शपथ ग्रहण समारोह : राय साहब की ‘मिसाल’ और जमीनी हकीकत बयाँ करता गोरखपुर प्रेस क्लब का सच !

गोरखपुर : अभी दो दिन पहले गोरखपुर में “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन हुआ । इस समारोह में “सीएम साहब” का आगमन हुआ इसलिए यह अवसर गरिमा और परंपरा का “प्रतीक” था । लेकिन पहली बार ऐसा लगा कि “कलमकारों” के बीच ही एक दबा हुआ “असंतोष” भी मौजूद था जिससे “सीएम साहब” को जानबूझकर “अंजान” रखा गया । इस असंतोष की वजह चयनकर्ताओं के कथित “पक्षपातपूर्ण” रवैये को माना जा रहा है ।

इसी बीच वरिष्ठ पत्रकार “राय साहब” ने सोशल मीडिया पर शपथ ग्रहण समारोह को “मीडिया जगत के लिए एक नायाब उदाहरण” बता दिया । राय साहब अपनी “स्पष्टवादिता” के लिए जाने जाते हैं, इसलिए उनका यह “कथन” थोड़ा ठहर कर सोचने पर मजबूर करता है । क्योंकि जब वास्तविकता कहीं और खड़ी हो और प्रशंसा कहीं और बह रही हो, तो “स्पष्टवादिता” विराम चिन्ह बनकर रह जाती है । अब यदि “जय-जयकार का सारा गन्ना” आप ही पेर देंगे “राय साहब” तो “पूर्वांचल” की बाकी चीनी मिले क्या “भजन” गाएंगी ? हालांकि, एक बात तो माननी पड़ेगी कि आपने बिल्कुल सही लिखा है कि यह “समारोह” एक “नायाब उदाहरण” था । सच में, ऐसा “नायाब” था राय साहब…कि “ग़ालिब की गहराई” “मीर की तन्हाई” और “अकबर का तंज”…तीनों के दर्शन एक साथ “साकार” हो गए ।

यह वही “नायाब उदाहरण” था “राय साहब” जिसमें “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के लगभग 90 प्रतिशत संस्थापक सदस्यों को ही “उपेक्षित” कर दिया गया ! ये वही नायाब उदाहरण जिसमें एक वरिष्ठ पत्रकार और संपादक “विजय उपाध्याय” को बुलाने के बावजूद मंच से लौटाकर उन्हें सरेआम “अपमानित” कर दिया गया ! और राय साहब, यह भी कम “नायाब” नहीं है कि “पुलिस रिकॉर्ड” में दर्ज हत्या, आपराधिक साजिश, हनी ट्रैप, असलहा तस्कर और तोड़फोड़ जैसे आरोपों से घिरे “इक़रार मियां” जैसे “पेशेवर अपराधी” की मौजूदगी इस “गरिमामयी” कार्यक्रम में दिखी…और वो भी आपके पत्रकारों के “मंत्री जी” के “विशेष निमंत्रण” पर ! यह सिर्फ एक “चूक” नहीं है राय साहब बल्कि पत्रकारों के “मंत्री” जी की सोच की दिशा का “सार्वजनिक” प्रदर्शन है ।

