जबलपुर (एम पी) : यह “तस्वीर” सिर्फ “विचलित” नहीं करती बल्कि भीतर तक तोड़ देती है । एक “माँ”…..जिसने मौत के वक्त भी अपनी आख़िरी “साँस” तक अपने बच्चे को “बाहों” में जकड़े रखा और एक बच्चा…..जो “मौत” के ठीक पहले भी माँ के सीने से चिपका रहा । यही “मातृत्व” है,जहाँ जिंदगी खत्म हो जाती है, लेकिन “रिश्ता” नहीं ! सोशल मीडिया पर वायरल इस “तस्वीर” को किसी कहानी का नहीं बल्कि एक भयानक “हकीकत” का हिस्सा बताया जा रहा है । कल मध्यप्रदेश के जबलपुर के “बरगी बांध” में एक क्रूज डूब गया…और उसके साथ डूब गईं कई “ज़िंदगियाँ”…कई परिवार…और सबसे ज्यादा एक “भरोसा” ! वो भरोसा,जो लोग लेकर उस क्रूज पर चढ़े थे ! वो भरोसा कि सब “सुरक्षित” है ,क्योंकि “सिस्टम” जाग रहा है…वो भरोसा कि अगर कुछ गलत हुआ, तो कोई बचाने आएगा..और वो भरोसा जो “शांत दरिया” को देखकर लगता था कि सब कुछ मनुष्य के नियंत्रण में है…और कुछ अनियंत्रित हुआ भी तो “व्यवस्था” बचा लेगी ! क्रूज पर बैठे लोग “मुस्कुरा” रहे होंगे…हवा का “झोंका” आया होगा…किसी ने कहा होगा “जिंदगी कितनी खूबसूरत है” ? लेकिन कुछ ही देर बाद वही हवा “चीखों” में बदल गई और वही पानी, जो “सुकून” दे रहा था…..”मौत” बन गया ! जान बचाने के लिए सब चीखे होंगे लेकिन पानी ने सबको “चुप” करा दिया होगा ।
सोशल मीडिया में इस वक्त होड़ मची है दुख जताने की ! हर कोई जल्दी में है ! सबको सबसे पहले दुख व्यक्त करना है, संवेदना दिखानी है क्योंकि “संवेदना” अब शब्दों में ज्यादा है, और “व्यवस्था” में कम ! यदि अभी तुलना करूँ तो इस “सड़ाँध” मारती “व्यवस्था” के कुछ “चाटुकार” मुझसे कहेंगे कि “विदेश” की बात मत करो । लेकिन “तुलना” करनी होगी, क्योंकि इंसान जो देखता है, वह “भूलता” नहीं है । एक “सत्य” घटना है कि जब अमेरिका में एक युवक “झील” में डूबता है…तब तीन मिनट के अंदर “हेलीकॉप्टर” आसमान से उतर आता है । कोई अफरा-तफरी नहीं…..सिर्फ एक सिस्टम, जो दौड़ पड़ा और वह युवक जिंदा बाहर निकाल लिया जाता है । वैसी ही एक घटना है कि जब न्यूजीलैंड में “सड़क” हादसा होता है…कुछ ही मिनटों में सड़क “हेलीपैड” बन जाती है लेकिन महिला नहीं बच पाती… लेकिन कोशिश में कोई कमी भी नहीं होती । उस कोशिश में एक ईमानदारी होती है ! एक इंसानी जान की कीमत को वहाँ की “व्यवस्था” समझती है…लेकिन यहाँ ? यहाँ किसी हादसे के बाद “भीड़” जुटती है…लेकिन वहाँ हादसे के बाद “व्यवस्था” जुटती है । यहाँ “बयान” और “बयानबीर” आते हैं…लेकिन वहाँ “टाइमिंग” और “टीमें” आती हैं । यहाँ “अफसोस” जताया जाता है और वहाँ जान बचाने की “कोशिश” की जाती है ।

