैं जैसे हेपेटाइटिस, इंट्रा-हेपेटिक जीबी, गॉल ब्लैडर…और उधर माइक थामे लोग गॉल ब्लैडर छोड़, अपना गाल बजाने में व्यस्त हैं । सवाल वही…लापरवाही से मौत ? स्पंज क्यों मिला ? एफआईआर क्यों हुई ? पोस्टमार्टम में स्पंज क्यों निकला ? घंटा कैसे बजा, घड़ियाल कैसे जागा ?
डॉक्टर साहब समझा रहे हैं…डिस्मिया, पोस्ट-ट्रॉमेटिक कंडीशन, कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट…और माइकधारी जीव उसी जगह अटके हैं…फिर एफआईआर क्यों हुई ? डॉक्टर साहब थक कर कह रहे हैं कि “स्पंज छोड़ा नहीं गया था, ब्लीडिंग रोकने के लिए 24 घंटे के लिए रखा गया था ।” लेकिन माइकधारी “हुतात्माओं” को तो बस एक ही राग अलापना है कि “गलती हुई, इसलिए मुकदमा दर्ज हुआ !” डॉक्टर साहब एब्डोमेन (पेट) समझा रहे हैं उन पत्रकारी हुतात्माओं को…जो अपना पेट पालने के लिए कब का चमगादड़ बन चुके हैं ।
फिर एक पत्रकार सवाल करता है कि डॉक्टर साहब “आप अक्सर विवाद में रहते हैं ? और डॉक्टर साहब तपाक से जवाब देते हैं कि
“जो सही काम करता है, उसका विवाद तो होता ही है !” अरे डॉक्टर साहब… ये क्या किया आपने ? इतनी भीषण गर्मी में भी ऐसे भीगो-भीगो कर मारते हैं क्या ? कम से कम प्रहार करने से पहले सुखा तो लेते !
अरे पत्रकारिता के हुतात्माओं…आखिर एफआईआर से क्या उखड़ जाएगा डॉक्टर साहब का ? तुम लोगों ने शायद सुना ही नहीं कि, डॉक्टर साहब ने साफ कहा कि “बिना लापरवाही, बेस्ट मोटिव के साथ बेस्ट वर्क किया गया और जो हुआ… वो दुर्भाग्यपूर्ण है ।” बस, डॉक्टर साहब का इतना कह देना ही काफी है । क्योंकि हमारा अंधा कानून कहता है कि “सद्भावना से किए गए कार्य के दुष्परिणाम के लिए डॉक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता” और रही बात मुकदमे की…तो ये भी समझ लो पत्रकारिता के हुतात्माओं, कि पुलिस इस मुकदमे में बिना मेडिकल पैनल की रिपोर्ट के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती । और मेडिकल पैनल…? उसमें भी डॉक्टर ही होते हैं । उन्हें अच्छे से पता होता है कि “बकवास कानूनों” से अपने “पेशे” को कैसे सुरक्षित रखना है । घबराइए मत डॉक्टर साहब ! वैसे भी आप एक बेहतरीन मर्चेंडाइज़र हैं । ये पत्रकारिता की हुतात्माएं आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी । ये तो यह भी नहीं जानते कि आप पर FIR सिर्फ इसलिए हुई ताकि हो-हल्ला शांत किया जा सके ।
आप बेखौफ होकर अपना काम कीजिए डॉक्टर साहब ! कम से कम पाँच हजार की खून जाँच लिखा करिये ताकि 75% तक का शुद्ध लाभांश कायम रहे । तीन हजार से कम की दवा पर्चे पर लिखना आपकी तौहीन है । लिखेंगे तो दो हजार का “मार्जिन” कैसे निकलेगा ? लोगों को कहने दीजिए कि “डॉक्टर चोर हैं !” अरे, जब इस देश में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च करोड़ों में पहुंच चुका है, तो डॉक्टरों से इंसानियत की उम्मीद रखने वाले मूर्ख नहीं तो और क्या हैं ? उन्हें क्या पता कि इस देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में फार्मा कंपनियों का कितना बड़ा योगदान है ! इसलिए 2 रुपये की दवा 200 में बेचिए… और बेधड़क बेचिए ! आप तो फिर भी शरीफ हैं डॉक्टर साहब…क्योंकि आप औरों की तरह “किडनियां” तो नहीं बेचते !

