प्रेस क्लब की डील और डकार लिए 1.20 लाख ! रंगीन प्रेस क्लब के वक़ार पर उठे संगीन सवाल….सुनें ऑडियो !

गोरखपुर : जर्नलिस्ट प्रेस क्लब गोरखपुर की कार्यकारिणी को लेकर हो रहे नित नए खुलासे अब महज़ चर्चा का विषय नहीं रहे, बल्कि हालात की “संगीनियत” और “नज़ाकत” को बयां कर रहे हैं । साथ ही यह सोचने पर भी मजबूर कर देते हैं कि भविष्य में प्रेस क्लब की दिशा और दशा आखिर किस “गिरफ़्त” में जाने वाली है । सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम में बदमाशों और अय्याशों की घुसपैठ कराने का बेहद संगीन आरोप झेल रहे पंकज श्रीवास्तव (मंत्री) और दुर्गेश यादव (कोषाध्यक्ष) का चेहरा पहले ही बेनक़ाब हो चुका है । सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि “प्रेस क्लब गोरखपुर” के व्हाट्सएप्प ग्रुप से “सीएम” की पोस्ट डिलीट करने, अघोषित गैस एजेंसी चलाने और अपनी मान्यता को लेकर भी दुर्गेश यादव पहले ही “कटघरे” में खड़े किए जा चुके हैं । इन तमाम इल्ज़ामात के बावजूद अब एक नई बहस ने तूल पकड़ लिया है…और वो है दुर्गेश यादव द्वारा अपने सोशल मीडिया के “स्टेटस” पर शेयर किया जा रहा एक पुलिसकर्मी का पत्र !

दुर्गेश यादव के स्टेट्स पर वायरल पत्र PDF

ट्रांसफर का वादा या ‘रायता’ फैलाने की सियासत ?

ऊपर दिया गया पत्र उस पुलिसकर्मी का है जिसने अपनी व्यक्तिगत परेशानियों को लेकर अपने उच्चाधिकारी को पत्र लिखा है । क्या “कोषाध्यक्ष” महोदय यह भी नहीं जानते कि अगर कोई पुलिसकर्मी अपने उच्चाधिकारी को व्यक्तिगत परेशानी या ट्रांसफर/शिकायत से जुड़ा पत्र लिखता है, तो उसे “विभागीय संचार” माना जाता है । उसमें निजी जानकारी भी हो सकती है इसलिए वह पत्र “पब्लिक डोमेन” के लिए नहीं होता । मतलब की आपके चाह लेने भर से वह पत्र “पब्लिक डॉक्यूमेंट” नहीं बन जाता है “यादव जी” । आपके द्वारा एक पुलिसकर्मी की विभागीय/व्यक्तिगत चिट्ठी को बिना उसकी अनुमति के सार्वजनिक तौर पर वायरल किया माना जायेगा… क्योंकि पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी से बंधा होने के कारण यह कह ही नहीं सकता कि उसने खुद आपको ऐसा करने की “अनुमति” दी थी । आप भले “कोषाध्यक्ष” हैं यादव जी…लेकिन आपकी यह हरकत बताती है कि “कोषाध्यक्ष” होने के बावजूद आपकी “बुद्धि का कोष” पूरी तरह से “रिक्त” है । अब सवाल तो यही उठ रहे हैं कि दुर्गेश यादव को उस पुलिसकर्मी के इस व्यक्तिगत समस्या वाले पत्र को अपने “स्टेटस” पर शेयर कर “रायता” फैलाने की आखिर ज़रूरत क्यों पड़ी ? विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि दुर्गेश यादव इस मामले में पुलिसकर्मी को ट्रांसफर का “वादा-ए-ख़ास” दे चुके थे । अब इस वादे के एवज़ में लिया क्या गया… फ़िलहाल ये मसला अभी परदे में है । बताया जा रहा है कि रोजाना की जाने वाली अपनी “परिक्रमा” और “साष्टांग दंडवत” की दुहाई देने पर भी जब “ट्रांसफर” की गाड़ी पटरी पर नहीं आई, तो “कोषाध्यक्ष” महोदय ने “सोशल मीडिया” पर इस दरखास्त का ऐसा “रायता” बिखेरा कि समेटना मुश्किल हो गया । और जब तक समेटने की कोशिश होती, तब तक इस रायते की स्क्रीनशॉट्स कई हाथों तक पहुँचते हुए वायरल “दस्तावेज़” बन चुके थे । कोषाध्यक्ष महोदय की कार्यशैली से “प्रेस क्लब” के ख़ुद्दार और “रीढ़धारी पत्रकार” इतने खफा हैं कि वो सरेआम “प्रेस क्लब” के ग्रुप पर इन्हें इज़्ज़त बख़्शने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे । इज़्ज़त देने का यह ग्राफ अब इतने उच्च “कीर्तिमान” गढ़ रहा है कि धाराप्रवाह गिर रही “गालियों” को ढँकने के सारे “भागीरथ” प्रयास नाकाम साबित हो रहे हैं । देखें प्रेस क्लब ग्रुप का स्क्रीनशॉट !