क्या यह “नायाब” उदाहरण नहीं है राय साहब कि “पुलिस रिकॉर्ड” में दर्ज “सीएम साहब” के खिलाफ “झूठी गवाही” देने के मामले में और गोरखपुर में “देश विरोधी” भड़काऊ नारा लगवाकर युवाओं को “उपद्रव” के लिए भड़काने के मामले में कलुषित व्यक्ति “इक़रार अहमद” का नाम दर्ज है ! मगर फिर भी इस “नैतिक अधमी” से पत्रकारों के “मंत्री जी” की ऐसी क्या “घनिष्ठता” है कि एक “नैतिक अधमी” को “शपथ ग्रहण समारोह” में बुलाकर “समारोह” पर ही “ग्रहण” लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई । ये आपके पत्रकारों के वही “मंत्री” हैं न राय साहब… जिन्होंने पिछले वर्ष “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” की “पुरातन परंपरा” को तोड़ते हुए नई कार्यकरिणी के कदम “दरगाह” की तरफ मोड़ देने में सक्रिय “भूमिका” निभाई थी । “इक़रार” जैसे “नैतिक अधमी” और “पेशेवर अपराधी” की “सीएम साहब” के कार्यक्रम में मौजूदगी यह बताती है “राय साहब”… कि आपके पत्रकारों के “मंत्री” जी का “अपराधियों” और “नैतिक अधमियों” के प्रति अगाध प्रेम स्वयं में एक “नायाब” उदाहरण है । क्या “मंत्री” जी यह नहीं जानते कि जिस “इक़रार” के नमक का “हक” अदा करने के लिए “मंत्री” जी ने समारोह के “सम्मान” को ही दांव पर लगा दिया उस पर “हनीट्रैप गैंग” संचालित करने जैसी “नैतिक अधमता” का एक और नया आरोप भी FIR की “शक्ल” अख्तियार कर चुका है ? पुरानी कहावत है कि “वेश्या” चाहे जितनी भी “अमीर” और “खूबसूरत” क्यों न हो…उसे किसी शादी समारोह में “निमंत्रित” नहीं किया जाता और न ही उसे घर में “बहू” का दर्जा दिया जाता है । मगर आपके “मंत्री” जी तो दरगाही पत्रकार “गुप्ता जी” को अगला “चुनावी उम्मीदवार” बनाकर अभी से “प्रमोट” करना शुरू कर चुके हैं । ऐसा लगता है जैसे “मंत्री” जी अब “प्रेस क्लब” की बिल्डिंग पर “चादर” चढ़वा कर और “प्रेस क्लब” बिल्डिंग से “अजान” लगवाकर ही मानेंगे ।

एक ओर पत्रकारों का “शपथ ग्रहण समारोह” और दूसरी ओर “सीएम साहब” जैसे “गरिमामय” पद पर आसीन व्यक्ति की कार्यक्रम में उपस्थिति और तीसरी तरफ “इक़रार मियां” जैसे विद्रूप चेहरे की कार्यक्रम में “मौजूदगी”…. जो फर्जी तौर पर बने “पासपोर्ट” के सहारे देश छोड़कर भागने में “फिराक” में है ! यह “विरोधाभास” स्वयं में ही बहुत कुछ कह जाता है “राय साहब” ! अपने “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के ग्रुप में ही “उपजे” इस “असंतोष” को महसूस कीजिये “राय साहब” ! देखे कुछ जर्नलिस्ट प्रेस क्लब की कुछ चैटिंग

प्रेस क्लब ग्रुप में आंतरिक असंतोष PDF

राय साहब, यह भी एक “नायाब” उदाहरण ही है कि “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के जिस संस्थापक “एस पी त्रिपाठी” का का नाम स्वयं “सीएम साहब” ने अपने “संबोधन” में लिया, उन्ही “एस पी त्रिपाठी” को “सम्मान” योग्य नहीं समझा गया । और उधर, “मंत्री जी” की सक्रियता देखिए कि “परंपराओं” को मोड़ना हो और दिशा बदलनी हो या फिर “संगत” चुननी हो तो हर जगह उनका “दूरदर्शी” योगदान स्पष्ट दिखाई देता है । “इक़रार मियां” जैसे चरित्रों के साथ “मंत्री जी” की निकटता अब किसी से छिपी नहीं है राय साहब ! सवाल यह नहीं है कि “इक़रार” जैसा पेशेवर बदमाश आया क्यों बल्कि सवाल यह है कि इस “पेशेवर बदमाश” को बुलाया किसने ? और सवाल यह भी है कि “सीएम साहब” की मौजूदगी में ही यदि यह “पेशेवर बदमाश” अपने पूर्व की हरकत की भांति यदि “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगा देता तो स्थिति कितनी “असहज” हो जाती ?

