अफवाह दूध की, इंजेक्शन रैबीज़ के…नेफ्रॉन पत्रकारिता का नया मौसम !

गोरखपुर : गोरखपुर में इन दिनों खबरों के “खौफ़” का कारोबार ज़्यादा चल रहा है । कभी भैंस के दूध से “रैबीज़” निकल आता है, कभी मैंगो शेक से “ज़हर” बरामद हो जाता है, और कभी ठेले वाला सीधे “केमिकल अपराधी” घोषित कर दिया जाता है । लगता है जैसे शहर में “विज्ञान” छुट्टी पर है, तर्क “सस्पेंड” हो चुका है और अफ़वाहें “ओवरटाइम” कर रही हैं ।

पहला तमाशा : भैंस का दूध और रैबीज़ का डर

पाँच दिन पहले गोरखपुर में “विज्ञान” पर “अज्ञान” भारी पड़ गया, CMO साहब दिखावे पर उतर आए और सोशल मीडिया में दूध से रैबीज़ वाले रायते को भरपूर फैलाया गया । इसमें किसी की कोई गलती नहीं थी… बल्कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुछ दिमागों में अचानक से “न्यूरॉन” की जगह “नेफ्रॉन” भर गया था । शरीर में दो व्यवस्थाएँ मौजूद होती हैं..एक “न्यूरॉन” जो सोचने-समझने, तर्क करने की शक्ति प्रदान करता है । और दूसरा “नेफ्रॉन” जो शरीर के बेकार और अपशिष्ट तत्वों को छाँटकर बाहर निकालने के लिए किडनी में मौजूद रहकर “किडनी” की मदद करता है । लेकिन जब प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाए, और जो चीज़ बाहर निकलनी चाहिए वह दिमाग में चढ़ जाए… तब विज्ञान छुट्टी पर चला जाता है…तर्क दम तोड़ देता है…और फिर दूध से “रैबीज़”…शेक से ज़हर और ठेले से तबाही जैसी अफवाहें “सोशल मीडिया” पर तैरने लगती हैं । “नेफ्रॉन” का असर “ब्रेन” पर इतना तीव्र होता है कि “कुतर्क” हावी हो जाता है… और जब “कुतर्क” हावी होता है, तब “गटर छाप” पत्रकारिता का उदय होता है । ऐसे ही दृश्य पैदा होने लगते हैं कि भैंस के दूध से “रैबीज़” फैलने जैसी अफवाह पर “महाभारत” रच दिया जाता है ।

क्या था मामला ?

एक कुत्ते ने भैंस को काटा और काटने के बाद जितनी जल्दी इंसान नहीं मरता उससे जल्दी “भैंस” मर गई ! अब यह तय किए बिना कि भैंस की “मौत” किस वजह से हुई, सीधे अफवाह फैल गयी कि जिसने भी उसका दूध पिया, सब खतरे में हैं । फिर वही हुआ जो होना था..गाँव कस्बे में अफरा-तफरी मच गई ! लोग लाइन लगाकर “रैबीज़” इंजेक्शन लगवाने दौड़ पड़े, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लबालब भरे “कैमरावीर” इस मामले को शांत करने के बजाय इस मामले का रायता “सोशल मीडिया” पर फैलाने लगे

बेवजह रैबीज़ इंजेक्शन लगवाने की हानि !

रैबीज़ वैक्सीन “जीवनरक्षक” है लेकिन तब,जब सचमुच ज़रूरत हो ! बिना कारण लगवाना समझदारी नहीं जल्दबाज़ी है ! अनावश्यक इंजेक्शन से इंजेक्शन वाली जगह दर्द,सूजन हो सकता है । बुखार,बदन दर्द,एलर्जी या रिएक्शन कमजोरी और थकान, चिंता व मानसिक तनाव हो सकता है । अस्पतालों पर अनावश्यक दबाव पड़ता हैं औऱ होता यह है कि जिनको सच में “वैक्सीन” चाहिए, उनकी लाइन लंबी हो जाती है । माना “सोशल मीडिया” पर रायता फैलाने वालों के दिमाग में “केमिकल लोचा” हो गया था…”न्यूरॉन” की जगह “नेफ्रॉन” भर गया था…..मगर CMO साहब को क्या हो गया था ?

