वार्तालाप : अस्सलाम वालेकुम जुम्मन भाई ! “वालेकुम अस्सलाम मदारण मियाँ” फरमाइए…आज किस बदकिरदार का तज़किरा लेकर तशरीफ़ लाए हैं ? मदारण मियाँ ने लंबी साँस भरी और बोले मियाँ, ये बताइए कि ये “बदहवास गुप्ता” आजकल रोज़-रोज़ “कुत्तों” की तस्वीरें लगाकर किस ग़म में डूबे रहते हैं ? कहीं दिमाग़ी तवाज़ुन तो मुतास्सिर नहीं हो गया ? जुम्मन मियाँ खिलखिलाए और बोले ! अरे मियाँ, आप भी नाहक परेशान रहते हैं । दरअसल, मामला कुछ यूँ है कि “गुप्ता जी” के “पितरों” की तादाद ज़रा ज़्यादा है । अब साल में एक बार सबको याद करना मुमकिन नहीं होता । लिहाज़ा दो किश्तों में श्रद्धांजलि पेश की जाती है । इन दिनों दूसरा “राउंड” चल रहा है । बड़ी शिद्दत से अपने “पुरखों” को याद फरमा रहे हैं । जब कुछ कमी रह जाती है या गम ज्यादा सताता है तो “फोटू वोटू” लगा लेते हैं ।
यह सुनते ही”लाहौल विला कुव्वत” कहते हुए मदारण मियाँ ने अपना माथा पीट लिया और कहा कि…मगर मियाँ, देखने में तो “गुप्ता जी” बड़े पढ़े लिखे मालूम होते हैं !
क्या ख़ाक पढ़े-लिखे ! जुम्मन मियाँ ठठाकर हँसे और बोले कि…अंग्रेज़ी ऐसी लिखते हैं कि ऑक्सफ़ोर्ड वाले इस्तीफ़ा दे दें । व्हाट्सएप्प पर जो अंग्रेज़ी लिख रखी है न “बदहवास गुप्ता” ने…उसे पढ़कर तो “गूगल ट्रांसलेट” भी “सजदे” में गिर जाए । चाहो तो नंबर सेव करके ख़ुद मुआयना कर लो ।

मदारण मियाँ ने मूँछों पर हाथ फेरा औऱ गुप्ता जी की अंग्रेजी देखकर कहा..कि मियाँ, ये सब तो “सोहबत” का असर है । आधा जिस्म “दरगाह” में और आधा “माशूक़ा” की मोहब्बत में ! ये सब दरगाही लफंटूस पूरी तरह से “सुराखे-ए-जन्नत” के दीवाने हो चले हैं ! नीचे जो तस्वीर लगी है न…ये वही जनाब हैं जो उस दरगाह वाले नामाकूल “बदमाश” इक़रार के लंगोटिया यार हैं । सूबे के मुखिया के “जलसे” में ये जनाब उस बदमाश के साथ ऐसे घुस गए थे जैसे सुरक्षा नहीं, बारात में आए हों !
जुम्मन मियाँ ने उत्सुकता से पूछा…मगर हुआ क्या आख़िर ?अरे वही जो इनके ख़ून में दौड़ता है….घटियाई ! मदारण मियाँ ने तैश में कहा कि “सोनू सोनू” नाम से फर्जी फेसबुक आई डी बनाकर “सिस्टम” को खूब उल्टा सुल्टा बके जा रहे थे और दूसरी तरफ जनाब “इश्क़” भी फरमा रहे थे । फिर क्या था.. “बेगम” को भनक लग गई । “बेगम” ने विदेश में बैठी बेटी को ख़बर दी । बेटी पहले तो यक़ीन न कर सकी, मगर फिर फ़ौरन “हिंदुस्तान” चली आई । आते ही साहबज़ादे का मोबाइल और व्हाट्सएप्प “क्लोन” कर लिया । अब सहाब “हज़रत” बालकनी में बैठकर “माशूक़ा” को दिल का हाल सुनाते थे…और उधर “बेगम” और बेटी लैपटॉप पर पूरा “मुशायरा” लाइव देखती थीं । देख लो वीडियो !
जुम्मन मियाँ हँसते-हँसते खाँस पड़े ! यानी मोहब्बत इधर हो रही थी और “मुशाहिदा” उधर ! मदारण बोले…अरे मियां, हालत तो ये थी कि जनाब समझ रहे थे कि उनके मोहब्बत के पैग़ाम सिर्फ “माशूक़ा” पढ़ रही है…जबकि दूसरी तरफ “बेगम” और बेटी स्क्रीन रिकॉर्डिंग कर रही थी । बाद में वही वीडियो बाज़ार में ऐसे फैला जैसे मुफ़्त का वाई-फाई ! “इन्ना लिल्लाह”…जुम्मन मियाँ ने बनावटी अफ़सोस जताया और पूछा कि आखिर घर की वीडियो
बाहर पहुँची कैसे ?
