गोरखपुर : 6 अप्रैल को सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के अहम और निहायत “हस्सास” कार्यक्रम में पेशेवर बदमाशों और बद-किरदारों की घुसपैठ कराकर जिस किस्म की लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना हरकत की गई, उसने पूरे गोरखपुर के पूरी पत्रकारिता हल्के को सिर्फ शर्मसार ही नहीं किया बल्कि “सर-ए-आम रुसवा” भी कर दिया। उम्मीद की जा रही थी कि अपनी इस ग़ैर-मामूली और “संगीन ख़ता” पर पब्लिकली “इज़हार-ए-नदामत” (गलती मानते हुए) जर्नलिस्ट प्रेस क्लब इस वाक़ये के ज़िम्मेदार अफ़रादों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई कर एक “नज़ीर” कायम करेगा । लेकिन हालात कुछ और ही “दास्तान-ए-हक़ीक़त” बयान कर रहे हैं ! ऐसा मालूम होता है कि अपने “गुनाह-ए-अज़ीम” का “इक़रार” करने के बजाय इस पूरे मामले के संभावित किरदार दुर्गेश यादव (कोषाध्यक्ष) ने मानो मंदिर के खिलाफ एक खुली जंग का “ऐलान” कर दिया है । ऐसा इसलिए भी महसूस होता है क्योंकि मालूमात के मुताबिक मुख्यमंत्री के गोरखपुर आगमन पर “जर्नलिस्ट प्रेस क्लब” के कुछ पत्रकारों ने आज उनसे मुलाक़ात की कोशिश की, मगर अपनी “साख” और “एतबार” खो चुके इस “गिरोह” से सीएम साहब ने मिलने से साफ़ इंकार कर दिया । ऐसा नहीं है कि इसे महज़ वक़्त की तंगी बताकर पल्ला झाड़ा जाए…क्योंकि तारीख़ गवाह है कि तमाम “मसरूफ़ियतों” के बावजूद भी आज तक सीएम साहब ने कभी प्रेस क्लब के पत्रकारों से मुलाक़ात से इंकार नहीं किया था । इस “नामुलाक़ात” के साथ ही एक और “हैरतअंगेज खता” की चर्चा जोरों पर इसलिए आ चुकी है क्योंकि दुर्गेश यादव (कोषाध्यक्ष) ने एक और निहायत आपत्तिजनक हरकत को अंजाम दे डाला । हुआ यूँ कि सीएम साहब और बच्चों के दरमियान एक “पुर-ख़ुलूस” और “दिलनशीं” (आत्मीयता भरी) मुलाक़ात का वीडियो पत्रकार “अमित सिंह” ने प्रेस क्लब के सभी व्हाट्सएप्प ग्रुपों पर शेयर किया । देखें वीडियो !
लेकिन दुर्गेश यादव (कोषाध्यक्ष) ने प्रेस क्लब के व्हाट्सएप्प ग्रुप से सी एम के इस बेहद आत्मीयता भरे वीडियो को डिलीट मार दिया । देखें स्क्रीशॉट

अब सवाल यह है कि क्या इसे महज़ दुर्गेश यादव की “धृष्टता” कहा जाए या फिर मंदिर के खिलाफ “बग़ावत” का एलान ? क्या यह हरकत “ज़ेहनी दिवालियापन” की इंतिहा नहीं है ? क्या इसे सीएम विरोध की एक “मुकम्मल” और सुनियोजित साज़िश न कहा जाए ? क्या दुर्गेश यादव “हुकूमत-ए-वक़्त” के खिलाफ किसी खास एजेंडे को अंजाम देने में मशगूल हैं ? महज़ सौ-दो सौ के सर्कुलेशन वाले “चटनी-चूरन” टाइप अखबार के सहारे “मान्यता” की मलाई चाटने वाले दुर्गेश यादव की मान्यता की “तफ़्तीश” अब क्यों न खोल दी जाए ? क्या यह जानना ज़रूरी नहीं कि इन्होंने किन-किन “अफ़सरान” को बरगला कर जनपद में “डीलिंग” का पूरा जाल बिछा रखा है ? क्या इनके द्वारा रोजाना की जा रही नवग्रहों की परिक्रमा और साष्टांग दंडवत के राज को जानना अब जरूरी नहीं है ?