CMO साहब : विज्ञान से ज़्यादा सुविधा के अधिकारी

अब आते हैं CMO साहब पर ! CMO साहब का फर्ज यह था कि इस अफवाह पर बयान जारी कर इंजेक्शन लगवाने के लिए उमड़ रही भीड़ को सही जानकारी देते हुए बेवजह “रैबीज” का इंजेक्शन लगवाने से रोकें । लेकिन डॉक्टर होकर और एक पढ़े-लिखे अधिकारी होकर भी यदि बिना वैज्ञानिक आधार के “मृत भैंस” का दूध पीने वालों को “रैबीज़” का इंजेक्शन लगवाया जा रहा है, तो यह चिकित्सा कम और “प्रशासनिक पाखंड” ज़्यादा लगता है । CMO साहब की सोच शायद यही रही होगी कि “इंजेक्शन लगवा दो”… ताकि बाद में कोई बोले न कि कुछ किया नहीं ! यानि इलाज की जगह इमेज “मैनेजमेंट” चल रहा है । विज्ञान कहता है कि “रैबीज़” मुख्यतः संक्रमित जानवर की “लार” से काटने या खरोंचने से फैलता है, दूध पीने से नहीं ! लेकिन यहाँ ज्ञान नहीं, घबराहट का शासन है ! इस घबराहट का नतीजा “अवाम” पहले भी देख चुकी है कि CMO साहब को “स्वप्नलोक” में यह भान हुआ था कि उनके प्रांगण में “15 लाख” की ठगी हो गयी है… और वे बगैर किसी सूचना और शिकायत के ही “साइबर सेल” में तहरीर डाल आये थे । सच तो यह है कि जितना खतरा “दूध” से नहीं था, उससे कहीं ज़्यादा नुकसान इस “अफवाह” से हुआ । लोग डर कर अस्पतालों में भीड़ लगाने लगे ! जिनको सच में “वैक्सीन” चाहिए थी, उनकी लाइन लंबी हो गई और सरकारी संसाधन बेवजह खर्च हुए ।

माइक जब स्टेथोस्कोप बन जाए !

जब पत्रकारिता के धरोहर अपने माइक को डॉक्टर का “स्टेथोस्कोप” समझने लगते हैं, और डॉक्टर अपने “स्टेथोस्कोप” को “कुर्सी” समझने लगते हैं तब समाज में “जागरूकता” नहीं, “तमाशा” पैदा होता है । CMO साहब को याद रखना चाहिए कि सिर्फ “सफेद कोट” पहन लेने से किसी डॉक्टर को “सम्मान” नहीं मिलता… बल्कि किसी डॉक्टर को “सम्मान” उसकी वैज्ञानिक सोच और उसके मानवीय “दृष्टिकोण” के कारण मिलता है । “चौथे खंभे” को भी यह समझना चाहिए कि ऐसी हरकतें न करें कि लोग आपकी हालत देखकर कहने लगें कि पूरा “खंभा’ निपटा कर आए हैं क्या ? जरूरी नहीं कि हर मामले में बेवजह “हल्ला” हो । कुछ मामलों में चुप रहकर सही जानकारी देना भी “पत्रकारिता” ही कहलाता है । पत्रकारिता को “वाच डॉग” इसलिए कहा गया है कि गलत होता देख भौकिये ! लेकिन “वाच डॉग” का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं कि बेवजह “भौंकते” रहिए ! वरना कल को अगर कोई “मुर्गा” छींक देगा, तो आप पूरे जिले में “मास्क” बँटवा देंगे ।

दूसरा तमाशा : आम दो सौ रुपये किलो, शेक पंद्रह में कैसे ?

अब आते हैं गर्मी के सीज़न की नई खोज पर ! दिमाग में घुसे “नेफ्रॉन” ने एक और धमाल मचाया और पत्रकारिता का तैरता सवाल मार्केट में छा गया कि “आम महँगा है”… तो ठेले वाला 15 रुपये में “मैंगो शेक” कैसे बेच रहा है ? ज़रूर “ज़हर” बेच रहा होगा ! गजब खोजी पत्रकारिता है । जैसे अर्थशास्त्र खत्म, व्यापार मॉडल खत्म, मिश्रित सामग्री खत्म, बर्फ खत्म, दूध खत्म, फ्लेवर खत्म, मार्जिन खत्म… और सीधा फैसला कि ठेले वाला “केमिकल माफिया” है ।

ठेले खोमचे वाला ही अपराधी क्यों ?

