ऊपर दिए गए वीडियो को देखें और साथ ही उस नापाकियत से भरी शख्सियत को भी देखें जो अपनी बद किरदारी को इमाम हुसैन के पाक और मुकद्दस नारों की आड़ में छिपाने की नाकाम कोशिशें कर रहा है । इसी अंदाज-ए- बयां में कभी इस बद-किरदार ने देशविरोधी नारे लगाकर गोरखपुर का माहौल ख़राब करने की कोशिश की थी । आज सख्त हुकूमत की ही देन है कि इस बद-किरदार के लब पर देश विरोधी नारों की जगह पाक इमाम हुसैन का नाम है । इमाम हुसैन का ज़िक्र सिर्फ नारे, जुलूस या रस्मों का मोहताज नहीं है वो एक ऐसी शख़्सियत हैं जिनकी पूरी ज़िन्दगी इंसानियत, कुर्बानी और हक़ की आवाज़ बनने का नाम है इक़रार अहमद । इमाम हुसैन हमें ये सिखाते हैं कि इबादत सिर्फ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अमल से होती है । कर्बला में उन्होंने अपनी और अपने घराने की कुर्बानी देकर ये साबित किया कि अगर इंसाफ़ और ज़ुल्म के बीच चुनाव करना हो, तो सिर कटाना मंज़ूर है मगर सर झुकाना नहीं । उनकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा पैग़ाम यही है कि मजहब का मतलब इंसानियत है और इबादत का मतलब दूसरों के दर्द को समझना है । बद किरदार लोग जानते ही नहीं कि हुसैनियत का मतलब है मज़लूम के साथ खड़ा होना है । आज शहीद मुबारक खां दरगाह पर उर्स की आड़ में डांस और नोट उड़ाने के साथ जो दिखावा हो रहा है वह दिखावा हुसैन के रास्ते से दूर जाने की निशानी है ।
हुसैन का नाम लेने का हक़ सिर्फ उसी को है इक़रार अहमद जो उनके उसूलों पर चले । इसलिए तुम जैसे फ़ित्नापरस्तों को यह हक हासिल नहीं है । कर्बला की बात याद रखनी चाहिए कि “जिस मजलिस में गरीब का हक़ दब जाए, वो मजलिस हुसैनी नहीं हो सकती ।”अगर शहीद मुबारक ख़ाँ दरगाह पर उर्स या किसी भी धार्मिक आयोजन में खर्च हो रहा है, तो उसका असली मकसद होना चाहिए…भूखे को खाना मिले,बीमार को इलाज मिले,बेघर को सहारा मिले ! लेकिन यहाँ तो दरगाह की आड़ में सिर्फ अपनी तिजोरियां भरी गई हैं..अय्याशियों में पैसे लुटाए गए हैं..रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया गया है..अवैध प्रॉपर्टी डीलिंग का कारोबार शुरू किया गया है और नोटों को पेशेवर महिलाओं के कदमों तले बिछाया गया है । इसलिए नापाकियत से लबरेज़ तुम्हारे बद किरदारी भरे शख्सियत से इमाम हुसैन का नाम बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता इक़रार अहमद !
ये उर्स था… या अकीदतमंदों की बे-हिसी का मंजर ?
मुबारक खां दरगाह पर उर्स के नाम पर जो मंजर सामने आया वो किसी से छुपा नहीं है । इमाम हुसैन का नाम लेने वाले बद किरदार ने क्या कभी ठहरकर यह सोचा कि उनकी याद कैसे मनाई जा रही हैं ? एक तरफ कर्बला का वो पैग़ाम है जहाँ भूख, प्यास और कुर्बानी थी…और दूसरी तरफ ये मंजर जहाँ नोट उछाले जा रहे हैं, डांस हो रहा है, और इसे “इबादत” का नाम दिया जा रहा है । देखें वीडियो
क्या यही अदब है औलिया की चौखट का ? क्या यही तर्ज़ है उर्स का ? जब दरगाह की जिम्मेदारी ऐसे नापाक लोगों के हाथ में आ जाए जिनकी कार्यशैली और किरदार पर पहले से सवाल उठते रहे हों,तो क्या ऐसे हालात हैरान करते हैं ? हैरत होती है कि पाक दरगाह को बद किरदारों का चारागाह बना कर रख दिया गया है ।
मुबारक खां दरगाह : उर्स या बे-हुरमती ?
जरा सोचें और ठहरकर देखें कि ये लोग क्या कर रहे हैं ? जिस चौखट पर सिर झुकाकर लोग अपनी परेशानियाँ लेकर आते हैं,
उसी चौखट पर उर्स के नाम पर नोट उछाले जा रहे हैं…डांस हो रहा है…और ये सब कैमरे में साफ़ कैद है । इक़रार अहमद की नोट उछालने की यह प्रैक्टिस उस रईस नवाब की याद ताजा कर देती है जो अपने महलों में मुजरा करने वालियों पर ठीक इसी तरह रुपया लुटाया करते थे ।
इस नापाक और बेहूदगी भरी हरकत पर आवाम ने अपना गुस्सा सोशल मीडिया पर साझा किया है और मुतवल्ली इक़रार की हरकत पर सख्त ऐतराज़ ज़ाहिर किया है । देखें कुछ स्क्रीनशॉट्स PDF पर क्लिक करें !