ऊपर दी गयी तस्वीर बताती है कि पिछले साल भी एक ऐसा ही मंजर सामने आया था, जब दरगाह के “नमक का हक़” अदा करने के चक्कर में “प्रेस क्लब” के मंत्री पंकज श्रीवास्तव ने “इंतेख़ाब” (चुनाव) जीतते ही नई कार्यकारिणी के क़दम सबसे पहले दरगाह की जानिब मोड़ दिए और पूरी कार्यकारिणी समेत दो टके के बदमाश इकरार अहमद को खुश करने पहुँच गए । उस वक़्त इसे महज़ “इख़्तिलाफ़-ए-राय” समझा गया, लेकिन इस बार मामला सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की बेदाग साख सुरक्षा और अमन-ओ-अमान से जुड़ा हुआ है…जो अपनी नज़ाकत में बेहद संगीन है । प्रेस क्लब की फ़िज़ाओं में “गर्दिश” करती बातें इशारा करती हैं कि मंत्री पंकज श्रीवास्तव बिहार की सियासत के हरफनमौला खिलाड़ी “लालू यादव” की तर्ज़ पर एक ख़ास एजेंडा सेट करने में लगे हैं । लालू यादव का वह मशहूर बयान…“हमें दो ही बिरादरी के वोट से मतलब है, एक दाढ़ी और दूसरी हांड़ी”…आज फिर ज़ेहन में ताज़ा हो उठता है । उसी तर्ज़ पर अब यह कहा जा रहा है कि प्रेस क्लब में “लाला और हलाला” की बिसात बिछाई जा रही है । जानकारों के मुताबिक ‘लाला’ से मतलब (श्रीवास्तव) और ‘हलाला’ से (मुसलमान) लिया जा रहा है । इस बेहद संगीन घटना के बाद प्रेस क्लब के मंत्री पंकज श्रीवास्तव बेहद बुझे मन से कुत्तों को बिस्किट खिलाते नजर आए हैं ।
लेकिन सवाल यहाँ भी “मंत्री जी” से वही है कि, आपके इस “कुकुर प्रेम” और विश्वास का “कत्ल” करते हुए यदि यही कुत्ते आपको दौड़ाकर काट बैठें तो क्या होगा आपके यकीन भरोसे और ऐतबार का ? यही वजह है कि पंकज श्रीवास्तव पर यह इल्ज़ामात चस्पा हो रहे हैं कि इन्होंने भरोसे और ऐतबार का कत्ल करते हुए सिर्फ मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में इकरार अहमद और उसके गुडों जैसे संदिग्ध किरदारों को ही नहीं बुलाया, बल्कि अनुराग श्रीवास्तव को भी सीएम के मंच तक पहुँचा दिया ।
दुर्गेश यादव का हाँड़ी फ़ॉर्मूला ..
