मुक़द्दस दरगाह और दाग़दार इंतज़ामिया ! अकीदत के साये में उठते संगीन सवाल !

एक मुक़द्दस दरगाह के निगहबानों पर उठते संगीन सवालों का सिलसिला कुछ यूँ चल निकला है कि बरसों से अकीदत, सुकून और रूहानी एतमाद की पहचान रही पाक मुकद्दस दरगाह की निज़ाम-ए-इंतज़ामिया आजकल नए इल्ज़ामात, चर्चाओं और बहसों के साए में घिरती जा रही है । इन नए इल्ज़ामातों और सबूतों ने अहल-ए-ईमान के दिलों में गहरी बेचैनी और फिक्र पैदा कर दी है । यह वही जगह है जहाँ लोग अपनी परेशानियों का हल, दिल का सुकून और रूह की तस्कीन तलाश करने आते हैं, लेकिन इसी जगह की निज़ाम-ए-इंतज़ामिया पर अगर बेग़ैरती और बदकिरदारी के सवालात खड़े होने लगें, तो यह महज़ एक खबर नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए सोचने का मौज़ू बन जाता है ।

बात तब और संगीन सूरत-ए-हाल इख्तियार कर लेती है, जब दरगाह के मुतवल्ली के ओहदों पर बैठे अफराद के खिलाफ पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज संगीन मुकदमों और हालिया इल्ज़ामात का जिक्र बार-बार सामने आने लगता है । कहा जा रहा है कि इन इल्ज़ामात में ना सिर्फ आपराधिक नौइयत के मामले शामिल रहे हैं, बल्कि अब कुछ ऐसे मुकदमे सबूत और दावे भी जुड़ते जा रहे हैं, जो कथित तौर पर बदकिरदारी के इल्ज़ामात की शक्ल इख्तियार करते नजर आ रहे हैं । ऐसे तमाम मामले दरगाह की पाकीज़गी, उसकी रूहानियत और अकीदतमंदों के एतमाद को गहरी ठेस पहुँचाने वाले माने जा रहे हैं ।

सबसे ज्यादा तशवीश की बात यह बताई जा रही है कि दरगाह के मुतवल्ली के बेहद क़रीबी माने जाने वाले एक शख्स से जुड़े कुछ ऐसे आपत्तिजनक और शर्मनाक बदकिरदारी के कथित सबूत सामने आये हैं जो न सिर्फ उसकी ज़ाती शख्सियत बल्कि पूरे निज़ाम-ए-इंतज़ामिया के किरदार पर बड़े और गहरे सवाल खड़े करते हैं । मुतवल्ली के बेहद क़रीबी माने जाने वाले एक शख्स पर दरगाह पर आने वाली ख़्वातीन के साथ नज़दीकियां बढ़ाने, एतमाद हासिल करने और फिर उसी एतमाद का गलत इस्तेमाल करने जैसे संगीन इल्ज़ामात लगाए जा रहे हैं । सामने आए कथित सबूतों के बारे में यह तक कहा जा रहा है कि उनकी नौइयत इतनी शर्मनाक और हया-सोज़ (आपत्तिजनक) हैं कि उन्हें आम आवाम के सामने लाना भी गैर-मुनासिब और बेशर्मी समझी जा सकती है।

गौरतलब है कि नए शर्मनाक और बदकिरदारी के इल्ज़ामात उसी शख्स पर लग रहे हैं, जिसे दरगाह के मुतवल्ली का बेहद क़रीबी माना जाता है…और हैरतअंगेज़ तौर पर यही वो शख्स था जो दरगाह के मुतवल्ली के साथ अपने ख़ास-नवाज़ पत्रकारों की सरपरस्ती में सूबे के वज़ीर-ए-आला (मुख्यमंत्री) के प्रोग्राम में दाख़िल होने में कामयाब रहा था । वजीर-ए-आला के प्रोग्राम में इन बदकिरदारों के दाखिल होने के मामले पर अब तक ज़बरदस्त शोर-ओ-गुल बरपा हुआ है । 

वाज़ेह रहना चाहिए कि ये तमाम बातें इल्ज़ामात, कथित सबूतों और दावों के दायरे में आती हैं, जिनकी अंतिम हक़ीक़त का तअय्युन (फैसला) करना अदालत का काम है और वही करेगी भी ! इस मरकज़ी तहरीर में किसी शख्स का नाम नहीं है…न ही किसी एक शख़्स से यह ताल्लुक रखता है…और न ही किसी एक शख्स के खिलाफ मोहिम चलाने के लिए यह लिखी गई है…बल्कि एक एहतियाती पैग़ाम और एक जिम्मेदार आवाज़ के तौर पर सामने रखी जा रही है ताकि अकीदत भी महफूज़ रहे और अकीदतमंद भी ! लेकिन इसके बावजूद कुछ बुनियादी सवालात हैं जो अपनी जगह मजबूती से कायम हैं और जिनका जवाब समाज को तलाशना होगा ।

क्या किसी भी मुक़द्दस और पाक जगह की आड़ में अकीदत और एतमाद के साथ इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त किया जा सकता है ? क्या अकीदतमंद बेख़ौफ़ और बेफिक्र होकर वहां हाज़िरी दे सकते हैं, जब ऐसे इल्ज़ामात बार-बार ज़ेहन में दस्तक दें और शुबहात को जन्म दें ? आँख बंद करके एतमाद करने की बजाय क्या अब अपने घर की ख़्वातीन और बच्चियों को एहतियात की तालीम देंकर होशमंद रहने की हिदायत दें ? क्या दरगाह की इंतज़ामिया को अब ज्यादा शफ्फाफियत (पारदर्शिता) निगरानी और जवाबदेही की जरूरत महसूस नहीं होती ?

समाज के तौर पर हमारी जिम्मेदारी बनती है कि आँख बंद करके एतमाद करने के बजाय होशमंदी और बसीरत से काम लें ! अपने घर की ख़्वातीन और बच्चियों को एहतियात और हिफाज़त की तालीम दें ! किसी भी मशकूक या गैर-मुनासिब हरकत को नजरअंदाज करने के बजाय उस पर गौर करें और जिम्मेदार इदारों से जवाबदेही, निगरानी और इस्लाह (सुधार) की मांग करें ! क्योंकि दरगाहें महज़ इमारतें नहीं होतीं, बल्कि वो रूहानी सुकून, अकीदत और यकीन की मरकज़ होती हैं । लेकिन अगर वहीं के एतमाद पर सवाल उठने लगें, तो खामोशी इख्तियार करना मसले का हल नहीं बल्कि हिकमत, संजीदगी और जिम्मेदारी के साथ आवाज़ उठाना वक्त की ज़रूरत बन जाता है ।

इसलिए अकीदत को महफूज़ रखिए लेकिन अपनी आँखें भी खुली रखिए, क्योंकि एहतियात ही असल हिफाज़त है ।

By systemkasach

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