प्रेस क्लब ग्रुप स्क्रीनशॉट PDF

वायरल ऑडियो : दलाली, मक्कारी और ज़मीर का सौदा

दूसरी तरफ, सूबे के मुखिया के कार्यक्रम में अपराधियों और अय्याशों की घुसपैठ कराने के बेहद संगीन मसले पर अभी जर्नलिस्ट प्रेस क्लब की छीछालेदर जारी ही थी कि “वसूलीबाजी” के एक वायरल ऑडियो ने “प्रेस क्लब” को और भी “रुसवा” कर दिया । अब तक जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के “मंत्री” और “कोषाध्यक्ष” ही अपनों के निशाने पर थे, लेकिन इस वायरल ऑडियो ने अब “उपाध्यक्ष” धनेश निषाद के चेहरे से भी “नक़ाब” नोचकर फेंक दिया है ।

‘सील’ और ‘डील’ का खेल : 1.20 लाख में बिकी साख !

जिले के मोतीराम अड्डा स्थित “खुशी हॉस्पिटल” को लगभग साल भर पहले स्वास्थ्य विभाग…जिसे जिले का सबसे बीमारू महकमा कहा जाता है…ने सील कर दिया था । अपने गले में “दलाली” का “पट्टा” धारण किये कथित पत्रकार “धर्मेंद्र पटवा” इस सील प्रकरण को “डील” करने अस्पताल संचालक के पास पहुँचे । पूरे 1 लाख 20 हजार में सौदा तय हुआ और यह रकम…पटवा और निखिल गुप्ता के माध्यम से “प्रेस क्लब” के उपाध्यक्ष, शिरोमणि धनेश निषाद तक पहुँची । लेकिन यहाँ से कहानी ने ऐसा शर्मनाक मोड़ लिया और आरोप लगने लगे कि “उपाध्यक्ष” महोदय पूरा रुपया “हज़म” कर गए । न डील पूरी हुई, न सील खुला…बस प्रेस क्लब की किताब में “अमानत में ख़यानत” का एक और स्याह अध्याय जुड़ गया । जब अस्पताल संचालक ने पुलिस में जाने की धमकी दी, तब गुप्ता, पटवा और धनेश के बीच “तकरार” हुई और मामला “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” तक पहुँच गया । इस मामले में “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” से क्या कहा “निखिल गुप्ता” ने आप खुद सुनिए!

 

“जो करते बने कर लो”…बेखौफी या बेशर्मी की इंतेहा ?

लेन-देन, दलाली, मक्कारी और वसूलीबाजी के इस पूरे प्रकरण में प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष शिरोमणि धनेश बाबू का भी एक ऑडियो वायरल है । जब इस लेन देन के मध्यस्थ ने उनसे रुपये वापस करने की बात कही, तो ऑडियो में वे बेखौफ अंदाज़ में कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि “जो करते बने कर लो”। मतलब साफ है कि माल जो “हज़म” हो गया, वो अब वापस नहीं मिलने वाला ! जब अस्पताल संचालक ने “प्रेस कॉन्फ्रेंस” की बात कही, तो उपाध्यक्ष महोदय ने इससे और ज्यादा छीछालेदर होने की चेतावनी देते हुए उसे हतोत्साहित करना शुरू कर दिया । साथ ही यह भी फरमाया कि रुपया किसी अधिकारी या पुलिस वाले को सबके सामने खुलेआम नहीं दिया जाता । तो फिर सवाल यह उठता है कि आख़िर वो 1 लाख 20 हजार स्वास्थ्य महकमे के किस हष्ट-पुष्ट अधिकारी को “उपाध्यक्ष” महोदय द्वारा दिया गया…या फिर यह पूरी रकम खुद ही डकार ली गई ? ये माना उपाध्यक्ष जी कि बीमारू विभाग के स्वस्थ और हष्ट पुष्ट स्वास्थ्य अधिकारी आप लोगों की मदद से अस्पताल संचालकों के 15-15 लाख रुपये इकट्ठा “डकार” जाते हैं और फिर “डकार” भी नहीं लेते । लेकिन आप क्या इस विभाग के “बिचौलिए” हैं जो जनता से रुपया ठग कर इन्हें पहुँचाते हैं ? क्या यही “दलाली” का बाजार गर्म करने के लिए आप “उपाध्यक्ष” बने हैं ? आखिर पत्रकारिता के नाम पर जनता का अब कितना “खून” चूसना बाकी रह गया है ? सुनें धनेश (उपाध्यक्ष) का ऑडियो !

 

अध्यक्ष की खामोशी…मजबूरी या मौन-समर्थन ?