जबलपुर में भी उस दिन पानी ठीक वैसा ही था जैसा हर दिन होता है । लोगों ने सोचा होगा चलो आज “क्रूज” पर चलते हैं । किसी बच्चे ने जिद की होगी और किसी माँ ने मुस्कुरा कर “हामी” भरी होगी मगर किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह “सैर” आखिरी होगी । जब “क्रूज” डूब रहा होगा…तब पहले कुछ सेकंड में लोगों को लगा होगा कि कुछ नहीं होगा । फिर घबराहट बढ़ी होगी…किसी ने किसी का हाथ पकड़ा होगा…किसी ने अपने बच्चे को ऊपर उठाया होगा…किसी ने “भगवान” को पुकारा होगा…और फिर पानी ने सबको “चुप” करा दिया होगा । उस समय कोई “हेलीकॉप्टर” नहीं आया लेकिन लोगों ने “सोशल साइट” पर डूबते “क्रूज” की तस्वीर डाली है । जितने समय में “क्रूज” डूब रहा था उतने में तो तमाम बचाव दल पहुँच सकते थे । “बरगी बांध” शहर से उतनी दूर नहीं है जितनी दूरी पर “टाइटेनिक” जहाज डूबा रहा होगा । वो “क्रूज” था कोई “नाव” नहीं जो पलटी और तुरंत “डूब” गई ! खैर, वो डूब गया और जब डूब गया तो बचाव दल पहुँचा । लापता लोग थे ! पानी था ! नेताओं के “संवेदना” संदेश थे और डूबे हुए “क्रूज” के पास की तस्वीरें थीं । जाँच के आदेश दे दिए गए हैं । दोषियों पर कार्रवाई ऐसी होगी जिससे भविष्य में कोई “सबक” न सीख सके और फिर सब “सामान्य” हो जाएगा । लेकिन जिन घरों में कोई लौटकर नहीं आया…वहाँ “सामान्य” क्या होता है ? एक “माँ” का कमरा हमेशा के लिए खाली रह जाता है…एक “पिता” की आँखें दरवाजे पर अटक जाती हैं और एक “बच्चा” हर आहट पर चौंक जाता है कि “शायद माँ आ गई” ! लेकिन हम फिर मोबाइल पर “स्क्रॉल” करेंगे…और अगली खबर पर बढ़ जाएंगे ।
ऐसे तमाम हादसों के बाद भी जब कोई कहता है कि सब “सुरक्षित” है, तो मैं चुप रहता हूँ क्योंकि मुझे पता है कि यहाँ “सुरक्षा” कागजों में होती है, “जमीन” पर नहीं ! यहाँ “लाइफ जैकेट” फोटो के लिए होती है, “जीवन” के लिए नहीं ! यहाँ नाविक “जिम्मेदारी” से ज्यादा अपनी “जान” बचाता है । इसलिए अगली बार जब पानी के किनारे कोई खड़ा हो तो एक बार अपने आसपास देखे। यह देखे कि अगर आप “पानी” में गिर जाएं तो कौन आएगा ? अगर कोई जवाब न मिले, तो समझ जाइए कि आप बिल्कुल “अकेले” हैं ! और फिर चुपचाप लौट आइए, क्योंकि इस देश में अब “पानी” उतना खतरनाक नहीं हैं जितनी हमारी “लापरवाही” है । यहाँ “पानी” की गहराई कम है, लेकिन हमारी “संवेदनाएं” उससे भी ज्यादा गहराई में डूबी हुई हैं । जबलपुर में इस हृदय विदारक घटना के बाद “वीआईपी” आते रहेंगे…”हेलीकॉप्टर” उतरते रहेंगे और “सायरन” बजता रहेगा । लेकिन फिर जब कोई “डूबेगा”, तब शायद फिर “आसमान” खाली रहेगा और हम फिर से आज की तरह ही लिखते रहेंगे कि हमें “दुख” है !