सुना है कि “बेगम” तंग आकर किसी “सिस्टम” तक पहुँच गई थीं । वही “सिस्टम” जिसने “दरगाह” पर पल रहे “बदकिरदारों” की नींद हराम कर रखी है ! जुम्मन मियाँ ने ठहाका लगाया और कहा…अरे वही “सिस्टम” जिसके ख़िलाफ़ दस दिन पहले “गुप्ता जी” फेसबुक पर हुंकार रहे थे कि…तेरे सारे “मुखबिर” चिन्हित हो गए हैं… सबकी बैंड बजा देंगे ! मदारण मियाँ मुस्कराए और बोले…हाँ वही ! अरे घंटा बैंड बजाएँगे ! जुम्मन बोले कि जरा पूछो कि कौन “मुखबिर” चिन्हित हुआ है ? अब तो हालत ये है कि घर की “बेगम” ही “सिस्टम” की “मुखबिर” निकली मियाँ ! जब घर के अंदर “सुराख़” हो जाए न…तो फिर “कच्छे” के छेद भी “राज़” नहीं रहते ! दोनों तरफ़ कुछ पल ख़ामोशी रही । फिर मदारण मियाँ बोले…अरे, और वो उनका “लफंटूस” दोस्त है न ? वही “डफर खान” ? उसने भी कुछ धमकी वमकी लिखी थी फेसबुक पर ?
जुम्मन मियाँ ने होंठ भींचे…अरे छोड़ो मियाँ ! दरगाह अब “औलिया” से ज़्यादा “लफंटूसों” के हवाले है । वही “डफर खान” न… जो फेसबुक पर लिख रहा था कि ‘पेट्रोल डाल दो..आग लगा दो… हाथ-पैर तोड़ दो…सिस्टम को ढूँढो और मार दो ! मदारण मियाँ हँस पड़े…वाह रे शेरदिल ! शेरदिल नहीं मियाँ…कीबोर्ड तालिबान ! जुम्मन ने कहकर चुटकी ली ! फेसबुक पर तालिबान बने फिरते हैं और सामने पड़ जाएँ तो “बकरीद” की “बकरी” हो जाते हैं। “सिस्टम” को “कुत्ता” बताते हैं और ख़ुद “झुंड” में निकलते हैं । ढूँढते “सिस्टम” को हैं और हर बार ख़ुद “गुम” हो जाते हैं ! जनाब साहब “माशूका” के घर रात डेढ़ बजे पहुँचते थे और स्कूटी बाहर छोड़ देते थे..लेकिन मजे की बात ये की रात डेढ़ बजे इनके स्कूटी की फ़ोटो “सिस्टम” तक पहुँच जाती थी ।
मदारण मियाँ अब पूरी तरह मज़े लेने के मूड में बोले…मगर लोग कहते हैं कि “सिस्टम”बड़ा ख़तरनाक है ! ख़तरनाक ? जुम्मन मुस्कुराए ! मियाँ, जिसने खान “मुबारक” जैसे “अंडरवर्ल्ड” के नामी किरदारों को “ज़मीन” दिखा दी हो..उसके सामने ये बदहवास गुप्ता, डफर खान और इकरार-विकरार किस खेत की मूली हैं ? ये लोग सिर्फ़ फेसबुक पर “बारूद” होते हैं, असल ज़िंदगी में भीगी “फुलझड़ी” हैं ये !
मदारण मियाँ ने आखिर में पूछा…तो चच्चा, दरगाही लफंटूसों को कोई नसीहत देना चाहेंगे क्या ? जुम्मन मियाँ ने बीड़ी सुलगाई, लंबा कश लिया और बोले…मियाँ, अब ये कम्बख्त इतने नामाकूल हैं कि दिल से बस एक ही “अज़ाब” निकलता है कि…अपने रीढ़ की हड्डी को गोबर में पीस कर…और उसका लेप अपने मुंह पर पोत कर घूमने वाले इन लफंटूसों के नापाक हाथों से “दरगाह मुबारक” और “प्रेस क्लब” छूट जाए ! इन नामाकूलों का वजूद “बुद्धत्व” के सिद्ध वचन “बुद्धं शरणं गच्छामि” से बदलकर “दलालम शरणं गच्छामि” हो चुका है..इसलिए ये सारे नामाकूल “सुराख-ए-जन्नत” वाली “मल्लिकाओं” के दीवाने हो चले हैं । इनका दिल “वेश्याओं” के दुप्पटे की तरह हो चला है इसलिए यही दुआ है कि ये लोग “चूसन क्रिया” की “बुर्ज खलीफा” तक चढ़ें और “अंडकोष” चूमने की विध्वंसक और हाड़तोड़ प्रतियोगिता में “गोल्ड मेडलिस्ट” विजेता बने ।
मदारण बोले ..अरे तौबा तौबा ये तो अज़ाब हो गया..अरे मियाँ नसीहत तो दीजिये ! जुम्मन बोले कि अब “नसीहत” यही है कि इश्क़ करो तो औक़ात देखकर करो…धमकी दो तो हिम्मत रखो…और अगर घर में “बेगम” नाराज़ हो जाए…तो समझ लो कि “सिस्टम” को अब “मुखबिर” ढूँढने की ज़रूरत नहीं रही !