बड़े हैरत की बात तो यह है कि इतने “संगीन” मामलों में वसूलीबाजी से लेकर सीएम के कार्यक्रम में गुंडों बदमाशों और अय्याशों की घुसपैठ तक पर…अब तक “प्रेस क्लब” के अध्यक्ष के मुँह से एक “लफ्ज़” तक नहीं फूटा है । कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि मुख्यमंत्री के मंच तक जा पहुँचे अनुराग श्रीवास्तव पर तो पिछली कार्यकारिणी ने ही बंदिश लगा दी थी । फिर ऐसा अचानक से क्या हो गया कि बंदिशें हटा दी गईं । पिछली बार वाले मंत्री जी तो अभी भी वही हैं और क्या अध्यक्ष जी इस प्रकरण से अंजान हैं..और अगर हैं तो आकर कुछ कहते क्यों नहीं ? क्या यह मान लिया जाए कि “प्रेस क्लब” अब वसूलीबाजों,दलालों,बदमाशों, और भीतरघातियों की “गिरफ्त” में जा चुका है ? क्या यह मान लिया जाए कि “प्रेस क्लब” का अहंकार अब इतना बड़ा हो चुका है कि अपराधियों के “नमक” का हक अदा करने के लिए सीएम योगी की सुरक्षा और मान सम्मान तक को “दाँव” पर लगा दिया गया ? क्या यह मान लिया जाए “अध्य्क्ष” साहब कि आपकी यह खामोशी अब ख़ामोश “इकरार” बन चुकी है । जरा गौर से देखिए अध्यक्ष महोदय, कि पत्रकारिता के नाम पर “चौथे स्तंभ” के “फोड़े” से बह रहा जितना भी “रक्त” ज़मीन पर गिर रहा है…वो “रक्त” पत्रकारिता के उतने ही “रक्तबीज” फिर से पैदा कर दे रहा है । स्थितियां “अनियंत्रित” ही नहीं बल्कि “महाविस्फोटक” हो चली हैं । आप सब कुछ देख और समझ रहे हैं लेकिन अब तक चुप्पी साधे हुए हैं । यदि आप “धृतराष्ट्र” होते तो फिर भी ग़नीमत थी, क्योंकि यह मान लिया जाता कि आपको कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है…लेकिन आपने तो “गाँधारी” की तरह अपने आँखों पर पट्टी बाँध ली है । क्या आपको लगता है कि सीएम “योगी” की सुरक्षा और “सम्मान” से खिलवाड़ महज एक गलती थी ? नहीं यह गलती नहीं बल्कि “महापाप” था…एक ऐसा “महाअपराध” जिसे बखूबी सोच समझकर पूरे “होश-ओ-हवास” में किया गया !

बेज़मीरों पर क्या होगा असर ?

मैं जानता हूँ कि मेरे लिखने से शायद कुछ नहीं बदलेगा, क्योंकि मैं उस “व्यवस्था” की “नग्न” कर रहा हूँ जो पहले से ही “नंगी” और “बिकाऊ” है ! पूरे प्रदेश में किसी “प्रेस क्लब” को शायद ही इतना सम्मान, प्यार, दुलार और भरोसा “सीएम योगी” से मिला होगा, जितना गोरखपुर “प्रेस क्लब” को मिला । और बदले में जो सीएम योगी को मिला, वह एक शर्मनाक “विश्वासघात” है ! एक ऐसा “शर्मनाक विश्वासघात” जो पूरे प्रदेश में कहीं नहीं बल्कि गोरखपुर “प्रेस क्लब” से ही मिला !

इस शर्मनाक हरकत पर माफी माँगने की बजाय इसे “मैनेज” करने के बचकाना खेल जो खेले जा रहे हैं…उसे देखकर यही लगता है कि, कुछ लोग यह भूल गए हैं कि वे “बहुत कुछ” तो हो सकते हैं लेकिन “सब कुछ” नहीं ! वे भूल गए हैं कि वे सब कुछ “मैनेज” कर सकते हैं लेकिन “महापाप” के “महादुष्परिणाम” को नहीं ! क्योंकि “महापाप” के “महादुष्परिणाम” “नक्षत्रों” के हैंगर में किसी “महाअनिष्ट” की “आशंका” के साथ टंगे रहते हैं । जर्नलिस्ट प्रेस क्लब और उसमें बैठी पत्रकारिता की “देह” अब जल चुकी है…बस आखिरी “हड्डी” चटक रही है ! इसलिए मेरी मानिए तो गोरखपुर “प्रेस क्लब” से लेकर “दरगाह” के बीच जहाँ भी “चुल्लू” भर पानी मिले, उसमें आँख मूँदकर “छलाँग” लगा दीजिये..क्योंकि “मोक्ष” पाने और “प्रायश्चित” करने का इससे “शानदार” अवसर फिर नहीं मिलेगा । देखे प्रमुख सचिव गृह को लिखा गया पत्र !

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By systemkasach

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