यूपी के कानपुर में आज जो दृश्य सामने आया, उसने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है । जिन जवानों को देश की सीमाओं पर सबसे कठिन परिस्थितियों में भी “संयम” और “अनुशासन” का प्रतीक माना जाता है…यदि वही जवान किसी पुलिस मुख्यालय के बाहर आक्रोश में खड़े दिखाई दें….तो मामला सिर्फ एक विवाद नहीं रह जाता बल्कि वह “व्यवस्था” के चरित्र पर सवाल बन जाता है । उत्तर प्रदेश पुलिस वर्षों से “कानून व्यवस्था” के नाम पर एक ऐसी छवि गढ़ती रही है…जिसमें शक्ति तो दिखाई देती है लेकिन संवेदनशीलता और निष्पक्षता न के बराबर दिखाई देती है । आम आदमी की शिकायत अक्सर यही रहती है कि थाने में उसकी बात कम सुनी जाती है और दबाव ज्यादा महसूस कराया जाता है । कभी किसी पीड़ित को घंटों बैठाए रखना, कभी मामूली बात पर कठोर धाराएँ लगा देना, कभी प्रभावशाली लोगों के सामने असहाय दिखना और पक्षपाती रवैय्या अख्तियार करने जैसा अनुभव अब “अपवाद” नहीं रह गया है । जनता तो चुप रहती है लेकिन आज यदि एक “अनुशासित” बल के जवानों का “धैर्य” टूटता हुआ दिखाई दिया है तो यह सिर्फ एक “विभागीय” विवाद नहीं माना जाएगा । यह उस बढ़ती “दूरी” के संकेत है जो “वर्दी” और “विश्वास” के बीच पैदा हो चुकी है ।
सबसे गंभीर बात यह है कि जब पुलिस “व्यवस्था” के भीतर ही संवाद की जगह “टकराव” बढ़ने लगे, तो समाज में संदेश बहुत खतरनाक जाता है । लोकतंत्र में नागरिक रोज़ सबसे पहले “अदालत” से नहीं बल्कि “पुलिस” से टकराता है । इसलिए पुलिस का व्यवहार ही लोगों के मन में शासन की असली तस्वीर बनाता है । “भय” से व्यवस्था कुछ समय तक चल सकती है लेकिन “विश्वास” से पीढ़ियाँ चलती हैं । आज की घटना शायद कुछ दिनों बाद खबरों से गायब हो जाए..लेकिन जो तस्वीर लोगों के मन में बनी है, वह इतनी जल्दी नहीं जाएगी ! आज की घटना यह सवाल छोड़ गयी है कि “धैर्य” और “अनुशासन” की मिसाल माने जाने वाले प्रहरी भी यदि “व्यवस्था” से क्षुब्ध दिखाई दें रहे हैं तो आम नागरिक आखिर किस “मनःस्थिति” में जी रहा होगा ?
सवाल तो मन में वो भव्य “विवाह” भी जगा गया जो “संभल” में हुआ और नए “भारत” ने देखा भी ! लोकतंत्र में समस्या सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब वैभव और विलासिता को लोग “सिस्टम की सफलता” मानने लगते हैं । पिछले दिनों एक चर्चित आईपीएस अधिकारी की भव्य शादी को लेकर खूब चर्चा रही । करोड़ों की कार, लाखों की घड़ी, आलीशान आयोजन, रसूख की चमक…सब कुछ सोशल मीडिया पर मौजूद है । यहाँ सवाल सिर्फ यह नहीं उठा कि पैसा कहाँ से आया बल्कि सवाल यह रहा है कि.. क्या एक “लोकसेवक” के लिए ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन उस “नैतिक” मर्यादा के अनुरूप है जिसकी अपेक्षा जनता उससे करती है ?
जब सवाल उठे तो कुछ लोगों ने जवाब दिया कि ये सब कुछ पारिवारिक संपन्नता का परिणाम है । पिता का मजबूत व्यवसाय है । हो सकता है यह बात सही हो । लेकिन क्या ये प्रश्न नहीं उठता है कि…यदि यह सिर्फ पारिवारिक समृद्धि थी…तो परिवार के अन्य विवाह आयोजनों में आज से पहले यही “वैभव” क्यों नहीं दिखाई दिया ? अचानक एक सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही इतना असाधारण आकर्षण क्यों केंद्रित हो गया ? क्या ये वही सवाल नहीं है…जहाँ लोकतंत्र में संदेह जन्म लेता है ?