इन “गुरुघंटालों” को ठेले वाला ही “केमिकल” मिलाता दिखाई देता है, लेकिन जनता को लीटर भर-भर कर पैक्ड ड्रिंक (माजा, फ्रूटी) पिलाने वाले जैसे पेड़ से अभी-अभी तोड़ा गया “शुद्ध” आम का रस पिला रहे हों ! सभी जानते हैं कि बड़े ब्रांडेड पेय पदार्थों में भी फ्लेवर पल्प प्रतिशत का खेल,प्रिज़र्वेटिव,शुगर और प्रोसेसिंग सब चलता है । मगर वहाँ सवाल नहीं उठते… क्योंकि वहाँ सवाल पूछना “औक़ात” से बाहर है । ऐसी बेवजह,नाहक, गैरजरूरी,और चीप खबरें क़भी कभी एहसास कराती हैं..जैसे गर्मी में किसी मुफ्तखोर को “मुफ्त मैंगो” जूस नहीं मिला…तो उसने ठान लिया कि आज “ठेला उद्योग” का “पोस्टमार्टम” करके रहेंगे !

कहाँ है शिकायत ? किसने की शिकायत ? है कोई डेटा या दरखास्त 15 रुपये के मैंगो जूस के लिए किसी ठेले खोमचे वाले के खिलाफ ? नहीं कुछ भी नहीं है बस अनर्गल “प्रलाप” है ! एक कहावत है : बेकार आदमी कुछ किया कर..कपड़े उधेड़कर सिया कर !

वाच डॉग क्यों कहते हैं मीडिया को ?

संगम में डुबकी लगाने गए लोग जिस तरह “मोनालिसा” की आँखों की गहराई देखकर चिंतित थे, और जिस तरह भारत के बढ़ते “आध्यात्मिक स्तर” पर दुनिया के बुद्धिजीवी चिंतित बताए जाते हैं… ठीक उसी प्रकार जिले के खाद्य अधिकारी साहब भी इस मुद्दे पर बेहद “चिंतित” नज़र आए । साहब दफ्तर में खड़े होकर बयान तो देने लगे लेकिन यह पूछना जरुरी नहीं समझा कि कहाँ है शिकायत ? क्या मिलावट की कोई शिकायत आई ? क्या कोई घटना रिपोर्ट हुई ? क्या कोई सैंपल फेल हुआ ? क्या कोई मरीज मिला ? क्या कोई जाँच रिपोर्ट है ? अगर कुछ भी नहीं है… तो फिर यह “बयानबाज़ी” किसलिए ? और अचानक दो-तीन “मीडिया वीर” ठेले वालों को “ठेलने” क्यों निकल पड़े ? एक ही दिन दो-तीन धुरंधरों को इसी मुद्दे पर बयान क्यों चाहिए था ? मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मीडिया को “वाच डॉग” इसलिए कहा गया है ताकि जहाँ गलत होता देखे वहाँ “भौकें” ! लेकिन गलत होता देख जहाँ “वाच डॉग” की तरह भौंकना चाहिए था वहाँ बिल्कुल नहीं भौकें ! CM की सुरक्षा में सेंध पर सिर्फ खेद प्रकट कर पल्ला झाड़ने में तीन सप्ताह लग गए ! और जहाँ कोई मतलब नहीं वहाँ कभी दूध से “रैबीज़” निकल आ रहा है, तो कभी मैंगो शेक से “ज़हर” फैल जा रहा है, और कभी ठेले वाला “केमिकल अपराधी” बना दिया जा रहा है ।

आवाम होशियार रहे !

ऐसे हालात में बेहद ज़रूरी है कि आवाम अपना दिमाग खुला रखे….वरना कल को कोई कह देगा कि “गोलगप्पे से ग्रहण लगता है”…और पूरा शहर “ग्रहणरोधी” वैक्सीन लगवाने पहुँच जाएगा ! साहब का क्या जाता है ? क्योंकि CMO साहब तो सिर्फ इसलिए सुई “भोंकवा” देंगे क्योंकि सुई की “व्यवस्था” मौजूद है ।

By systemkasach

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