समारोह के और भी “नायाब उदाहरण” सामने आए जहाँ सक्रिय और सम्मानित पत्रकारों को दरकिनार कर दिया गया और एक ऐसा शख्स मंच जा पहुँचा जिसकी पहचान “पत्रकारिता” से कम और “पी दारू भाई पी दारू” और आपराधिक जीवनशैली से ज्यादा रही है । मुख्यमंत्री जी ने अपने संबोधन में मान्यता प्राप्त पत्रकारों को महत्व दिया जो उनके “दृष्टिकोण” की गंभीरता को दर्शाता है । लेकिन सवाल यह है कि क्या मान्यता प्राप्त वालों द्वारा उस “विश्वास” को संजोकर रखा गया ? क्या ये “सीएम साहब” की इच्छा है कि “पीडीएफ” फ़ाइल बनकर “सोशल मीडिया” पर तैरने वाले अखबार अपने “सर्कुलेशन” की फर्जी “इबारत” सजा कर मान्यता हासिल कर लें और जनता की गाढ़ी कमाई का “बंदरबांट” करें ? क्या “राष्ट्र चिन्ह” जैसे अखबार की “सर्कुलेशन” वाकई में इतनी ज्यादा है कि इस “अखबार” से लगभग दर्जन भर “मान्यता की रेवड़ीयाँ” अब तक बांटी जा चुकी है ? सच्चाई तो यह है राय साहब, कि “मान्यता” पाने और दिलाने के नाम पर लोगों ने “सीएम साहब” के विश्वास और भरोसे का ही “कत्ल” कर डाला है । सच्चाई तो यह है कि राय साहब कि “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के लगभग दो दर्जन “संस्थापकों” को ही इस “शपथ ग्रहण समारोह” में “उपेक्षित” कर दिया गया ! सत्यता तो यह है राय साहब कि ऐसे “नायाब” और “कलुषित” लोगों को कार्यक्रम में जगह दी गयी जिनका सक्रिय पत्रकारिता से दूर दूर तक कोई “वास्ता” नहीं है ! सच्चाई तो यह भी है राय साहब की “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के लगभग दो तिहाई पत्रकार इस कार्यक्रम में दिखाई ही नहीं दिए ! और सच्चाई तो यह भी है राय साहब कि “पुलिस रिकॉर्ड” में दर्ज ऐसे “अपराधी” और “नैतिक अधमी” को सीएम साहब के कार्यक्रम में जगह दी गयी जो “बारिश के केंचुए” की तरह इधर उधर की “मिट्टी” निगलकर अपना “जीवन यापन” करता रहा और जिसे लोग अपने घर बुलाकर “चाय” पिलाना भी मुनासिब नही समझते ।

“इक़रार मियां” जैसे पेशेवर अपराधी हालात के हिसाब से रंग बदलते हैं इसलिए इन्हें पहचानना जरूरी है । ऐसे लोग “आफ्तार” से एक मिनट पहले “रोज़ा” टूटने के डर से एक “खजूर” भी नहीं खाते लेकिन दूसरों का “हक़” निगलकर सालों साल “रोजा” रह लेते हैं । यकीन न हो राय साहब तो “पुलिस रिकॉर्ड” में दर्ज इस पेशेवर बदमाश की नौटंकीबाजी भरे इस “स्टंट” को देखिए ! यह इसी तरह से प्रशासन को अब तक “भरमाता” चला आया है ।

यकीन मानिए राय साहब, यदि यही हाल रहा तो एक न एक दिन यह सब कुछ “सीएम साहब” के “संज्ञान” में अवश्य आएगा । और जिस दिन ऐसा हुआ, उस दिन अगली बार का “निमंत्रण” शायद सिर्फ “इंतज़ार” बनकर रह जाएगा । याद रखिए “राय साहब” कि यह पूरा “सिस्टम” बहुत विशाल है, और आपका “प्रेस क्लब” उसका एक बहुत ही छोटा सा “हिस्सा” ! इसलिए फर्क करना बंद मत करिए । गलत को “गलत” कहना बंद कर दिया, तो सच की गाड़ी “ढलान” पर खुद ही चल पड़ेगी । खुशी के लिए “झूठी तारीफें” जरूरी हो सकती हैं, पर “ईमान” से बड़ी नहीं होतीं । पैसा जरूरी है, पर “भरोसे से बड़ा नहीं होता । जो आदमी “सही” और गलत का फर्क बचाकर रखता है वही असल में “अमीर” होता है, राय साहब ! बाकी सब तो बस “बिल” बना रहे हैं ।

ईश्वर आपके पत्रकारों के “मंत्री जी” के “पद” को और आपकी “झूठी तारीफों” के उस डगमगाते हुए “सेतु” को ठीक उसी तरह सुरक्षित रखे जैसे “सहारा! की “बचत स्कीमों” में गरीबों का पैसा सुरक्षित रहता है ।

By systemkasach

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