दूसरी जानिब दुर्गेश यादव (कोषाध्यक्ष) पर यह ठप्पा लग रहा है कि इन्होंने “हांड़ी और दाढ़ी” के फ़ॉर्मूले को अपनाते हुए कार्बाइन छीनने के आरोपी जितेंद्र यादव को मुख्यमंत्री के मंच तक पहुँचाने में अहम किरदार अदा किया । यूँ तो इन तथाकथित पत्रकारों ने प्रेस क्लब की आड़ में सैकड़ों “गुनाहात” की फेहरिस्त खड़ी कर दी है । अराजकता, मक्कारी और दलाली का ऐसा माहौल कायम किया गया कि जो भी उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़ा हुआ, उसे “अफ़सरान” को गुमराह कर फर्जी मुकदमों में जकड़ दिया गया । ज़मीन कब्जाने के लिए पेशेवर औरतों का इस्तेमाल कर आम लोगों पर छेड़खानी के झूठे मुकदमे तक लगाए गए । यहाँ तक कि आईपीएस विश्नोई को बरगलाकर “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” पर “गैंगेस्टर” तक लगवा दिया गया, मगर जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो सारी साज़िशें बेनक़ाब हो गईं और जवाबतलबी शुरू हो गई । यह पूरी साज़िश दरअसल इसलिए बुनी गई थी ताकि “निज़ाम” और “हुकूमत” के खिलाफ “अवाम” के दिलों में “बदगुमानी” और “इज़्तिराब” पैदा किया जा सके । क्या ऐसे लोग हुकूमत की आस्तीन में पलते हुए साँप नहीं कहे जाएंगे ? आज जब इन कुकर्मों के तमाम सुबूत सामने आ चुके हैं, तो क्या यह गवारा किया जा सकता है कि यही नापाक हाथ एक तरफ़ सीएम साहब को गुलाब पेश करें और दूसरी तरफ़ आस्तीन में खंजर छुपाए बैठें ? देखें असलियत बयां करती एक और तस्वीर…

हर अति की क्षति होती है और आज वही अति अपनी तबाही के किनारे,अपनी क्षति के साथ खड़ी नज़र आ रही है । प्रेस क्लब को तमाम सहूलियतों से “आरास्ता” कर पत्रकारों के “फ़लाह-ओ-बहबूद” के लिए सुपुर्द करने वाले सीएम साहब अगर मिलने से इंकार कर दें, तो यह महज़ “इत्तेफ़ाक़” नहीं बल्कि एक सख़्त पैग़ाम है । जिस “सरपरस्त” ने हमेशा पत्रकारों के लिए अपने दर खुले रखे, उसी के साथ इस क़िस्म की हरकत ! यह गलती नहीं, बल्कि “गुनाह-ए-अज़ीम” है, और गुनाह की सज़ा तो लाज़िमी है ।
दुर्गेश यादव द्वारा सीएम साहब से “मुतअल्लिक” पोस्ट को प्रेस क्लब ग्रुप से हटाया जाना जिस “ज़ेहनी कैफ़ियत” की तरफ़ इशारा करता है, उसे देखते हुए यह मांग ज़ोर पकड़ रही है कि उनका बाक़ायदा मेडिकल मुआयना कराते हुए उन्हें तत्काल मनोरोग विशेषज्ञ की देख रेख में सुपुर्द कर दिया जाए ।
26 अप्रैल को आम सभा की बैठक…
पता चला है कि इस घटना के जिम्मेदारों ने मंदिर से जुड़े होने का भ्रम फैलाकर…सीएम की अस्मिता से जुड़े इस महत्वपूर्ण प्रकरण पर डैमेज कण्ट्रोल का ठेका ले लिया है और इस गंभीर मुद्दे को उठाने वालों पर प्रेशर बनाकर मामले को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया हैं । प्रश्न यह है कि ईस गंभीर प्रकरण को दबाने का प्रयास करने वाले लोग क्या वाकई में मंदिर के साथ है या फिर मंदिर के खिलाफ ? प्रेस क्लब के अंदर ही अब यह आवाज़ बुलंद हो चुकी है कि इस “संगीन” और “नाकाबिले-माफी” गुनाह-ए-अज़ीम के लिए अध्यक्ष समेत पूरी कार्यकारिणी को सामूहिक तौर पर माफी माँगनी चाहिए और दोषियों को उनके “ओहदों” से बरखास्त किया जाना चाहिए । साथ ही, इस फैसले का एलान आगामी 26 अप्रैल को प्रस्तावित आम सभा की बैठक में भी किया जाना चाहिए ताकि हक़ीक़त सामने आए और जवाबदेही तय हो सके ।