और जब कोई कहता है कि करोड़ की कार उस अधिकारी की नहीं बल्कि उसके किसी “शुभचिंतक” की है….तब तो सवाल और गहरा हो जाता है कि शुभचिंतक कौन ? क्या ये वही शुभचिंतक तो नहीं…जहाँ आप पहले सालों तक तैनात रहे हैं । और यदि ऐसा कोई शुभचिंतक, कोई कारोबारी,या ठेकेदार किसी अधिकारी के लिए इतनी उदारता दिखाता है, तो जनता को यह पूछने का अधिकार है कि बदले में उसे क्या मिला था….जब आप उसके जिले में तैनात थे ? ये सभी जानते हैं कि लोकतंत्र में “उपहार” सिर्फ “उपहार” नहीं होते बल्कि पहुँच, संरक्षण और प्रभाव के निवेश होते हैं । यही कारण है कि दुनियाभर की प्रशासनिक व्यवस्थाएँ अपने अधिकारियों से केवल “ईमानदार” होने की नहीं बल्कि “ईमानदार” दिखने की भी अपेक्षा करती हैं ।
शाही विवाह से चर्चा बटोरने वाले अधिकारी महोदय पर कागजों में उकेरा गया यह आरोप भी है कि अपनी पिछली तैनाती के दौरान “अहंकार” के वशीभूत होकर ये एक “पत्रकार” के पीछे ऐसे पड़े थे जैसे “ततैया” डंक लेकर “मनुष्य” के पीछे पड़ जाती है । लेकिन उससे हासिल क्या हुआ ? अब तो वो सबूत भी सामने आ गए हैं जो यह बता रहे हैं कि एक “दैनिक” अखबार के दलाल पत्रकार को खुश करने की खातिर आपने एक “पत्रकार” (छात्र) पर ताबड़तोड़ मुकदमे लिखकर उसे हिस्ट्रीशीटर और गैंगेस्टर तक बना दिया था । मुझे समझ में नहीं आता है कि एक “पत्रकार” जो आपके सड़ चुके और बास मारते “सिस्टम” के मामले में लगातार सबूतों सहित तथ्यात्मक खबरें रिपोर्ट करता रहा…..जो जैसा है उसे ज्यों का त्यों छापता रहा….तो उस “पत्रकार” के बारे में अचानक आपको छानबीन करने की जरूरत क्यों पड़ गयी थी ? और छानबीन का भगौना खूब घुमाया भी तो मिला क्या ? अरे छानबीन ही करनी है तो उनकी कीजिये…जिसके वास्ते “कर्म” की नैतिकता और पद की “महत्ता” ने आपको ये “वर्दी” सौपीं है । कभी-कभी इंसान ग़लतफ़हमियों के शीर्ष पर चढ़कर अपने पैर वहीं रख देता है…जहाँ फिसलने की ख़ातिर उसकी “नियति” में सबसे अधिक “काई” जमी होती है ! क्या पता उस “पत्रकार” (छात्र) के बहाने ही “नियति” आपके पुरातन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास के तीनों हिस्सों की ऐसी “पर्तें” खोल दे…कि “हैरानियों” का एक नया “इतिहास” सृजित हो जाए !
व्यवस्था तो यह मान बैठी है कि आदमी “मरने” के बाद कुछ नहीं “सोचता” और कुछ नहीं “बोलता” ! लेकिन मेरा मानना है कि कुछ नहीं “सोचने” और कुछ नहीं “बोलने” पर ही आदमी मर जाता है ! आवाम को ये समझ में कभी आया ही नहीं कि यदि “कानून” के हाथ इतने लंबे होते हैं…तो फिर यह लंबे हाथ सिर्फ कमजोरों तक ही क्यों पहुँचते हैं ? चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि “व्यवस्था” में भ्रष्टाचार मौजूद है बल्कि चौंकाने वाली बात तो यह है कि लोग इस पूरे राज्य में आज तीन “ईमानदार” अधिकारियों का नाम भी नहीं बता सकते । यह संक्रमण इतना गहरा हो गया है कि आज ITBP के जवानों को कानपुर पुलिस कमिश्नरेट घेरना पड़ गया ।
प्रेस क्लब की छत के नीचे पल रहे कुछ दो कौड़ी के “दलालों” को छोड़िए ! ये दलाल जितनी मेहनत किसी को फँसाने या गिराने के लिए साजिशों” में करते हैं न…..उससे आधी मेहनत में ये ससुरे UPSC क्वालीफाई कर गए होते । यूपी पुलिस पर पहले से ही “सिस्टम” “सेटिंग” “पहुंच” “मैनेजमेंट” जैसे शब्दों की छाया रहती है । ऐसे में जब किसी अधिकारी का जीवनशैली प्रदर्शन सार्वजनिक चर्चा का विषय बनता है…तो वह सिर्फ व्यक्तिगत मामला नहीं रह जाता बल्कि वह पूरे संस्थान की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है । सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि इस देश में आम कर्मचारी की छोटी-सी संपत्ति पर भी सवाल पूछ लिए जाते हैं….छोटे मोटे बकरी चोरों पर “गैंगेस्टर” लिखकर उनकी बकरियों तक को “जब्त” कर लिया जाता है… लेकिन बड़े पदों के आस पास पैदा होने वाले असाधारण “वैभव” को “स्टेटस” कहकर सामान्य बनाने की कोशिशें की जाती हैं ।
मैंने एक से बढ़कर एक जजों और पुलिस अधिकारियों को रिटायर होने के बाद टूटकर रोते बिखरते देखा है । कभी जिनके पसीने से “चराग” रोशन हो जाया करते थे आज वही अपने “रिटायरमेन्ट” के बाद अपनी “दुर्गति” को अंजाम तक पहुँचाने के लिए “आत्महत्या” का सहारा ले रहे हैं । इसलिए “ताकत” के भरम में चूर बड़े लोगों को यह समझना चाहिए कि इस धरती पर “ईश्वर” सिर्फ एक ही है । बाकी “सिकंदर” महान भी “झेलम” में फंस गया था और “जूलियस सीज़र” भी अपनों के “चक्रव्यूह” में ही सिमट कर रह गया था । इसलिए भले ही आपको बेहद “ताकतवर” होने का भरम हो, फिर भी यकीन रखिए कि आप “परमेश्वर” नहीं हैं !

